‘Tandav’ Review: बड़े स्टारों वाली सीरीज का नाम बड़ा और दर्शन छोटे

‘Tandav’ Review: बड़े स्टारों वाली सीरीज का नाम बड़ा और दर्शन छोटे

By Naseem Shah17 January, 2021 4 min read
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‘Tandav’ Review: बड़े स्टारों वाली सीरीज का नाम बड़ा और दर्शन छोटे

तांडव  सीरीज जिसका दर्शक पिछले एक हफ्ते से बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। वह 9 एपिसोड के साथ अमेजन प्राइम पर रिलीज हो चुकी है। सीरीज पूरी तरह से राजनीति से प्रभावित है जो भारतीय राजनीति के एक स्याह पहलू को ना कि दिखाने की पूरी कोशिश करती है बल्कि समझाने की भी पूरी कोशिश करती है। कहानी पूरी तरह काल्पनिक जरूर है लेकिन सत्तर के दशक की भारतीय राजनीति के कुछ नेताओं का नाम और काम बीच-बीच में उदहारण के तौर पर सुनने को मिलता रहता है।

समर प्रताप सिंह (सेफ अली खान) जो अपने पिता की पार्टी को जिताने के लिए रात दिन एक कर देता है और रिजल्ट आने से पहले ही कुर्सी के लिए अपने पिता को ज़हर देकर मार देता है। समर प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बनने ही वाला होता है कि उसके पिता कि प्रेमिका और पार्टी की वरिष्ठ नेता अनुराधा (डिम्पल कपाड़िया) समर के राज़ को जान लेती है और उसे खुद प्रधानमंत्री बनने के लिए ब्लैकमैल करती है।

प्रधानमंत्री की कुर्सी समर के नीचे से खिसक कर अनुराधा के नीचे पहुंच जाती है। अनुराधा समर को मार्गदर्शक मंडल मे डालकर उसकी पूरी राजनीति को ख़त्म कर देती है। समर लेकिन कुर्सी पाने के लिए अपने पी.ए गुरपाल (सुनील ग्रोवर) को इस्तेमाल करता है। गुरपाल इस बात का पता करने में लग जाता है कि बात कहां से लीक हुई।

गुरपाल अनुराधा से सत्ता छीनने के लिए वी.एन.यू के शिवा (मोहम्मद जीशान अय्यूब) और उसके दोस्तों के बीच पहले फूट डलवाता है। उसके बाद उनको मरवाकर उन्हीं को फंसा देता है। गुरपाल को अनुराधा के ख़िलाफ ऐसी खबर लग जाती है जिस वो अनुराधा को इस्तीफा देने के लिए मज़बूर कर देता है। सारी कहानी कुर्सी के आने से कुर्सी के जाने तक की है।

किसने कैसा काम किया?

यह निर्देशक अली अब्बास ज़फर की पहली सीरीज थी। इस पहले वो बॉक्स ऑफिस के हिसाब से काफी सफल फ़िल्में कर चुके हैं। उसमें सुल्तान, टाइगर ज़िंदा है और भारत  जैसी मंहगी फ़िल्में शामिल हैं। अली अब्बास ज़फर की एक्शन फ़िल्मों को बनाने में अच्छी समझ है लेकिन फ़िल्म और सीरीज में बहुत से बुनियादी फर्क़ हैं जिन्हें समझने में वो पूरी तरह कामयाब नहीं हो सके। तांडव देखने के बाद ऐसा ही लगता है।

एक देश की राजनीति और उसके राजनेताओं का कद और उनकी गरिमा और मर्यादा को सही से पहचानने में उनसे कहीं ना कहीं चूक हुई है। किसी भी सीरीज में गालियां अब जैसे चलन बन चुकी हैं। गालियां समाज का हिस्सा हैं लेकिन हर कोई गाली नहीं देता है। यह भी समाज का एक सच हैं। एक जगह सीरीज में गुरपाल अपने ही जैसी एक महिला पी.ए को गोली देता है जबकि ऐसा नहीं होता है।

एक अच्छे लेखक को समाज घटनाएं उठाकर उन्हें क्रिएटिव बनाता है। तांडव  के लेखक गौरव सोलंकी और खुद अली अब्बास ज़फर हैं। गौरव सोलंकी आर्टीकल 15 भी लिख चुके हैं। उस फ़िल्म में भी उनकी वही दिक्कत थी। किसी घटना को अगर स्क्रीन पर क्रिएटिव नहीं बना सकते तो बेहतर है डॉक्योमेंट्री बनाना। तांडव सीरीज में एक भी किरदार मुकम्मल नज़र नहीं आता है।

उसमें जो एक विश्वविधालय का काल्पनिक नाम वी.एन.यू इस्तेमाल किया गया है। उसके एक लड़के की वीडियो वायरल होते ही सीधे प्रधानमंत्री तक पहुंच जाना कितना फैंटेसी सा लगता है। एक डॉयलॉग में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बताया गया है लेकिन स्क्रीन पर सब कुछ एक घर के अंदर हो रहा है। एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री मर जाता है वो भी एक कमरे में, एक प्रधानमंत्री बदल जाता है वो भी एक कमरे में, दूसरा प्रधानमंत्री बदल जाता है वो भी एक कमरे में, यानी देश की राजनीति एक कमरे में ही हो रही है। इस से साफ हो जाता है कि लेखक में कल्पना की कमी हैं। उसने सारे किरदारों को बहुत ही ऊपरी सतह पर छुआ है। उसने किसी भी किरदार के अंदर झांक कर नहीं देखा है।

लेखक जो काल्पनिक दुनिया तैयार करता है एक एक्टर उसी को पर्दे पर जीता है। इस बुनियादी दुनिया में ही अगर गड़बड होगी तो एक्टर बहुत ज़्यादा कुछ नहीं कर पाता है। सीरीज की कहानी का भार सेफ अली खान के कंधो पर है। वही कुर्सी के लिए सब कुछ फ़िल्म रेस  की तरह कर रहे है लेकिन रेस  में उन्होंने तांडव से बहुत बेहतर किया था। सुनील ग्रोवर का किरदार मजेदार है उसे देखकर वाकई मज़ा आता है। इसके अलावा जीशान अय्यूब अच्छे एक्टर हैं लेकिन वो शिवा शेखर के किरदार में कुछ ज़्यादा ही एक्सट्रा ऑर्डनरी से दिखते हैं। डिम्पल कपाडिया जिन्होंने एक ओल्ड लेडी अनुराधा का किरदार निभाया है। जो एक लम्बे अर्से बाद स्क्रीन पर नज़र आय़ीं लेकिन उन्होंने अपने किरदार की गरिमा को बनाए रखा है। उन्होंने साबित किया कि वो एक अनुभवी कलाकार हैं। इसके अलावा कुमुद मिश्रा उन अच्छे एक्टरों में से हैं जो सीरीज में एक्टिंग नहीं कर पाये। फ़िल्म में कुछ छोटे-छोटे किरदारों में श्रीकांत वर्मा और राजीव गुप्ता ने अच्छा काम किया है।

देखें या ना देखें?

यह बात सही है कि सीरीज रिलीज होने से पहले जो भौकाल मचाया जा रहा था। सीरीज देखने में उस पैमाने पर खरी तो नहीं उतरती है लेकिन हां एक बार लेकिन देखी जरूर जानी चाहिए। फ़िल्म में राजनीति को लेकर कुछ खास नहीं है लेकिन राजनीति में होने वाली साजिशों की एक काल्पनिक दुनिया है जिसमें हो रहे क्राइम का मज़ा दर्शक को आता है।

निर्देशक: अली अब्बास ज़फर
कलाकार: सेफ अली खान, मोहम्मद जीशान अय्यूब, सुनील ग्रोवर, डिम्पल कपाड़िया, तिग्मांशु धूलिया।
प्लेटफार्म: अमेजन प्राइम

Tags: #Ali Abbas Zafar #Amazon prime #Dimple Kapadia #Mohammed Zeeshan Ayyub #Saif Ali Khan #Tandav
Naseem Shah
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Naseem Shah

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