‘Crashh’ Review: एकता कपूर के आडियाज में क्या अब भी दम बाकी है?

‘Crashh’ Review: एकता कपूर के आडियाज में क्या अब भी दम बाकी है?

By Naseem Shah16 February, 2021 4 min read
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‘Crashh’ Review: एकता कपूर के आडियाज में क्या अब भी दम बाकी है?

आल्ट बालाजी और जी5 पर आयी सीरीज क्रैश  जज़्बाती रिश्तों के एहसास की कहानी है। इसमें चार भाई बहनों का दर्द है। परिवार में होने वाली तकरारों की दास्तां हैं। बिन मांबाप के बच्चों की कहानी है। अनाथ आश्रम में पले बढ़े बच्चों का दर्द है जो अनाथ आश्रम के एक कमरे में पलते हैं और अलगअलग घरों में चले जाते हैं। आलिशान घरों में पहुंचकर उन बच्चों की हेसियत क्या होती है? उनको पालने वाले मां बाप उन बच्चों में और अपने बच्चों में क्या फर्क़ करते है। एक औरत घर पाले हुए और पेट में पाले हुए बच्चे में क्या फर्क़ करती है। वह बच्चे उन घरों में बड़े होकर क्या महसूस करते हैं। यह सीरीज उसी की तरफ इशारा करती है। 

लेखक या निर्देशक अपने चार किरदारों के जरिए चार वर्गों के समाजिक ढांचे और उनके रोज मर्रा के जीवन को दिखाने की कोशिश करता है। यह अनाथ आश्रम में एक साथ पले चार बच्चों की कहानी है जिन्हें एक-एक कर अमीर आदमी अपने शोक के लिए घर ले जाते हैं। इन्हीं में से एक बड़ा होकर मुम्बई पुलिस में इंसपेक्टर बनता है। यह इंसपेक्टर हमेशा अपने तीन भाई बहनों को खोजता रहता है।

यह इंसपेक्टर बड़ी मुश्किलों से अपने भाई बहनों को एक-एक करके खोज तो लेता है लेकिन वो उन्हें किसी ना किसी मुश्किल में फंसे मिलते हैं। उनके पास कहने को तो सब कुछ होता है। कहने को मां बाप होते हैं, कहने को भाई बहन होते हैं, कहने को अपना घर होता है लेकिन महसूस करने पर अंदर से वो बहुत अकेले होते हैं। उन के रिश्तों पर ख़ून के रिश्ते भारी पड़ते हैं। उनके पालने वाले मां बापों को जब अपने सगे रिश्तें और गोद लिए बच्चों में से किसी एक को चुनना होता है तो वो अपने ख़ून के रिश्तों को ही चुनते हैं।

यह सीरीज अमर अकबर एंथेंनी  फ़िल्म की तरह ही दिखती है लेकिन एक्टिंग और स्क्रीनप्ले थोड़ा और अच्छा होता तो सीरीज थोड़ी अच्छी हो सकती थी। निर्देशक का काम देखकर ऐसा लगता है कि उन्होंने खुद अपने इन किरदारों के दर्द को महसूस नहीं किया। उन्होंने कहानी को महसूस नहीं किया। वह कहानी के मर्म को नहीं समझ पाये। वह अगर समझ पाते तो उनके किरदार ऑवरएक्टिंग तो बिल्कुल भी नहीं करते। चेहरा रूआंसा कर लेने भर से इमोशन नहीं निकल आते। उसके लिए कागज पर लिखे किरदार को महसूस करना होता है। उसके दर्द को अपने अंदर जीना होता है। वह दर्द किरदारों के चेहरे पर तो दिखता है लेकिन असली नहीं लगता। दर्शक उस से जुड़ नहीं पाता है।

ऑल्ट बालाजी की पिछली कई सारी सीरीज में एक बात कॉमन दिखेगी। वह संगीत और गानों का चुनाव बहुत ही सही करते हैं। इस सीरीज को उन्होंने पुराने गानों की थीम देने की कोशिश की है। हर एपिसोड के शुरू में आर.जे रेडियो पर एक पुराना गाना सुनाती है। उस गाने से ही एपिसोड की शुरूवात होती है। इसके अलावा टाइटल सॉंग भी कुछ हद तक अच्छा लगता है।

इस सीरीज को देखते हुए कई सारी फ़िल्मों की याद आती रहेगी। उनमें से एक गल्ली बॉय  है। सीरीज का एक किरदार गल्ली बॉय के जैसा ही लगेगा। कैसे लगेगा वो देखने पर मालूम होगा? इसके अलावा सीरीज समाज के कई सारे पहलू दिखाने की कोशिश करेगी। उसमें एक हाई सोसायटी की चमक दमक वाली ज़िंदगी के पीछे का कड़वा सच है जिसमें अजनबी लोगों के लिए सब खुश रहने का नाटक कर रहे हैं लेकिन असल ज़िंदगी में कोई खुश नहीं है।

सीरीज मुम्बई की बस्तियों में रहने वाले उन लोगों के दर्द को भी छूने की कोशिश करती है जिनके पास सर छुपाने तक को जगह नहीं है। एक ही खोली में सारा परिवार रहता है। शादियां भी खोली के लिए होती हैं। लड़के वाले खोली के लिए आंख बंद करके अपने लड़के-लड़की की शादी कर देते हैं।

इस सीरीज एक पहलू महिला और पुरूष के बीच असमानता के कुछ बिन्दुओं को भी छूने की कोशिश करता है। एक एक ही मर्द को लेकर दो महिलाओं की सोच को दिखाने की कोशिश भी करता है। एक महिला जो उस पति के लिए पचास बार हाथ की नस काट चुकी है जो किसी और औरत के साथ में रहता है। वह साल में सिर्फ एक दिन के लिए आता है। वहीं उसकी गोद ली हुई बेटी उसे बिल्कुल भी पसंद नहीं करती है।

यह सीरीज कई तकनीकी पहलूओं को भी छूती है। इस जनरेशन पर सोशल मीडिया के प्रभाव को भी दिखाने की कोशिश तो करती है लेकिन देखने में फ़िल्मी ज़्यादा हो जाता है। किरदारों की एक्टिंग थोड़ी ऑवर हो जाती है। लेखक नये ताजा सीन और नये थॉट लाने में कहीं पीछे छूट जाता है। सब कुछ कहीं ना कहीं देखा हुआ सा लगता है। इस सीरीज के कुछ ही सीन देखकर बिना टाइटल पढ़े कोई भी बता सकता है कि सीरीज आल्ट बालाजी की है।

इस समय दुनिया भर की सीरीज में कुछ नया दिखाने की होड़ मची है। स्क्रीन प्ले के नये तरीके रोज जन्म ले रहे हैं। कहानी को कुछ अलग तरह से कहने की कला सीरीजों में देखने को मिल रही है। आल्ट बालाजी की सीरीज क्रैश वैसा कुछ करने में नाकाम रहती है। सीरीज के लेखन में बहुत सी कमियां है। उन कमियों को भी अगर नज़रअंदाज कर दिया जाये तो लेखन बहुत ही साधारण है जो ना संवाद के जरिए और ना ही सीन के जरिए कोई नई बात कह पाता है।

देखें ना देखें?

इस सीरीज के कई सारे पहलूं हैं। हर पहलूं को देखने के बाद किसी नतीजें पर पहुंचना थोड़ा तो मुश्किल है। सीरीज समाज के अलग-अलग कल्चर को दिखाती है। यह चार बिछड़े हुए भाई बहनों की कहानी है। लेखक ने जिनके जरिए से चार अलग-अलग सामाजिक मुद्दों को छूता है। जिन्हें दिखाने में निर्देशक और लेखक के अनुभव की कमी साफ दिखती है। फिर भी सीरीज कैसी है दस एपिसोड देखने के बाद देखने वाले खुद ही फैंसला करें तो बेहतर होगा?

निर्देशक: कुशल जावेरी
क्रिएटर: एकता कपूर
लेखक: अपर्णा नादिग
कलाकार: अदिती शर्मा, अनुष्का सेन, अमिता मोटवानी, राकेश जोशी, माधव शर्मा, कुंज आनंद, जैन इमाम, रोहन मेहरा, यूनिक मल्होत्रा।
प्लेटफार्म: ऑल्ट बालाजी और जी5

Tags: #Alt Balaji #Crashh #Zee5
Naseem Shah
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Naseem Shah

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