कैफ़ी आजमी का 100 वां जन्म दिन मुम्बई में धूमधाम से मनाया जायेगा

कैफ़ी आज़मी सिर्फ एक नाम नहीं कारवां हैं। उस सिलसिले का जो अब से कई दशक पहले दुनियां जहान के तज़ुर्बे लेकर मुम्बई पहुंचा था। आज भी लिखने वाले उस कारवां के निशां खोजते चलते हैं। उन्होंने कम लिखा या ज़्यादा लिखा इस बात पर कोई बहस नहीं है। उन्होंने जो लिखा आज भी सुना जाता है कि नहीं, उन्होंने जो लिखा आज भी उसका दिलों पर असर होता है कि नहीं, उन्होंने जो लिखा वह सच है कि नहीं सवाल इस बात पर होना चाहिए। कैफ़ी साहब 13 जनवरी 1919 को उत्तर प्रदेश आज़मगढ़ के एक जमींदार घराने में पैदा हुए। इस साल 13 जनवरी 2019 को उनका 100 वां जन्म दिन है। इस मौके पर उन्हें याद करते हुए उनकी ज़िंदगी की कुछ ख़ास बातें।

पूत के पांव पालन में

“इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े

हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े”

यह उस ग़ज़ल का मतला है जो कैफ़ी साहब ने सिर्फ 11 साल की उम्र पढ़ी थी। बकौल जावेद साहब और सबाना आज़मी के प्रोग्राम कैफ़ी साहब के दादा ज़मीनदार थे। उस ज़माने में मुस्लिम ज़मींदारों के अदबी शोकों में शायरी भी एक शोक हुआ करता था। उनके यहां अक्सर शायरी की महफिलें लगा करती थीं। यक़ीनन उन महफिलों का और अपने बड़ों का कैफ़ी पर कुछ तो असर हुआ ही होगा जो उन्होंने बचपन में ही एक ग़ज़ल लिख ड़ाली।

एक दिन 11 साल के क़ैफी ने मौका पाकर अपने बड़ों की महफिल में वह ग़ज़ल सुना भी दी। ग़ज़ल सुनकर उस्तादों ने पूंछा ” आपने यह किसकी गज़ल पढ़ी है”। क़ैफी ने खुश होकर जवाब दिया ” हमने ख़ुद लिखी है” इस बात पर उन्हें काफी डांट पड़ी ” एक तो दूसरों के शैर चुराते हो, उपर से झूंठ बोलते हो”। उस दिन उनकी बात पर किसी को यक़ीन नहीं हुआ लेकिन बाद में बैगम अख़तर की आवाज में उस ग़ज़ल को दुनिया ने सुना।

“उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे”

कैफ़ी आज़मी की अच्छी नज़्मों में से भी कुछ अच्छी नज़्में निकाली जायें तो एक नज़्म ” उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना तुझे” जिसने औरत को एक नया आयाम दिया। जिसमें उन्होंने नाज़ नख़रे उठाने वाली माशूका की तारीफ कर उसे चांद पर चढ़ाने की बात नहीं की। उन्होंने उस से जिस हाल में वह हैं, उसी हाल में चलने की गुज़ारिश की। इस नज़्म को सुनकर कितनी औरतें जो अपने हमसफर के साथ चल नहीं रहीं थीं उनका बोझ ढ़ो रही थीं। उन्होंन इस नज़्म को अपना बना लिया।

एक लोक शायर की यही ख़ूबी होती है। वह जो सुनाता है उसे लोग अपने साथ लेकर जायें। कैफ़ी साहब की नज़्म सुनकर उनकी चाहत, उनका इश्क़, उनकी मुहब्बत, शोकत आज़मी उनके साथ चलने के लिए अपना घर छोड़कर मुम्बई चली आयीं और आखिरी क़दम तक उनके साथ चलीं।

कैफ़ी आज़मी, बेटी शबाना और पत्नी शोकत आज़मी के साथ source

ज़मीन पर सोने वालों का दर्द समझते थे।

एक शायर एक कलाकार अपने दर्द से प्रेरित होकर लिखता है या ज़माने के दर्द में डूबकर लिखता है। कैफ़ी साहब इसकी एक मिशाल हैं। बचपन से ही उनका मिजाज़ शायराना और ख़्याल में बग़ावत  थी। उन्हें मौलाना बनने के लिए भेजा गया था और वह इसका उल्टा कॉमरेड बन बैठे। अपने इसी मिजाज़ की वज़ह से उन्हें परेशानियां भी बहुत उठानी पड़ीं। उनका पहला बच्चा मुफ़लिसी में ही चल बसा। कैफ़ी सिर्फ 40 रूपये माहवार कमयूनिष्ट पार्टी के पेपर में  लिखते थे। उन्होंने एक किराये के घर से बंगले तक हर दौर देखा था।

वक़्त ने किया क्या हसीं सितम

बॉलीवुड़ को लेकिन अच्छा लिखने वालों से थोड़ा परहेज़ रहा है। प्रेमचंद, कृष्ण चंदर, मंटो, इस्मत कुछ  इसकी मिसालें  हैं। जो फिल्मी दुनिया से ज़्यादा साहित्य में कामयाब रहे। कैफ़ी साहब ने इस्मत और उनके सोहर के कहने पर फ़िल्मों में लिखना शुरू किया। उनकी पहली बड़ी फ़िल्म “कागज़ के फूल” थी। इस फ़िल्म के गाने तो बहुत हिट हुए लेकिन फ़िल्म नहीं चल सकी। इस फ़िल्म के बाद “शोला और शबनम” इसके बाद “अपना  हाथ जग्गनाथ” फ़िल्म के गाने हिट रहे, लेकिन फ़िल्म नहीं चल पायी। और एक प्रगितशील लेखक को बॉलीवुड ने फ़िल्मों के लिए अनलकी मान लिया।

चेतन आनंद ने कई फ़िल्मों की असफलता के बाद जब हक़ीक़त बनाई तो उनसे यह कहकर गाने लिखवाये “आपके भी सितारे गर्दिश में हैं मेरे भी सितारे गर्दिश में हैं” दोनों  मिलकर कुछ पॉजिटिव करते हैं” और फ़िल्म हक़ीकत के गाने “कर चले हम फ़िदा जानों तन साथियों” ने चेतन और कैफ़ी को बहुत बड़ी सफलता दी।

कैफ़ी और नसीम

कैफ़ी आज़मी एक अच्छे शायर थे। यह बात लेकिन कम लोग जानते हैं कि वह एक अच्छे कहानीकार भी थे। उन्होंने फ़िल्म ” हीर रांझा” की पूरी पटकथा काव्य शैली में लिखकर बॉलीवुड में दौबारा ना होने वाली मिसाल पेश की। बॉलीवुड़ में बंटवारे पर सबसे बेहतर मानी जाने वाली फ़िल्म “गर्म हवा” उन्होंने ही लिखी। सईद अख़तर मिर्ज़ा की फ़िल्म “नसीम”  में उन्होंने बदलते हालातों से जूझ रहे  एक बूढ़े आदमी का किरदार निभाकर उसका दर्द बयां किया। नसीम उनकी बेहतरीन अदाकारी का भी एक नमूना है।

फ़िल्म नसीम के दृश्य में कैफ़ी आज़मी source

फ़िल्म और साहित्य में कैफ़ी का योगदान

कैफ़ी साहब का मिजाज़ और उनके गीतों की तासीर देखें। ऐसा लगता है कि वह साहित्य के ही आदमी थे। उन्होंने आने वाली पीढ़ी के लेखकों के लिए जो किया, उसके लिए नये लेखकों को उनका शुक्रग़ुजार होना चाहिए। वह इप्टा से जुड़े रहे और  प्रगतिशील लेखक संघ के सदस्य भी रहे। उन्होंने सिनेमा को रूमानियत, प्रेम, और बनावटी कहानियों से परे सच्चाई से रूबरू कराया। उनकी किताब “आवरा सज़्दे” को लोगों ने काफी सराहा। जिसके लिए उन्हें हिन्दी साहित्य अकादमी और सोवियत लैंड पुरूष्कार से नवाज़ा गया। फ़िल्म गर्म हवा और सात हिन्दुस्तानी के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरूषकार से भी नवाज़ा गया। भारत सरकार की तरफ से उन्हें पदम श्री से भी नवाज़ा गया।

कैफ़ी साहब का जन्म तो उनकी वालिदा को याद नहीं था। उनके चंद साथियों ने मिलकर उनका जन्म 14 जनवरी को मुक़र्र कर दिया। उनके अजीज़ हर साल उसी दिन उनका जन्म दिन मनाते हैं। इस साल 14 जनवरी को उनका 100 जन्म दिन है। इस मौके पर  राग शायरी के नाम से एक प्रोग्राम कैफ़ी साहब की याद में किया जायेगा। राग शायरी में उनकी बेटी शबाना आज़मी, जावेद अख़तर, उनकी ज़िंदगी के कुछ खट्टे मीठे लम्हों को अपनी जबानी सुनायेंगे।  शंकर महादेवन, उस्ताद जाकिर हुसेन, पुरबयान चटर्जी अपने संगीत पर उनके गीत सुनायेंगे।

Naseem Shah: