महाभारत प्राचीन काल की कहानी है। यह कहानी जीवन की एक सीख है। इसमें लालच है, अंहकार है, नारी अस्मिता का सवाल है, छल है, कपट है, वीरों का गौरव है, दानी है, भिकारी है, शत्रुता है, मित्रता है, प्रेम है। इस कहानी में सारे जीवन का सार है। एक इंसान के अंदर जितने भी अच्छाई बुराई हैं, सब इसी में हैं।

महाभारत के बारे में अकसर कहा जाता है। महाभारत का युद्द दुर्योधन के अंहकार के कारण हुआ। दुर्योधन के अंहकार के कारण ही उसके पूरे कुल का विनाश हो गया। इसी कहानी को लेकिन अगर हम दुर्योधन की तरफ से देखें, तो वह अकेला अंहकारी नहीं है, वह अकेला षडयंत्रकारी नहीं है, सभी उसमें शामिल है। इसी अन्याय की कहानी को दुर्योधन दिल्ली के  कमानी थिएटर में 27-28 जुलाई को बताने जा रहा है। दुर्योधन ने यही  कहानी दिल्ली के बाद मुम्बई में 14-15 सितम्बर को बताने जा रहा है। वह कहानी क्या है जानते हैं।

दुर्योधन की मानें तो

महाभारत ठीक-ठीक नहीं पता ना जाने कब लिखा गया। लेकिन आज भी उतना ही प्रासांगिक है जितना जब रहा होगा जब लिखा गया था। यह दुनिया जब तक कायम रहेगी तब तक उतना ही प्रासांगिक रहेगा जितना की आज है। उसमें सीखने के लिए सब कुछ है, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य सब कुछ है। इसके हर पात्र में गुण-दोष हैं।

महाभारत का युद्द हर हाल में होना था। ऐसा कहा जाता है। उसकी भविष्य वाणी क्योंकि बहुत पहले ही चुकी थी। यह बात सब जानते थे कि कुल में एक ऐसा पुत्र पैदा होगा, जो कुल का विनाश करेगा। उस पुत्र का नाम दुर्योधन था। दुर्योधन हस्तिना पुर के राजा धृतराष्ट्र का सबसे बड़ा पुत्र था। वह सो भाई थे इसलिए कौरव कहलाये। धृतराष्ट्र के छोटे भाई पांडू के पांच पुत्र हुए इसलिए वह पांडव कहलाए।

Mahabharata

दुर्योधन को पांडवों से हमेशा जलन होती थी। पांडव क्योंकि आचरण व्यवहार से लेकर हर विधा में उनसे निपुड थे। यही जलन उसके अंहकार में बदल गई। उसका यही अंहकार एक दिन उसे युद्ध के मैदान में खींच  लाया और उसके पैदा होने के पहले की गई भविष्य वाणी कि एक पुत्र कुल का विनाश करेगा सत्य साबित हुई।

महाभारत का युद्ध 19 दिन तक चला। एक कुल के लोग आपस में एक दूसरे को मार रहे थे। सब कुछ ख़त्म हो चुका था। इस सबका जिम्मेदार सबने दुर्योधन को ठहराया। इस नाटक में दुर्योधन का वहीं दर्द है। वह अपना पक्ष रखता है। वह अपने बचाव में सबसे सवाल पूंछता है। उसके सवाल क्या हैं नीचे देख सकते हैं।

दुर्योधन के सवाल

दुर्योधन सबसे पहला सवाल अपने पुर्वजों से और राज्य के लोगों से पूंछता है। एक बच्चा जिसके पैदा होने से पहले भविष्यवाणी कर दी जाती है। कुल का विनाशी पैदा होने वाला है। बचपन से लोगों ने उसे कुल का विनाशी मान लिया। उसके सामने ही लोग बातें करते हैं , वह कुल का विनाश करेगा। उसका बचपन इन्हीं बातों को सुनकर गुज़रता है। वह हमेशा कुल का विनाशी होने वाले ताने को सुनता है। उसकी यह पीड़ा किसी को दिखाई नहीं देती।

दुर्याधन स्वीकारता है कि वह पांडवों को उनका राज्य लोटा देता तो युद्ध नहीं होता। वही युद्ध का पक्षधर था। लेकिन एक योद्धा के लिए जुए में राज्य हार जाने से लड़ते हुए रणभूमि में हार जाना बेहतर है।  उसने युद्ध किया लेकिन छल नहीं किया। जबकि उसके साथ लड़ने वाले लोगों ने कहीं ना कहीं उसके साथ छल किया।

वह कहता है। वह योद्धा जिन्हें हराया नहीं जा सकता था। उसे उन पर भरोसा था। वह सब लड़ कौरवों की तरफ से रहे थे लेकिन इच्छा सबकी यही थी कि जीत पांडवों की हो। उन्हें लगता था कि जो पांडव के साथ है। वो सत्य के साथ है दुर्योधन इन्हीं लोगों से सवाल पूंछता है। युद्ध में सत्य कहां था।

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गुरू दौर्णाचार्य: दुर्योधन पहला सवाल द्रौणाचार्य से पूंछता है। क्या आपने अपने गुरू होने का कर्तव्य निभाया। उसके सौ भाईयों में से किसी को भी किसी विधा में सर्वश्रेष्ठ नहीं बनाया जबकि पांचों पांडवों को किसी ना किसी विधा में सर्वश्रेष्ठ बनाया।

दुर्योधन सवाल करता है। रणभूमि में अश्वथामा के मारे जाने की झूंठी ख़बर फैलाकर आप पर वार करना। क्या यह छल नहीं था? क्या यह सत्य था?

भीष्म पितामाह: दुर्योधन भीष्म पितामह से सवाल करता है। युद्ध और जुआ दोनों में ही जीतना राजा की शान थी तो दुर्योधन का जुए मे जीता गया राज्य उसका कैसे नहीं हो सकता था। क्या वह युद्ध नहीं रोक सकते थे।

भीष्म पितामह आप कौरवों की तरफ से लड़ रहे थे। लेकिन आपकी इच्छा यही थी कि जीत पांडवों की हो। पांडव जब आपका मुकाबला नहीं कर पाये तो आप ने खुद ही उन्हें शिखंड़ी के रूप में अपनी पराजय का उपाय बता दिया। यह रणभूमि में खड़े योद्दा के लिए सही था।

मामा शल्य: दुर्योधन मामा शल्य से सवाल करता है। मै जब पांडवों से पहले आपके पास पहुंचा था। मैने आदर सत्कार से आपको अपने साथ लड़ने के लिए कहा आप चाहते तो मना कर सकते थे। आप लेकिन कौरवों की तरफ से लड़े और एक समय जब कर्ण अर्जुन को मारने वाला था। क्या आपने उसका रथ हिलाकर छल नहीं किया।

अर्जुन: दुर्योधन अर्जुन से सवाल करता है। तुम्हारे निहत्थे पुत्र अभिमन्यु पर कौरवों ने वार किया। मैं स्वीकार करता हूं, यह अनर्थ था। लेकिन क्या तुम्हारा निहत्थे कर्ण पर वार करना उचित था।

भीम: दुर्योधन भीम से सवाल करता है। वह पांचों पांडवों में से किसी के साथ भी मल्लयुद्द जीतकर अपना राज्य वापस ले सकता था। परन्तु मैने सबसे शक्तिशाली भीम को चुना। भीम ने यह जानते हुए भी कि मल्लयुद्द में पेट से नीचे वार करना वर्जित है। उसने मेरी जंघा पर वार किया। क्या यह सही था?

युधिष्ठिर: वह द्रोपदी को भरी सभा में बुलाने के लिए दोषी है। वह स्वीकार करता है, लेकिन क्या युधिष्ठिर कभी स्वीकार कर पायेगा। उसका पांच भाईयों की पत्नी को जुवे के दांव पर लगाना गलत था। उसने अपने भाईयों से पूंछे बिना, उस स्त्री से पूंछे बिना कैसे दांव पर लगा दिया। मैं फिर भी कुलनाशी कहलाऊंगा युधिष्ठिर उसके बाद भी धर्मराज कहलायेगा। यह कहां का न्याय है?

द्रोपदी: दुर्योधन स्वीकार करता है कि वह द्रोपदी का दोषी है। उसने उस नारी का भरी सभा में अपमान किया जो उसके कुल की वधु थी। वह स्वीकार करता है। वह बदले की भावना में राजकुल की मर्यादा को भूल गया। दुर्योधन स्वीकार तो करता है लेकिन ही साथ सवाल भी करता है कि कर्ण का भरी सभा में अपमान उचित था। उसको अंधे का पुत्र कहना उचित था।

दुर्योधन स्वीकार करता है कि वह अंहकारी था लेकिन उसने रण में किसी के साथ कोई छल नहीं किया। वह वीरों की तरह लड़ा जो एक योद्धा की शान होती है। वह स्वीकार करता है कि वह सत्ता चाहता था लेकिन क्या उस पर उसका अधिकार नहीं था। उसके पिता बड़े होने के बाद भी सिर्फ अंधा होने के कारण उन्हें राजा नहीं बनाया गया। अंधे का पुत्र कहकर उसका अपमान किया गया। इन्हीं सारे सवालों के साथ बहुत कम समय में महाभारत का बहुत ज़्यादा सार आप अपने शहर में देख सकते हैं।

कब: शनिवार-रविवार 27-28 जुलाई
कहां: कमानी ऑडिटोरियम, दिल्ली
कब: 14-15  सितम्बर
कहां: नेहरू सेंटर, एन्ड्रयू ओडिटोरियम, मुम्बई