‘Mirzapur 2’ Review: भौकाली तो है पर पहले जैसी उम्मीद मत रखना

‘Mirzapur 2’ Review: भौकाली तो है पर पहले जैसी उम्मीद मत रखना

By Naseem Shah26 October, 2020 7 min read
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‘Mirzapur 2’ Review: भौकाली तो है पर पहले जैसी उम्मीद मत रखना

मिर्जापुर 2 हिन्दी की वो चर्चित सीरीज है जिसका पहला सीजन आने के बाद से ही लोग उसके दूसरे सीजन का इंतजार करने लगे थे। इस सीरीज ने हिन्दी पट्टी में ना की अपनी अच्छी खासी पकड़ बनायी बल्कि अपने कंटेट से इंडस्ट्री को एक दिशा भी दी। मिर्जापुर का दूसरा सीजन आने पर सवाल बनता है। पहला सीजन जितना भौकाली था दूसरा सीजन उतना है क्या?

निर्देशक: मिहिर देसाई और गुरमीत सिंह
लेखक: पुनीत कृष्णा और विनीत कृष्णा
कलाकार: अली फज़ल, पंकज त्रिपाठी, दिव्येंदु शर्मा, रसिका दुग्गल, श्वेता त्रिपाठी, अमित सियाल
प्लेटफार्म: अमेजन प्राइम

मिर्जापुर  का दूसरा भाग समझने के लिए मिर्जापुर का पहला भाग देखना अनिवार्य है। पहला सीजन देखे बिना दूसरे का मज़ा बिल्कुल नहीं लिया जा सकता। मिर्जापुर 2 की कहानी वहीं से शुरू होती है जहां पहले की छूटी थी। कालीन भय्या (पंकज त्रिपाठी) के सुपुत्र मुन्ना त्रिपाठी (दिव्येंदु शर्मा) अफीम कारोबारी लाला की बेटी की शादी में भौकाल मचा देते हैं। वह गुड्डु (अली फज़ल) की पत्नी और उसके पेट के बच्चे तक को मार देते हैं। उसके भाई और दाहिने हाथ बबलु (विक्रांत मेसी) को दर्दनाक मौत देते हैं। लाला के होने वाले दामाद को मार देते हैं। वह शादी को शमसान बना देते हैं। यानी गुड्ड की अच्छी खासी ज़िंदगी का सत्यानाश कर देते हैं।

गुड्डू की बहन डिम्पी (हर्षिता गौर) और गोलू (श्वेता त्रिपाठी) एक डॉ (देबेंदु भट्टाचार्य) की मदद से गुड्डु को बचा तो लेते हैं लेकिन उनका एक पैर काम नहीं करता है। वह एक पैर से लंगड़ा कर चलते हैं। सारी सीरीज में गुड्ड बदले की आग में जलते दिखाये हैं। उसी आग में उनके साथ गोलू भी जल रही हैं। वह तो बल्कि बदले की आग के साथ-साथ प्रेम की आग में भी जल रही हैं।

गुड्डु को कालीन भय्या से बदला लेने के लिए पावर चाहिए। सीरीज आने से पहले ही जैसा कि सब अंदाजा लगा रहे थे वो पावर उन्हें मुस्लिम बाहुबली लाला (अनिल) से मिलती है। गुड्डू लाला के घर पर रहते हैं। लाला के अफीम के कारोबार में मदद करते हैं। वह धीरे-धीरे अपना नेटवर्क बनाते हैं। उनके साथ कालीन के वफादार मक़बूल का भांजा बाबर ( आसिफ खान) है। कालीन भय्या की पत्नी बीना (रसिका दुग्गल) हैं जो अंदर की खबर बाहर पहुंचाती हैं।

एक दिन अंदर की ही खबर से गुड्डु अपने लोगों के साथ जाते हैं। मुन्ना भय्या को उनके अंजाम तक पहुंचा देते हैं। कालीन भय्या लेकिन फिर भी बच जाते हैं। यानी सीजन 3 की संभावना बनी रहती है।

सिनेमा की नज़र से

हिन्दी सीरीज में अक्सर देखा गया है। सीरीज का पहला भाग जो भौकाल मचाता है दूसरा कहीं ना कहीं कमजोर पड़ जाता है। सेक्रेड गेम्स  जैसी सीरीज इसका अच्छा उदहारण हैं। मिर्जापुर 2 की तुलना अगर पहले सीजन से ना की जाये तो अच्छा है लेकिन अगर की जाये तो कमजोर है। निर्देशक मिहिर देसाई और गुरमीत सिंह ने बहुत हद तक पहले सीजन जैसा भौकाल मचाने की पूरी कोशिश की है लेकिन वेसा कर नहीं पाये।

निर्देशक गुरमीत सिंह ने पहले सीजन में वो किया था जो बहुत कम लोगों ने स्क्रीन पर देखा था। उनका हर सीन नया सा लगा था। उनकी संवाद शैली ने लोगों को सबसे ज़्यादा आकर्षित किया। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उस भाषा को सुनाया जिस से अकसर लोग बचते थे। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल की उस दुनिया को दिखाया था जहां पेड़ पर लटके आम का भरोसा था लेकिन आदमी की जिंदगी का भरोसा नहीं था। उन्होंने गुडडु और बबलू किरदारों को जरिये ज़ुर्म की उस दुनिया को ख़ंगाला जहां उन्हें कालीन भय्या और मुन्ना भय्या जैसे कालजयी किरदार मिले।

मिर्जापुर  के दूसरे भाग में पुराने किरदारों के साथ छेड़खानी करने से फायदे की जगह नुकसान हुआ है। कालीन भय्या और मुन्ना भय्या को छोड़कर किसी भी पुराने किरदार में पहली सी चमक नज़र ही नहीं आती है। गुड्डु भय्या जिनकी खासियत थी कि वो कुछ भी करने से पहले सोचते नहीं थे। इस बार दस एपिसोड तक वो मुन्ना को मारने के बारे में बस सोच ही रहे हैं। दर्शक जबकि उनसे कुछ और उम्मीद रखते थे।

मिर्जापुर  के दूसरे भाग में किरदार बहुत हैं। इन सभी किरदारों को महत्व देने के चक्कर में मुख़्य किरदारों का महत्व कम हो जाता है। पहले सीजन की अच्छी बात थी लेखक अपने किरदारों को कंट्रोल नहीं कर रहा था। इस सीजन में ऐसा लगता है कि लेखक किरदारों को अपनी सुहूलत के हिसाब से चला रहा है। उनकी सुहूलत के हिसाब से ही उन्हें मदद दे रहा है। गुड्डु भय्या को लाला के घर में पनाह मेरे ख़्याल से लेखक का सही फैसला नहीं था। इसी वज़ह से गुड्डु का संघर्ष कम दिखता है।

मिर्जापुर  के पहले सीजन की जो ताकत थी। मुन्ना और गुड्ड जो एक दूसरे को बिल्कुल भी पसंद नहीं करते थे। हर काम में उनके बीच टकराहट होती थी। मिर्जापुर  सीजन 2 की कमजोरी वही है। गुडडु और मुन्ना अपनी-अपनी ज़िंदगी जी रहे हैं। दस एपिसोड में उनका आमना सामना सिर्फ दो बार होता है। एक बार बीच में और एक बार अंत में।  उनके बीच बदले को लेकर बाकी कोई टकराहट नहीं है। मुन्ना कट्टों का व्यपार कर रहे हैं। गुड्डु बर्फी का व्यपार कर रहे हैं। मुन्ना अपने घर मे  हैं। गुड्डु लाला के घर में सुरक्षित हैं। दोनों ही समय का इंतजार कर रहे हैं। और वह समय सीरीज ख़त्म होने से दस मिनट पहले आता है।

पहले सीजन का जो अंत था। वह हर किसी के लिए बिल्कुल नया था। शादी का एक माहौल और उसमें एकदम से मुन्ना का तांडव देख सबका दिल दहल गया था। इस सीजन का अंत जबकि बड़ा कमजोर सा है। पत्थरों के बीच गोली बारी चल रही है। सब पत्थरों की ओट लेकर एक दूसरे पर गोलियां चला रहे हैं। गोलियां लग नहीं रही हैं। बिल्कुल वेसा ही जैसा सत्तर अस्सी के दशक की फ़िल्मों में होता था।

इस सीजन में जिन नये किरदारों को लिया गया। उनको कहानी के साथ सही से जोड़ा नहीं गया। वह कहानी में अंत तक अपनी जगह तलाशते रहते है। दद्दा (लिलीपुट फारूकी) सिवान वालों के आने से कहानी मिर्जापुर से भटक सी जाती है। सीरीज में कई किरदार हैं जो कई-कई एपिसोड तक स्क्रीन से गायब रहते हैं। उस पर भी संगीत ऐसा कि कभी-कभी सीन के माहौल से ही अलग चला जाता है। एक सीन में गोली बारी चल रही है और संगीत इतना लाऊड हो जाता है कि ध्यान भटका देता है। बावजूद इसके सीरीज अगर दर्शकों को जोड़े रखती है और दस एपिसोड एक साथ देखने के लिए मजबूर करती है तो सीरीज को कामयाब माना जायेगा।

अच्छा क्या लगा

मिर्जापुर  के पहले भाग की भाषा देखने वालों को बहुत पसंद आयी थी। हर किरदार अपनी अलग छवि छोड़ रहा था। एक बाहुबली मारने से पहले लोगों से क,ख,ग सुनता था। मुन्ना भय्या और गुडडु भय्या जिनकी हर बात में गाली निकलती थी। इस सीजन में भाषा की अगर बात करें तो वैसी ही अटपटी है। मुन्ना भय्या अपनी एक्टिंग और संवादों से इस बार और निखरकर आये हैं।

इस बार निर्देशकों ने सिर्फ मार-काट ही नहीं रखी है। मानवीय संवेदनाओं को भी दिखाने की पूरी कोशिश की है। इन चुटकियों में कत्ल कर देने वाले बाहुबलियों के अंदर के इंसान को भी टटोला है। मुन्ना भय्या का एक विधवा स्त्री के साथ शादी और प्रेम उनके किरदार का दूसरा पहलू दिखाता है। गुड्डु भय्या का शबनम से प्रेम और एक यतीम बच्ची को पालना और उसके लिए हथियार डाल देना मानवीय लगता है। इसके अलावा कुछ सीन इतने इमोशनल भी हैं कि रूला देते हैं। खासकर गुड्डु अपने भाई को खोने के बाद जब लंगड़ाता हुआ अपने मां बाप से मिलने के लिए जाता है। एक तरफ उसके भाई बबलू की हार वाली तस्वीर लगी है और दूसरी तरफ अपाहिज गुड्डु बैठा है।

इस सीरीज की सबसे अच्छी और अहम बात है कि हर तरफ एक औरत ही लीड़ कर रही है।  कालीन भय्या की पत्नी अपने बलात्कारी ससुर का अपने ही हाथों से बुरा अंत करती है। मुन्ना की पत्नी खुद सी.एम बनकर कालीन भय्या के अरमानों पर पानी फेर देती है। शरद की मां उसे लीड़ कर रही है। ख़तरनाक सोच वाले जे.पी का अंत भी एक स्त्री के दुवारा ही होता है। एक तरफ गोलू है जिसके कारण दद्दा का खानदान ख़त्म हो जाता है। इस सीजन मे हर असहाय लड़की को मजबूत दिखाया है।
क्या अच्छा नहीं लगा

पहला सीजन जब ख़त्म हुआ था तो सभी का अंदाजा था कि गोलू और गुड्डु अगले सीजन में एक साथ होंगे। उनके साथ में लाला होंगे। वह सब मिलकर कालीन भय्या की सत्ता को उखाड़ देंगे। इस सीजन में ऐसा देखने को भी मिला। लेकिन वेसा नहीं जैसा दर्शकों को उम्मीद थी।

लाला जो एक बहुत ही बड़े महल जैसे घर में रहता है। उसके आस पास पहरा रहता है। वह दस एपिसोड में बहुत ही कम दिखाया गया है। वह मिर्जापुर की लड़ाई से खुद को अलग किए हुए हैं। उसे बस अपनी बेटी और गुड्डु के बीच पनप रहे सबंध की फिक्र है। इतना हल्का लाला का किरदार कुछ जमा नहीं।

लाला की बेटी शबनम अचानक से ही गुड्डु से प्यार करने लगती है। गोलु जो गुड्डु के लिए मन में कुछ रखती है। वह मुन्ना भय्या से बदले की आग में जलने की जगह शबनम के प्यार से जल रही है। दस एपिसोड की सीरीज में गोलू का ऐसा कोई भौकाल नहीं दिखा जिसकी उम्मीद की जा रही थी। गुड्डु भय्या का किरदार भी थोड़ा हल्का ही रहा। वह लाला के घर और एक नाई की दुकान में ही अपनी दबंगई दिखा रहे हैं।

पहले सीजन में शरद के पिता का किरदार कम था लेकिन जितना था याद करने लायक था। उनके किरदार मे एक रोब दिखता था। उनके अंदाज में एक बाहुबली की चाहत झलकती थी। इस सीजन में उनके बेटे शरद का किरदार बहुत ही कमजोर है। वह ना संवादों से और ना ही एक्टिंग सी किसी भी तरह से आकर्षित नहीं करते हैं।

इसके अलावा कुलभूषण खरबंदा पहले सीजन में खामोश रहते थे। उनकी खामोशी में भी एक तूफान था। उनकी खामोशी ही उनके किरदार को बुलंद करती थी। इस सीजन में उनका किरदार ऑपन रखा है। वह बस किसी ना किसी बहाने से अपनी बहु को कमरे में बुलाने का प्रयास कर रहे हैं।

मिर्जापुर के पहले भाग में एक भी जगह कहानी बोझिल नहीं होती है। इस सीजन के कई एपिसोड में ऐसा लगता है कि कहानी को खींचा जा रहा है। कितनी बार लगता है कि कहानी भटक गई है। कहानी को जाना कहीं और था और जा कहीं और रही है। कई जगह बेवजह ही किरदारों की गालियां सुनकर लगता है कि 24 घंटे में कभी तो क्रिमनल भी  बिना गाली के बात कर लेते होंगे।

कोई क्यों देखे?

पहला सीजन अगर देखा है तो दूसरा जरूर देखें। बहुत से ऐसे सवालों के जवाब मिल जायेंगे जो पहले भाग में नहीं थे।  हालांकि इस दूसरे भाग से पहले भाग जैसी उम्मीद रखना बेमानी है।

Tags: #Ali Fazal #Divyendu Sharma #Mirzapur season 2 #Pankaj Tripathi #rasika dugal #sheeba chaddha
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