‘Aashram 2’ Review: इस बार बनते-बनते बिगड़ गई कहानी

‘Aashram 2’ Review: इस बार बनते-बनते बिगड़ गई कहानी

By Naseem Shah12 November, 2020 5 min read
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‘Aashram 2’ Review: इस बार बनते-बनते बिगड़ गई कहानी

कहानी: आश्रम  के दूसरे भाग को समझने के लिए पहला भाग देखना लाज़िमी है। क्योंकि दूसरे भाग की सारी कड़ियां पहले भाग से जुड़ी हैं। पहले भाग में जो अधूरे सवाल छोड़े थे। इस भाग में उन्ही के जवाब दिए गये हैं। पहले भाग में बाबा के किरदार का महिमा मंडन किया गया था। उसके दोहरे चरित्र को दिखाया गया था। वह कैसे अपनी भक्तों का बलात्कार करता है। वह कैसे अपने भक्तों को नपुंसक बना देता है। वह किस तरह से लोगों को अपनी मीठी-मीठी बातों में फंसाता है। वह कैसे प्रभावशाली लोगों से अपने लिए काम करवाता है। वह कैसे अपने आश्रम में बैठकर प्रदेश का मुख़्यमंत्री तय करता है। वह कैसे अपने ख़िलाफ उठने वाली आवाज को हमेशा के लिए दबा देता है।

आश्रम  के दूसरे भाग की कहानी एक उम्मीद से शुरू होती है। दर्शक पहले भाग में ही बाबा काशीपुर वाले (बॉबी देओल) की करतूतों से मन ही मन नफरत करने लगा था। इस बार वह किसी भी तरह बाबा की किले नुमा लंका को जलता देखना चाहता था। लेखक एक डॉक्टर के प्लान के मुताबिक दो पुलिस वाले साधु (विक्रम कोच्चर) और उजागर सिंह (दर्शन कुमार) को दर्शकों की उम्मीद बनाकर आश्रम में भेजता है। यह दोनों भेस बदलकर बाबा के ख़िलाफ सुबूत जुटाने में लग जाते हैं। दर्शक को लगता है कि बस अब बाबा का पर्दाफाश होने ही वाला है। लेखक सात एपिसोड तक दर्शकों को ऐसे ही बहकाता है। सात एपिसोड बाद जब इन लोगों के हाथ सुबूत भी लग जाता है और ये कुछ नहीं कर पाते तो दर्शक इन दोनों से उम्मीद छोड़ देता है।

उम्मीद पर दुनिया कायम है। दर्शक की उम्मीद पुलिस वालों से टूटती है तो वो अपनी उम्मीद आश्रम की पहलवान पम्मी (अदिती सुधीर पोहनकर) और भेस बदलकर रह रहे पत्रकार अक्की (राजीव सिधार्था) से लगा लेता है। पम्मी पिछले सीजन से अब तक बाबा की अंधभक्त थी। बाबा के ख़िलाफ एक शब्द नहीं सुन सकती थी। पम्मी को जब पता चलता है कि बाबा नशे के लड्डु खिलाकर उसका बलात्कार कर रहा है। उसका सारा स्टाफ चाहे मर्द हो या औरत सब के सब इस धंधे में शामिल हैं तो पम्मी क्रोध से उबलने लगती है। पम्मी को अफसोस तो तब होता है यह सब जानकर भी जब वो कुछ नहीं कर पाती है।

पम्मी बाबा की लंका जलाने की कसम खा चुकी है। लेकिन उसके लिए पहले उसे आश्रम से बाहर जाना होगा और बाबा की मर्जी के बिना आश्रम से कोई नहीं जा सकता। उसे कैद खाने में डाल दिया जाता है। वह अपनी हिम्मत और चालाकी से जैसे ही आश्रम की रेखा को लांघती है वैसे ही दूसरा सीजन भी ख़त्म हो जाता है। दर्शकों की ढोंगी बाबा की लंका जलते देखने की इच्छा अधूरी रह जाती है ताकि तीसरा सीजन बनाया जा सके।

पहला भाग vs दूसरा भाग

हिन्दी की किसी भी सीरीज का दूसरा भाग देखने पर ऐसा लगता है कि जैसे किसी ने श्राप दे रखा हो कि निर्देशक चाहे जितना बड़ा क्यों ना हो पर दूसरा भाग अच्छा नहीं बना सकता। पहले भाग को अगर 40 करोड़ से ज़्यादा लोगों ने देखा था तो उसमें कुछ तो बात थी। पहला भाग देखकर लगा था कि गंगाजल  वाले प्रकाश झा ने ही बनाया है। उन्होंने जिस तरह से आश्रम के इर्द-गिर्द किरदारों का एक मकड़जाल बुना था। जिसमें हर किरदार का सिरा आश्रम से जाकर जुड़ता था। दर्शकों ने उसका खूब आनंद लिया।

आश्रम  का दूसरा भाग पहले भाग से कई मायनों में कमजोर है। निर्देशक के साथ-साथ इसकी जिम्मेदारी लेखक को भी लेनी चाहिए। उसने जो पिछले सीजन के सब प्लाट थे उन्हीं को आगे बढ़ाया है। उसमें भी किरदारों का पूरा एटीट्यूड ही चेंन्ज कर दिया है। कहानी में उनका महत्व भी कम कर दिया है। साधु और उजागर सिंह बाबा के आश्रम में घुसने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। वहां पकड़े ना जायें इसलिए दवाएं लेते हैं। एक डॉक्टर से ट्रेनिंग लेकर बकायदा आश्रम जाते हैं। वहां जाकर भी कुछ खास नहीं कर पाते हैं। वहां से सुबूत जुटाकर वापस भी आते हैं तो किसी काम के नहीं।

निर्देशक ने कई बार लव स्टोरी चलाने की कोशिश की है। एक बार भी लेकिन सफल नहीं हो पाया। अक्की सिंह पहले एक लड़की को बचाता है। वह मर जाती है। अक्की सनोबर से जुड़ता है तो उन दोनों के लिए कोई खास सीन नहीं लिखा गया। ऐसा लगता है कि आठ एपिसोड़ तक अक्की कहानी में अपनी जगह तलाश रहा है क्योंकि 9वें एपिसोड में उसे पम्मी की मदद करनी है। पहले भाग में जिस तरह से बबीता का किरदार बुना गया था । ऐसा मालूम होता था इस बार कुछ करेंगी लेकिन कुछ नहीं कर पायीं। उनका किरदार लेखक की कलम से दूर ही भटकता रहा।

इस से पहले हर किरदार की अलग लोकेशन थी। इस बार लोकेशन बहुत ही सीमित कर दी हैं। स्क्रीन पर या तो आश्रम दिखता है। या सी.एम का ऑफिस दिखता है। एक स्टेज दिखती है जहां बाबा की शान में सिंगर टिका सिंह गाना गा रहा है। गाने के बोल ‘ बाबा लायेंगे क्रांति’ हालांकि बाबा की हरकतों पर शूट करते हैं।

पहले भाग में बाबा चीजों को कंट्रोल कर रहा था। वह अपने ख़िलाफ उठने वाली आवाज को कैसे शांत करता था। वह अफसरों को कैसे अपने खेमे में मिलाता था। वह कैसे विपक्ष के हुकुम सिंह को अपने आश्रम तक खींच लाया। उसने कैसे प्रदेश के सी.एम को अपने आगे झुकने के लिए मजबूर कर दिया। उसने कैसे टिंका सिंह को अपने लिए काम करने के लिए राजी किया। उसने कैसे अपने ख़िलाफ जांच करने वाले अफसर को रिपोर्ट बदलने पर मजबूर कर दिया। उसने कैसे उजागर सिंह और साधु सिंह का कद उनके ही महकमें में छोटा कर दिया। उसने कैसे आश्रम से भाग गयी लड़की को वापस आने पर मजबूर कर दिया। उस से बाबा के वर्चस्व और उसकी कूटनीति का पता चलता था। इस बार लेकिन बाबा या तो अपने हरम में दिखता है या फिर स्टेज पर दिखता है। इस बार के सीन और सिचुएशन में पहले जैसी बात नहीं दिखी।

सिनेमा की नज़र

सिनेमा की नज़र से अगर देखा जाये तो सीरीज उम्मीदों के पैमाने पर उतनी भी खरी नहीं उतरती है सीरीज आने से पहले जितना अंदाजा लगाया जा रहा था। इस बार निर्देशक प्रकाश झा से कहीं ना कहीं तो चूक हुई जिसका असर स्क्रीन पर नज़र आता है। कितने सारे किरदारों को डेवलप करने के बाद भी आगे नहीं बढ़ाया गया। निर्देशक 9 एपिसोड की कहानी को दो राजनीतिक पार्टियों के बीच तोलता रहा। बाबा जहां फंसता है वहां हाथ जोड़ लेता है। बाबा जबकि पहले सीजन में अपने ऊपर आने वाली हर मुसीबत की काट अपने पास रखता था।

थिएटर से जुडे लोगों को सिखाया जाता है कि कभी-कभी एक्टिंग ना करना भी अच्छी एक्टिंग होता है। इस मामले में बॉबी देओल की तारीफ करनी होगी। उन्होंने खामोश रहकर भी अच्छी एक्टिंग की है। वह हर एक सीन में वैसे तो पानी की तरह शांत दिखते हैं पर जब किसी लड़की के विचार उनके ज़हन में आते हैं तो वैसे मचल जाते हैं मानों पानी में किसी ने पत्थर फैंका हो। इसके अलावा एक लड़की सनोबर जिसे इस सीजन में भी पहले जितनी ही जगह मिली है। निर्देशक ने उसकी एक लव स्टोरी चलाने की भी कोशिस की लेकिन अधूरी ही छोड़ दी है।

इस भाग में पहले के बहुत सारे मुख़्य किरदार घंटों-घंटों स्क्रीन से गायब रहते हैं। पहले सीजन में दमदार भूमिका निभाने वाले भोपा स्वामी की शक्ति भी कम नज़र आती है। इस बार कहानी को पम्मी की तरफ मोड़ा गया है। पम्मी के किरदार में अदिती सुधीर पोहनाकर की एक्टिंग उनको एवरेज ही लगेगी जिन्होंने शी  में उन्हें एक मराठी लड़की के किरदार में देखा होगा।

कोई क्यों देखे

एक धूर्त बाबा की करतूतें पहले सीजन में जिसने देखी थीं। वह इस सीजन में अगर देखना चाहते हैं कि बाबा का अंजाम क्या होगा? तो इस बार भी वो बाबा का अंत नहीं देख पायेंगे। उसके लिए तीसरे सीजन का इंतजार करना होगा। बाबा का अंत लेकिन नज़दीक ही है। उसके अंत की शुरूआत हो चुकी है। उसकी सबसे सच्ची भक्त ही उसका अंत करेगी। यह जानने के लिए देख सकते हैं।

निर्देशक: प्रकाश झा
कलाकार: बॉबी देओल, अदिती सुधीर पोहनकर, विक्रम कोच्चर, दर्शन कुमार, चंदन रॉय सान्याल, अनुप्रिया गोयनका।
पलेटफार्म: एमएक्स प्लेयर

Tags: #Aashram 2 #Bobby Deol
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