‘Taj Mahal 1989’ Review: पहले तीन एपीसोड के बाद मज़ा आ जायेगा

‘Taj Mahal 1989’ Review: पहले तीन एपीसोड के बाद मज़ा आ जायेगा

By Naseem Shah18 February, 2020 4 min read
‘Taj Mahal 1989’ Review: पहले तीन एपीसोड के बाद मज़ा आ जायेगा
सोचते रह जाओगे
75%Overall Score

इश्क़ की लज़्जत हर किसी के मुक़द्दर में नहीं होती। इश्क़ बड़ा नाज़ुक होता है। आदमी जिसे उम्र भर समझने की कोशिश करता है लेकिन समझ नहीं पाता है। ताज महल सीरीज मानों तो इश्क़ पर एक फिलॉसफ़ी है। निर्देशक ने जिसे तरह-तरह से समझाने की कोशिश की है। सीरीज कैसी है जानने के लिए पढ़ सकते हैं।

निर्देशक: पुष्पेंद्रनाथ मिश्रा

लेखक: पुष्पेंद्रनाथ मिश्रा

कलाकार: नीरज काबी, गीतांजलि कुलकर्णी, दानिश हुसैन, शीबा चड्ढा, शिरीन सेवानी, अनसुल चौहान, अनुद सिंह चौहान

प्लेटफार्म: नेटफ्लिक्स

ताजमहल के इर्द गिर्द बुनी कहानी दरअसल ज़िंदगी जीने का एक तरीका सिखाती है। ताज महल 89 सात एपीसोड की सीरीज भर नहीं है। इसे देखकर ऐसा लगता है कि जैसे पूरी जिंदगी की एक फिलॉसफ़ी है। इश्क़ का एहसास है। इश्क़ की बेइमानी है। कहानी देखकर ही लगता है कि लिखने वाले ने ज़िंदगी के उतार चढ़ाव को या तो बहुत करीब से देखा है या फिर बहुत करीब से जिया है।

अपनी बात कहने के लिए लेखक ने ताज महल को बीच में रखकर कई सारी प्रेम कहानियों को बुना है। यह प्रेम कहानियां सिर्फ प्रेम कहानियां ही नहीं है। इनमें इंसान की परख़ भी है। उसका दर्द भी है। उसकी आह भी है, उसका इल्म भी है।

इस कहानी को उसके किरदारों के जरिये समझने की कोशिश इस तरह की जा सकती है। अख़्तर बैग(नीरज क़ाबी) फिलॉसफ़ी के प्रोफे़सर हैं। उनकी पत्नी सरिता(गीतांजलि कुलकर्णी) भी फिजिक्स की प्रोफेसर हैं। इनकी कहानी बताती है कि एक उम्र में तो प्रेमी की कविताएं उसकी नॉलेज प्रभावित करती है लेकिन एक उम्र के बाद दूरियां बढ़ती जाती हैं। एक उम्र के बाद प्रोफेशनल ज्ञान पर्सनल लाइफ में भी आ ही जाता है। इल्म का दिखावा इश्क़ की लज्ज़त को मार देता है।

दूसरी कहानी सुधीर मिश्रा (दानिश हुसैन) और मुमताज (शीबा चड्ढा) की है। सुधीर फिलॉसफ़ी में गोल्ड मेडलिस्ट होने के बाद भी एक ट्रेलर की दुकान चलाते हैं। वह एक प्रोस्टीटयूट मुमताज के साथ बिना शादी किये रहते हैं। मुमताज़ जिसने ज़िंदगी की कड़वाहट को किताबों में पढ़ा नहीं जमीन पर जिया है। उसे बडे शायरों की शायरी ज़बानी याद है। अपने हक़ के लिए लड़ती है और अपने आस-पास की औरतों के हक़ लिए लड़ना भी सिखाती है। वह जहां जाती है वहां के माहौल में बगावत भर देती है। उसी के चलते पितृसत्ता के घमंड में लिपटा एक आदमी उसकी हत्या कर देता है।

इनकी अगली पीढ़ी यानी इनके स्टूडेंट उनका इश्क़ अलग है। सुधीर का भान्जा धर्म एक लड़की शिल्पी को प्यार करता है। शिल्पी नाटक करने लगती है। उसके विचार बदलते हैं वहीं धर्म किसी नेता के संपर्क में आ जाता है। वह उसके गुंडों से उस लड़के को पिटवा देता है जो शिल्पी के आस पास नज़र आता है। धर्म की गुंडा गर्दी बढ़ती जाती है और वो शिल्पी को ही थप्पड़ मार देता है। शिल्पी उस से रिश्ता तोड़ लेती है।

एक लड़का अंगद है। वह एक कम्युनिस्ट  लड़की से प्यार करने लगता है। वह भी उस से प्यार करती है। वह दोनों ही समझदार हैं। वह दोनों ही दुनिया को अलग तरीके से समझते हैं लेकिन प्रेम में एक दूसरे से पहल नहीं कर पा रहे हैं।

इनके अलावा एक और लड़का है जो एक लड़की को प्यार के जाल में फंसाकर किसी को बेच देना चाहता है। आखिर में इसी कहानी से सारी प्रेम कहानी जुड जाती हैं। सारे के सारे किरदार उसे फसाने और बचाने का काम करते हैं।

सिनेमा की नज़र से

फिलॉसफ़ी किताबों में तो ठीक है। सिनेमा में यानी पर्दे पर उसे उतारने की लिए सिनेमा के तरीके से ही अपनी बात को कहना होगा। इस सीरीज के पहले तीन एपीसोड देखने में बहुत ही सब्र की जरूरत है। पहले तीन एपीसोड में बहुत कुछ नहीं हो रहा है।

ताज महल के तीन एपीसोड देखने के बाद लेकिन आप एक अलग दुनिया में दाखिल हो जाते हैं। फ़ोन नहीं हैं, व्हाटसप नहीं हैं, नेट भी नहीं है। बस सिनेमा है। वक़्त लेकिन उस वक़्त भी लोगों के पास नहीं है। कोई फिलॉसफ़ी को पढ़ा रहा है और समझ नहीं रहा है। कोई फिलॉसफ़ी को पढ़ा नहीं रहा है लेकिन समझकर जी रहा है।

ताज़महल सीरीज लखनऊ की जमीन पर दिखाई देती है। बहुत जगह लखनऊ की भाषा सुनाई देती है लेकिन बहुत जगह नहीं सुनाई देती है। इतने सारे किरदार हैं कि उन्हें समेटना और सबको मुकम्मल करना बड़ी चुनोती है जिसे निर्देशक ने बड़ी आसानी से कर दिखाया।

एक तरफ रूमानियत है और एक तरफ ज़िंदगी की कड़वी सच्चाई। एक तरफ बढ़ती गुंडा गर्दी है और एक तरफ कम्युनिष्ट विचार। एक तरफ संगीत है तो एक तरफ थिएटर है। निर्देशक इन सबको एक साथ लेकर चला है। उसने एक साथ तीन पीढियों के इश्क़ को साधने की कोशिश की है। उसी में उसने पितृसत्ता से लेकर लोकतंत्र, समाजवाद, साम्यवाद सब को कहीं ना कहीं छुआ है और जहां मौका मिला है। उस पर कटाक्ष भी किया है।

निर्देशक के काम को नीरज क़ाबी और दानिश हुसैन के साथ शीबा चड्डा ने अपनी एक्टिंग से आसान कर दिया है। शीबा की एक्टिंग वाकई क़ाबीले तारीफ है उन्होंने जिस तरह से मुमताज के किरदार को समझा है। वह हर किसी के लिए आसान नहीं था। दानिश ने एक ऐसे फलॉसफर के किरदार को जिया है जो अपने पढ़े को जी रहा है। वह अपने किरदार को वहां तक ले जाते हैं जहां समझने की हद हो जाती है। नीरज काबी अपने शायराना मिज़ाज से दर्शकों के दिल में गुदगुदी कर देते हैं।

सीरीज के बीच-बीच में कुछ गाने और उनका संगीत भी दिल को छू लेता है। बीच-बीच में ख़ुमार, ग़ालिब, फैज, फराज़ की शायरी भी सुनने को मिलती रहती है। जिस से माहौल ना बहुत गम्भीर होता है और ना बहुत हल्का रह जाता है। ताज महल को देखने के बाद कुछ तो है जो महसूस होता है।

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Naseem Shah
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Naseem Shah

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