‘Breathe’ Review:क्या भटकती कहानी में भटक गये अभिषेक

‘Breathe’ Review:क्या भटकती कहानी में भटक गये अभिषेक

By Naseem Shah13 July, 2020 4 min read
‘Breathe’ Review:क्या भटकती कहानी में भटक गये अभिषेक
साइको क्राइम थ्रिलर
50%Overall Score

अभिषेक बच्चन की 2018 में आखिरी फ़िल्म रिलीज हुई थी। अब दो साल बाद अमेजन प्राइम पर उनकी 12 एपिसोड की सीरीज ब्रीद2 आयी है। इस सीरीज से बच्चन परिवार के साथसाथ अभिषेक के प्रशंसकों को भी काफी उम्मीदें थीं। सीरीज सबकी उम्मीदों पर कितनी ख़री उतरी जानने के लिए पढ़ें।

निर्देशक: मयंक शर्मा
कलाकार: अभिषेक बच्चन, अमित साध, सैयामी खेर, नित्या मेनन
प्लेटफार्म: अमेजन प्राइम

हॉलीवुड में सन 1995 में एक फ़िल्म सेवेन आई थी। ब्रेड पिट और मॉर्गन फ़िल्म में नायक थे। 2 घंटे आठ मिनट की वो फ़िल्म जिसने देखी है उसे 12 घंटे की ब्रीद2 की कहानी जल्दी समझ आ जायेगी। 

अविनाश सबरवाल साइक्रेटिस्ट (अभिषेक बच्चन) इनर लाइट के नाम से अपना क्लीनिक चलाता है। एक दिन अचानक उसकी 6साल की बेटी शिया किडनेप हो जाती है। सबरवाल और उसकी पत्नी आभा (नित्या मेनन) की तमाम कोशिशों के बाद भी शिया का कोई पता नहीं चलता।

तीन महीने बाद सबरवाल के घर पार्सल से एक आईपैड आता है। एक वॉइस के जरिये किडनेपर सबरवाल को मेसेज देता है उसे शिया की जान के बदले कुछ लोगों की जान लेनी होगी। किस को किस तरह से मारना है वो भी किडनेपर ही बतायेगा। 

डॉ सबरवाल अपनी बेटी को बचाने के लिए प्रीतपाल नामक आदमी को गुस्सा दिला दिलाकर मारता है। वह अगली हत्या एक लड़की नताशा ग्रेवाल (श्रुती बापना) की हवस के कारण करता है। वह अगली हत्या अंगद पंडित की डराकर करता है।

किडनेपर कौन है? वह इन लोगों की हत्या क्यों करा रहा है? इतना सुनने के बाद हर कोई जानना चाहेगा लेकिन तीसरे एपिसोड में जैसे ही पता चलता है कि सबरवाल ही अपनी बेटी का किडनेपर है वहीं इंटरेस्ट कम हो जाता है।

अब दर्शक का जानना चाहता है कि एक बाप अपनी ही बेटी को किडनेप करके खुद को ही वीडियो क्यों भेज रहा है। निर्देशक इसका लॉजिक देने के लिए सब प्लाट में बहुत सारी कहानियां सुनाकर जस्टीफाई करने की कोशिश करता है।

जैसे एक दिन अविनाश अपने मां बाप के साथ कहीं जा रहा था। बस का एक्सीडेंट हुआ उसकी मां उसकी आंखों के सामने मर गई। वह अपने आपको अविनाश की जगह खुद को जे समझने लगा। अब अविनाश को अगर कोई कुछ कहता है तो उसके अंदर का जे बाहर आ जाता है। जे रावण से प्रभावित है। वह उसके दस सरों को उसकी कमजोरी समझता है। गुस्सा, लस्ट, डर, लालच, अंहकार आदि।

अब अविनाश सारी हत्याओं को रावण वाली थ्योरी से जस्टीफाई करता है। प्रीतपाल को गुस्सा बहुत आता है उसके गुस्से के कारण अविनाश का डॉगी मर जाता है। नताशा के लस्ट के कारण हॉस्टल में उसकी पिटाई होती है और अंगद के डर से अविनाश का एक दोस्त मर जाता है।

कहानी इतनी भी सीधी होती तो समझ आती लेकिन अभी इसमे क्राइम ब्रांच ऑफिसर कबीर सावंत की एक लड़की के साथ अलग कहानी चल रही है। जो उसके पास्ट से जुडी है। कबीर के साथी प्रकाश की एक लड़की के साथ कहानी चल रही जो उसके पास्ट से जुडी है। क्राइम ब्रांच ऑफिसर जेबा किसी भी तरह कबीर से केस छीनना चाहती है। एक पार्ट टाइम प्रोस्टीटयूट शर्ली जिसका जे के साथ अफेयर चल रहा है। अविनाश की अपनी पत्नी के साथ अलग कहानी चल रही है। शिया के साथ किडनेप एक और लड़की बार-बार भागने की कोशिश कर रही हैं। अविनाश को पालने वाले मूर्ति सर मरते-मरते कुछ और ही बता रहे हैं। लेखक खुद नहीं समझ पा रहा है कि उसे क्या दिखाना था और क्या नहीं। 

सिनेमा की नज़र से

सिनेमा की नज़र से देेखें तो सीरीज को चार बड़े लेखकों ने मिलकर लिखा है। इनमें से तीन ब्रीद 1 का भी पार्ट रहे हैं। इनमें भी भवानी अय्यर जबकि ब्लैक, भ्रम, 24, क़ाफिर और बहुत सी फ़िल्में और सीरीज लिख चुके हैं। उसके बाद भी कहानी में इतने सारे सब प्लॉट हैं कि मैन प्लाट क्या है, उसी में दर्शक भटक जाता है। लेखक कभी कहता है कि रावण की दस आदतें उसकी कमजोरी थीं कभी कहता है कि वो दस बातें रावण की ताकत थीं। लेखक खुद कन्फ्यूज लगता है।

ऐसा लगता है कि जैसे बॉलीवुड निर्देशकों को किसी ने श्राप दे रखा है कि अगर किसी ने अच्छी सीरीज बना दी तो उसका दूसरा पार्ट वो अच्छा नहीं बना पायेगा। निर्देशक मयंक शर्मा जब इसी लाइन पर पहले ही 8 एपिसोड में एक कामयाब सीरीज बना चुके थे तो इस बार 12 एपिसोड में जबर्दस्ती पता नहीं क्यों खींचा कहानी की मूल आत्मा जे और अविनाश के बीच है। निर्देशक इन्हें स्क्रीन पर अलगअलग दिखा पाने में नाकामयाब रहा। इसी कन्फ्यूजन के कारण दर्शक ना भावनात्मक रूप से ना अविनाश से जुड पाता है और ना ही जे से। अविनाश के जे बनने से पहले की घटनाओं को भी बहुत कम दिखाया गया।

अभिषेक बच्चन के पास एक ही रूप में दो किरदारों को निभाने का इतना अच्छा मौका था। वह भी एक्टिंग में जे और अविनाश के बीच फर्क नहीं कर पाये हालांकि उसमें लेखक निर्देशक की कमी है लेकिन अभिषेक भी किरदारों की गहराई तक नहीं पहुंचे। सारे एपिसोड़ में उनके चेहरे पर लगभग एक ही जैसे भाव रहे जबकि वो रावनन में रावण का किरदार कर चुके हैं।

अभिषेक के अलावा भी अमित साध हों चाहे नित्या मेनन हो प्रकाश कांबले हों एक्टिंग में किसी ने प्रभाव नहीं डाला। कुछ छोटे किरदारों ने जरूर अपनी एक्टिंग के जौहर दिखलाये जैसे प्लाबिता बोर्थाकुर ने एक ज़िंदादिल अपाहिज लड़की के किरदार को किया ही नहीं जैसे जिया हो या फिर सैयामी खेर ने एक पार्ट टाइम प्रोस्टीटयूट के छोटे से किरदार को याद रखने लायक बना दिया।

सीरीज में एक छोटा सा किरदार ज़ेबा (श्रद्दा कौल) का है। कौल जबजब स्क्रीन पर दिखीं ऐसा लगा कैमरा उन्हें पहले से ही जानता है। किसी भी फ्रेम में अपने किरदार से बाहर नहीं दिखीं जबकि पुलिस अफसर होने के बाद भी उनका किरदार थोड़ा निगेटिव था। श्रद्दा कौल के सीन कम हैं पर एक्टिंग सबसे अलग है। इनके अलावा श्रीकांत वर्मा की डायलॉग डिलीवरी भी कमाल की थी। अंगद पंडित के किरदार में पवन शर्मा ने भी अच्छा काम किया।

तकनीकी बात करें तो जितनी अच्छी लोकेशन थी उतना अच्छा कैमरा दिखा नहीं पाया। कई जगह लाईट की प्रोब्लम नज़र आती है। म्यूजिक कहीं अच्छा लगता है तो कहीं नार्मल लगता है।

जो बातें हज़म नहीं होतीं

एक तो अविनाश कब जे होता है और कब अविनाश रहता है पता नहीं चलता। एक लॉजिक मानें कि वह जब लंगडाता है तब जे होता है तो फिर बिना लंगडाये क्राइम क्यों कर रहा है।

एक पेन अविनाश को मुजरिम साबित कर सकता है। अविनाश उस पेन को कूड़े के ढ़ेर में खोजने जाता है। वहां उस से पहले पुलिस पहुंच चुकी है। कोट पेंट पहने अविनाश अचानक से खाकी वर्दी में कूडे वालों के साथ पेन खोज़ता दिखाई देता है। उसके पास कपड़े कहां से आये वो भी उसके साइज के।

स्टेट पुलिस का ट्रांसफर स्टेट में होता है फिर महाराष्ट्र से दिल्ली ट्रांसफर कैसे हो गया जबकि दिल्ली पुलिस तो सेंट्रल पुलिस है।

कोई क्यों देखे

एक दिन में 24 घंटे होते हैं। यह सीरीज 12 घंटे की है अगर इतना समय है तो देख सकते हैं। यह बात अलग है कि कुछ चीजों में मजा आयेगा और कुछ चीजें नॉर्मल लगेंगी।

Tags: #Amazon prime #Breathe: Into The Shadows
Naseem Shah
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Naseem Shah

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