एक आदमी को अच्छा और बेहतर जीवन जीने के लिए जिन चीजों की ज़रूरत पड़ती है, उनमें से एक भाषा है। भाषा की जितनी ज़्यादा जानकारी होती है, भाषा उतनी अच्छी होती है। जितनी अच्छी भाषा सुनी जाती है, भाषा उतनी ही निखरती है। भाषा जितनी निखरती है, आदमी भी उतना निखरता है। अच्छी ज़बान दिल में विश्वास पैदा करती है। बेहतर ज़बान वाले भी अपनी ज़बान को और ज़्यादा बेहतर बनाने के लिए महफिलों का आगाज़ किया करते हैं। वहां उस्तादों की ज़बान को सुनते हैं, उनके बोलने के तौर तरीके और अंदाज से अपनी ज़बान को दुरूस्त करते हैं। इस वक़्त में ज़बान और तहज़ीब की इन महफिलों में ज़रूर जाना चाहिए।

उर्दू रीडिंग्स (तमाशा)

तमाशा आराम नगर वर्सोवा में मौजूद है। यह उर्दू महफिलों के लिए बहुत ही प्यारी जगह है। यहां हर महीने किसी ना किसी बहाने उर्दू की महफिल लगती है। इस बार उर्दू रीडिंग के रूप में एक महफिल लगने वाली है। इस महफिल में उर्दू के बहुत ही मुहज्ज़िब लोगों के कलाम और उनकी ज़िंदगी के बारे में बात की जायेगी। कुछ उर्दू अबद के लोगों की ज़िंदगी को उनके ख़तूत के ज़रिये समझने की कोशिश की जायेगी।

परवीन शाकिर

इस बार उर्दू रीडिंग में मशहूर शायरा परवीन शाकिर की गज़लों और नज़्मों पर बात की जायेगी। जिनकी शायरी को औरतों के बहुत ही नज़दीक माना जाता है। उनकी शायरी में हर औरत कुछ ना कुछ अपना हिस्सा तलाश ही लेती है।

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सारा शगुफ्ता

सारा शगुफ्ता के बारे में बहुत कुछ इसलिए भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि क़ुदरत ने जमाने के साथ मिलकर उन पर इतने सितमा किये कि बहुत कम उम्र में वो दुनिया से चली गईं। सारा का हर लफ्ज़ जैसे उनके सीने में उठते दर्द में भीगा हुआ है। उन्होंने जो सितम झेले उनकी नज़्मों में साफ नज़र आते हैं।

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फहमीदा रियाज़

फहमीदा रियाज पैदा तो मेरठ की जमीन पर हुई थीं। वक़्त लेकिन करोणों लोगों के साथ उनकों भी सरहद के पार बहा ले गया। उस तरफ जब ज़ुल्म बढ़ा और इन्होंने लिखना नहीं छोड़ा तो इन्हें फिर से भारत में पनाह लेनी पड़ी। भारत ने उनकी मदद भी की थी। फहमीदा की से समाज, वक़्ती हालात और सियासत नहीं बचती है। सियासत इस पार की हो या उस पार की फहमीदा लिखती रहीं हैं।

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जश्न ए क़लम

जश्न कलम की शुरूवात तक़रीबन चार साल पहले हुई थी। इस दौर में जब हर चीज बड़ी जल्दी और बनावटी सी मिल जाती है। जश्न ए क़लम में कहानी को एक्ट के साथ नये रूप में दिखाने की पहल हुई। इस पहल में जो लोग जुड़े जनाब के.सी शंकर, राकेश चतुर्वेदी ऑम, राजेश कुमार, शाशवता शर्मा हैं। यह सभी लोग थियेटर से जुड़े रहे हैं। किसी ना किसी तौर पर इनका लगाव थियेटर से रहा है। के.शी शंकर के मुताबिक जश्न ए क़लम में अब तक 400 शौ और 200 से ज़्यादा स्टोरी पर काम हुआ चुका है। जश्वन ए कलम में उर्दू, हिन्दी लेखकों की कहानियों को शौलो आर्ट में किया जाता है। जश्न कलम में इस बार नवम्बर 25 को राजेंद्र यादव, कमलेश्वर, अशद मुहम्मद खांन की कहानियों को दिखाया व सुनाया जायेगा। उर्दू अदब की इस महफिल में ज़रूर शिरक़त कीजिएगा, आपका इंतजार रहेगा।

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उर्दू महफिल ( पृथ्वी थियेटर)

पृथ्वी थियेटर में  हर महीने दूसरे बुध्वार यानी ट्यूज़डे को महफिल का आगाज़ होता है। इस महफिल में बहुत से वक़्त के उस्ताद शायर तशरीफ लाते हैं। उर्दू पर बात की जाती है। किसी बड़े उस्ताद के बारे में बात की जाती है। किसी भी भाषा को ज़बान को अपना समझने वाले इस महफिल में जा सकते हैं। इस महफिल में सभी का बिल्कुल मुफ्त में स्वागत है।

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दास्तानगोई

उर्दू की पुरानी हो चुकी कहानियों को नई तरतीब में सुनाने का काम दास्तानगोई में  बखूबी किया जाता है। दास्तानगोई एक पुरानी फनकारी है, जिसमें दो लोग बैठकर क़ायदे से कहानी सुनाते हैं। बंटवारे तक आते-आते इसका चलन पूरी तरह से कम चुका था। इस फनकारी अदाकारी को दौबारा से वापस ज़िंदा महमूद फारूक़ी ने किया। इसका धीरे-धीरे शोर होता गया। अब इसके हर माह कहीं ना कहीं शॉ हो रहे होते हैं। दिल्ली एन.सी आर में इसके शॉ होते रहते हैं।

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इस तरह की महफिलें हर शहर में चल रही होती हैं। हर शहर में कुछ ना कुछ चल रहा होता है, इस महीने मुम्बई में होने वाले प्रोग्राम के बारे में हम बताते रहेंगे। आप भी नज़र रखना।