‘The Married Woman’ Review: ऑल्ट बालाजी की यह सीरीज बाकियों से कैसे अलग है?

‘The Married Woman’ Review: ऑल्ट बालाजी की यह सीरीज बाकियों से कैसे अलग है?

By Naseem Shah12 March, 2021 5 min read
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‘The Married Woman’ Review: ऑल्ट बालाजी की यह सीरीज बाकियों से कैसे अलग है?

ऑल्ट बालाजी की बाकी सीरीज में अब तक हमने देखा कि हर सीरीज में एक आदमी होता है। उस आदमी के साथ एक लड़की होती है। दोनों के बीच प्रेम या तो पहले ही होता है या फिर हो जाता है। उन दोनों के कुछ पिकनिक सीन, बेडरूम सीन, अपने प्यार को पाने के लिए समाज से लड़ने या टकराने के सीन, क्राइम थ्रिलर कहानियां। लेकिन दा मैरिड वुमेन  इन सब से बिल्कुल अलग है। इसमें शादी के बाद बेरंग हो चुकी एक औरत की ज़िंदगी में रंग भरने के लिए हमेशा की तरह एक लड़का नहीं आता है। हमेशा की तरह एक औरत को कैसे जीना चाहिए? समझाने के लिए एक आदमी नहीं आता है। एक लड़की आती है। एक आजाद ख़्याल लड़की एक सामाजिक जिम्मेदारियों के बोझ से दबी औरत को जीना सिखाती है।

दा मैरिड वुमेन  की कहानी 1992 के समयकाल में चल रही है जिसे मंजू कपूर के उपन्यास ‘दा मैरिड वुमेन’ से लिया गया है। यह बात अलग है कि निर्देशक साहिर रज़ा ने उस समय के दिल्ली और वहां के पॉलीटिकल व सामाजिक इतिहास को कितना सही दिखाया है। कहानी आस्था (रिद्धि डोगरा) को शूत्रधार बनाकर बतायी गई है। आस्था अपनी ज़िंदगी के तजुर्बे बताती चलती है। जरूरी नहीं की हर औरत के साथ ऐसा ही होता हो। लेकिन ज़्यादातर के साथ लेकिन वैसा ही होता है।

आस्था कहानी को अपनी शादी के एक्साइटमेंट से शुरू करती है। शादी के कुछ दिनों बाद जब उसके दो बच्चे हो जाते हैं। उसकी ज़िंदगी का सारा रोमांस जिम्मेदारियों में तब्दील हो जाता है। वह दो बच्चों की अच्छी मां होने की जिम्मेदारी निभाने लगती है। एक पति की अच्छी पत्नी होने की जिम्मेदारी निभाने लगती है। वह जिस कॉलेज में पढ़ाती है उस कॉलेज में अपने लिखे रोमियो जुलियट के रूपांतरण को लेकर उसकी मुलाकात नाटक कार एजाज़ खान (इमादुद्दीन शाह) से होती है।

एजाज़ खान के किरदार का स्थान, समय और खूबियां, चुनोंतियां देखकर नुक्कड़ नाटकों के जनक सफ़दर हाशमी की याद आने लगती है। एजाज खान बाबरी मस्जिद के बाद समाजिक तनाव के बीच दोनों ही तरफ के लोगों के निशाने पर है। एजाज खान और आस्था में पहले तो नाटक को लेकर बहस होती है। आस्था को एजाज जैसे जिंदादिल कलाकार के साथ कुछ समय रहने के बाद उस से प्यार हो जाता है। एजाज लेकिन पहले ही शादीशुदा है। उसकी पत्नी पीपलिका खान(मोनिका डोगरा) जो खुद भी एक ज़िंदादिल कलाकार औरत है।

एक नाटक करने के बाद एजाज़ लोगों के हाथों मारा जाता है। एजाज की मौत के बाद आस्था की मुलाकात उसकी पत्नी पीपलिका से होती है। यह दोनों ही औरतें अपने-अपने सामाजिक संस्कारों के साथ दो अलग-अलग दिशाओं में खड़ी हैं। एक जो अपने पति के मरने के बाद भी लोगों के सामने खुलकर नहीं रोती है। वह उसकी बेवा होने का कोई फर्ज़ नहीं निभा रही है। वह उसकी मौत के बाद भी अपनी सभी जरूरतें पूरी कर ले रही है। इसका मतलब लेकिन ये नहीं कि वो अपने मरने वाले पति से प्यार नहीं करती है।

एक तरफ आस्था है। उसका पति अब उम्र के दूसरे पड़ाव की तरफ बढ़ रहा है। दोनों के बीच रोमांस धीरे-धीरे जिम्मेदारियों में बदल रहा है। उनकी जरूरतें रस्म बनती जा रही हैं। ऐसे में पीपलिका आस्था को खुद से प्रेम करना सिखाती है। आस्था को जब खुद से प्यार होता है तो उसे पीपलिका से भी प्यार हो जाता है। यह दोनों एक दूसरे के लिए रोमियो जूलियट हो जाती हैं। अपने प्यार को लेकर किसी भी तरह का समझोता करने से इंकार कर देती हैं।

यह समाज जो दो अलग धर्मों के लड़का लड़की को बर्दाश नहीं कर पाता वो भला दो औरतों को कैसे बर्दाश करता। आस्था का पति, उसकी ससुराल वाले और उसके अपने घरवाले, उसकी अपनी मां उसका रास्ता रोकने आ जाती हैं। यही हाल पीपलिका का भी होता है। इन दोनों से समाज के हवाले से बहुत सारे सवाल पूछे जाते हैं। यह दोनों औरतें उन सवालों के जो जवाब देती हैं। दरअसल वही इस सीरीज के 11 एपिसोड का निचोड़ हैं।

सिनेमा की नज़र से

किसी भी कहानी को इस बात से नहीं जांचा जा सकता कि उसका सब्जेंक्ट कितना गम्भीर है बल्कि इस बात से आंका जाना चाहिए कि उस सब्जेक्ट को दिखाया किस तरह से है। दिल्ली से जिनका ताल्लुक रहा है वो पहला सीन देखते ही समझ जायेंगे कि निजामुद्दीन के सामने खड़ा हुमायूं का मकबरा फ्रेम में है। दिल्ली में जिनका ताल्लुक जामिया यूनिवर्सिटी से रहा है वो देखते ही समझ जायेंगे कि सीरीज की शूटिंग जामिया यूनिवर्सिटी के किस-किस डिपार्टमेंट में हुई है।

निर्देशक साहिर रजा ने सीरीज में दो औरतों के प्रेम के बैकग्राऊंड में जो पॉलीटिकल और धार्मिक चीजें रखी हैं। ऐसी ही ठीक चीजें दीपा मेहता की फायर  फ़िल्म में देखने कों मिलेंगी। हालांकि फ़िल्म और सीरीज के बीच समानता होकर भी बहुत दूरियां हैं। यह सीरीज दो औरतों के मुद्दे तक तो सही है लेकिन जैसे ही पॉलीटिकल होती है। वहां कई सारे सवाल खड़े हो जाते हैं। जैसे- 1992 में बाबरी के बाद दिल्ली में लम्बें समय तक क्या वही कर्फयू के हालात थे जिस तरह से सीरीज में दिखाया गया है? बाबरी के बाद क्या दिल्ली में कभी फसाद हुए थे? क्या वहां के लोग एक दूसरी कम्यूनिटी के ख़िलाफ वैसी ही भावना रख रहे थे जैसा कि सीरीज में दिखाया गया है?

निर्देशक साहिर रजा ने कला और कलाकार के बीच सच्चे रिश्ते को तो बहुत खूब दिखाया है। उसके लिए उन्होंने ग़ालिब, फैज़ और फराज़ और इस्मत चुगतई जैसे शायरों की ना कि शायरी सुनायी बल्कि देखने वालों को उनसे रूबरू भी कराया। लेकिन सीरीज जैसे ही आगे बढ़ती है तो बोझिल सी हो जाती है। बीच में जाकर सीरीज थोड़ी लम्बी खिंचने लगती है। उसके बावजूद भी हालांकि निर्देशक की पकड़ से बाहर नहीं जाती है।

निर्देशक ने प्रेम में पड़ी दो महिलाओं के मन को बहुत करीब से छूने की कोशिश की है। उसने सीरीज को फलॉसफी से बचाकर जमीन पर ही रखा है। इसमें सीरीज के किरदार खासकर रिद्दि डोगरा ने बहुत सी शानदार भूमिका निभाई है। उन्होंने एक समाज के बंधनों में बंधी औरत जब किसी आजाद विचारों वाली महिला के प्रेम में पडेगी तो उसकी क्या हालत होगी। अपनी एक्टिंग से हुबहू वैसा ही दिखाने की कोशिश की है। उनके चेहरे के भाव, बॉडी लेंग्वेज, उनका अनकम्फर्ट होना, उनकी झिझक उनके किरदार के सामाजिक दायरे में ही रखती है। रिद्धि डोगरा के साथ दूसरी महिला का किरदार निभा रहीं मोनिका डोगरा हालांकि कई बार ज़्यादा ऑवर होकर अपने किरदार से बाहर निकल जाती है।

इमादुद्दीन शाह सीरीज में जिन्होंने एजाज नाम के एक नाटक कार की भूमिका को निभाया है। इमादुद्दीन ने एक जिंदादिल नाटक कार के किरदार को आजाद ख़्याली, सधी हुई भाषा और साहित्य पर समझ से स्क्रीन पर ज़िंदा कर दिया। उनके अलावा नादिरा बब्बर जिन्होंने एक घरेलू औरत की भूमिका को सही से निभाया है।

इस सीरीज के टाइटल एक बड़ी शायराना नज़्म ‘बेमतलब, बेमतलब’ की धुन पर चल रहे हैं। इस नज़्म के बोल सीरीज की थीम को समझाने में काफी मदद करते हैं। इस सीरीज की लेखक अपर्णा नड़िग,जया मिश्रा, सुरभी सरल ने संवादों से सीरीज का माहौल भी शायराना बनाए रखा है।

देखें ना देखें?

दा मैरिड वुमेन  आल्ट बालाजी की बाकी सीरीज से अलग अपनी पहचान बनाने में कामयाब होती है। इस सीरीज को तीन पार्टों मे देखा जा सकता है। एक पार्ट जो कला में कलाकार की आस्था को दिखाता है। एक पार्ट सामाजिक ढांचे की खामियां को दिखाते हुए इश्क़ की खूबसूरती को दिखाने की कोशिश करता है। एक पॉलीटिकल चीजें को छूता है। आल्ट बालाजी पर कुछ अच्छा देखने की इच्छा रखने वाले लोग देख सकते हैं। हालांकि यह बात जरूर है कि बीच में जाकर सीरीज थोड़ा सा बोझिल जरूर करेगी लेकिन जल्द ही उस से बाहर भी ले जायेगी।

निर्देशक: साहिर रज़ा
कलाकार: रिद्धि डोगरा, मोनिका डोगरा, इमादुद्दीन शाह, नादिरा बब्बर।
प्लेटफार्म: ऑल्ट बालाजी और जी5

Tags: #Alt Balaji #The Married Woman #Zee5
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Naseem Shah

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