मन्ना डे की आवाज, उनके सुर कानों में पड़ते ही पहचाने जा सकते हैं। उन्होंने अपने जीवन में तीन हजार से ज़्यादा गाने गाये, उन्हें हालांकि ज़्यादातर वही काम मिला जिसे बाकी सिंगर कर पाने में नाकाम रहे।

मन्ना डे अपनी आवाज और अंग्रेजी दोनों के लिए जाने जाते थे। किसी बड़े सिंगर ने उनके बारे में कहा था- “हमारी सदी को इस बात का हमेशा अफसोस करना चाहिए कि हम मन्ना डे जैसे कलाकार की कला को समझने में नाम काम रहे। उस कलाकार को उसकी कला का सही मूल्य नहीं दे पाये।”

मन्ना डे के बारे में कुछ चीजें जिन्हें ज्यादातर लोग नहीं जानते:

हमेशा जीतते थे संगीत प्रतियोगिता

मन्ना डे यानी प्रबोध चंद्र डे 1919 बंगाल में पैदा हुए। मन्ना डे स्कूल में कुश्ती और फुटबाल के शोकीन थे। उनके चाचा के.सी.डे नबीना थे और संगीत में रूचि रखते थे। उन्होंने संगीत के सुर उन्हीं से सीखे थे। उन के स्कूल में हर साल संगीत प्रतियोगिता होती थी। जिसमें वह हर साल भाग लेते थे। उस प्रतियोगिता में जब लगातार तीन साल तक उन्हें कोई नहीं हरा पाया तो आयोजकों ने उन्हें चांदी का एक तानपुरा देकर उनसे अनुरोध किया कि अब आगे से इस प्रतियोगिता में भाग ने लें।

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पिता वकील बनाना चाहते थे

मन्ना डे का बचपन बड़ी ही उथल पुथल में गुजरा। एक समय तक उन्हें खुद नहीं पता था कि उन्हें करना क्या है। उनके पिता जो पढ़े लिखे सभ्य आदमी थे, उस समय के अनुसार उन्हें वकील बनाना चाहते थे। उनके चाचा जबकि उनकी प्रतिभा को समझते थे और उन्हें संगीत के लिए प्रोतसाहित करते रहते थे।

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40 के दशक में अपने चाचा के साथ मुम्बई चले आये।

मन्ना डे अपने चाचा के.सी डे के साथ किस्मत आजमाने मुम्बई चले आये। 23 साल की उम्र में उन्हें पहला गाने का ऑफर मिला, फ़िल्म राम राज्य में शकर राव के संगीत पर उन्होंने अपना पहला गीता गया था।

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मन्ना डे और एस.ड़ी बर्मन

मन्ना डे ने अपना पहला गाना जिस फ़िल्म में गाया था। वह धार्मिक फ़िल्म थी, जिसकी वज़ह से गाना भी धार्मिक ही था। जिसे गाने के बाद मन्ना डे को धार्मिक गाने ही गाने को मिलने लगे। मन्ना डे इस बात से ख़फा थे। ऐसे वक़्त में उन्हें पहला मौका एस.ड़ी बर्मन ने दिया।  बर्मन के संगीत पर मन्ना डे ने ” उपर गगन विशाल” फ़िल्म मशाल के लिए गाया। यह गाना काफी हिट रहा, जिसके बाद बॉलीवुड में उनकी पहचान बनी।

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ऐ मेरे प्यारे वतन

मन्ना डे ने सात साल तक धार्मिक गाने गाये। इसके बाद जो उन्होंने गाने गाये उन गानों का किसी भी सिंगर के लिए गाना आसान नहीं था। बॉलीवुड़ में यह बात आम थी कि जिस गाने को कोई नहीं गा सकता उसे मन्ना डे गा सकते थे। इसलिए जब सब सिंगर मना कर देते तो लोग मन्ना डे के पास ही जाते थे। बॉलीवुड में उनसे बेहतर क्लासिकल गाने वाला नहीं था। फ़िल्म “क़ाबुली” वाला का गीत ”  ए मेरे प्यारे वतन” को गाकर उन्होंने हमेशा के लिए अमर कर दिया।

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उनके काम के बराबर उन्हें सफलता नहीं मिली

मन्ना डे ने तीन हज़ार के आस पास गाने गाये। हिन्दी के अलावा भी उन्होंने और बहुत सारी ज़बानो में गाने गाये लेकिन उन्हें उनके काम के मुताबिक सफलता नहीं मिली। उन्हें जब ” लागा चुनरी में दाग” के लिए फ़िल्मफेयर नहीं मिला तो उन्हें बहुत दुख हुआ और जब ” ए भाई ज़रा देख कर चलो” गाने के लिए फ़िल्मफेयर मिला तो बड़ा ही आश्चर्य हुआ। सिंगरों में रफी उनके सबसे ज़्यादा करीबी थे।

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एक लम्बे सफर से विदा हुए

मन्ना डे को संगीत के लिए स्कूल से ही पुरूषकार मिलने लगे थे। साल 1971 में  उन्हें पद्म श्री और साल 2005 में पदम भूषण मिला। इसके दो साल बाद 2007 में उन्हें दादा साहेब फ़ाल्के से पुरस्कार से नवाजा गया। साल 2013 तक उन्होंने अपनी ज़िंदगी का सफर ज़ारी रखा। इसी साल अपनी कर्कशी आवाज और सुरों के साथ वह हमेशा के लिए विदा लेकर चले गये।

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मन्ना डे की याद में ही महाकवि कालीदास नाट्य मंदिर में 17 नवम्बर को एक आयोजन किया गया है, जिसमें मन्ना डे के गीत, शंकर जयकिशन का संगीत और राजकपूर पर फ़िल्माये गाने सुनने को मिलेंगें।