इतिहास महाभारत का दोषी दुर्योधन को मानता है। दुर्योंधन जो एक ईश्यालु व्याकित था जबकि कर्ण एक सहनशील व्यक्ति था। इसके बाद भी क्यों कर्ण और दुर्योधन की दोस्ती इतिहास में अमर हुई। जानने के लिए एक नज़र देखें।

कैसे हुई मित्रता

गुरू द्रोणाचार्य ने अपने सभी शिष्यों की परीक्षा लेने के बाद एक रंगभूमि का आयोजन किया था। उस रंगभूमि में अर्जुन ने अपनी धनुर्विद्या से सबको पराजित कर दिया। अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर की उपाधि मिलने से पहले एक गोरा पतला चेहरे से गम्भीर युवक कर्ण खड़ा हुआ और उसने अर्जुन को प्रतियोगिता के लिए ललकारा। लेकिन नियमों के अनुसार कोई राजकुमार ही अर्जुन से युद्ध कर सकता था। दुर्भाग्य से कर्ण एक सार्थी का पुत्र था।

उसी सभा में जब दुर्योधन ने कर्ण के चेहरे पर तेज और साहस देखा तो वह उस से अधिक प्रभावित हुआ। उसने उसी समय कर्ण को अंगराज राज्य देकर उसे राजा घोषित कर दिया। उस दिन संध्या हो जाने पर कर्ण और अर्जुन के बीच युद्द तो नहीं हो सका लेकिन दुर्योधन और कर्ण के बीच एक अटूट मित्रता हो गई।

कर्ण के दम पर दुर्योधन भरी सभा से उठा लाया भानुमति को

दुर्योधन की पत्नी भानुमति काम्बोज के राजा चंद्रवर्मा की पुत्री थीं। उनके बारे में कहा जाता है कि वह स्वर्ग की अप्सराओं जैसी सुंदर थी। चंद्रवर्मा ने पुत्री का विवाह करने के लिए स्वंयवर रखा था। जिसमें सभी राजा उपस्थित हुए थे। भानुमति वर माला लेकर जब सभी राजाओं के सामने आयी तो दुर्योधन की इच्छा उस से शादी करने की हुई। भानुमति लेकिन उन्हें अनदेखा करके आगे निकल गई। इस बात पर दुर्योधन ने भानुमति से माला लेकर खुद ही अपने गले में डाल ली। इस बात पर सभी राजा क्रोधित हो गये।

दुर्योधन के साथ कर्ण भी उसी सभा में उपस्थित था। कर्ण ने अपने मित्र दुर्योधन की तरफ से उन सभी राजाओं को युद्द में पराजित कर दिया। इस तरह भानुमति कर्ण के कारण दुर्योधन की पत्नी बनी।

कर्ण ने हमेशा अन्याय से रोका दुर्योधन को

कर्ण एक सहनशील व्यकित था। दुर्योधन जबकि बहुत ही उतेजित क्रोध करने वाले व्यक्ति था। इसके बाद भी उन दोनों की दोस्ती की बहुत सारी मिशालें हैं। लेकिन अच्छा दोस्त वही होता है जो अपने मित्र को अन्याय पर चलने से रोके। कर्ण ने दुर्योधन को समझाने का बहुत प्रयास किया। दुर्योधन लेकिन अपने मामा शकुनि की बातों में आकर षडयंत्र करता रहा।

लाक्ष्या गृह में अग्नि कांड के समय भी, द्रोपदी को सभा में बुलाने के लिए भी, जुए में छल कपट कर राज पाठ छीनने के लिए भी कर्ण ने दुर्योधन को बहुत समझाया लेकिन मामा शकुनि ने उसकी ईश्या को और भड़का दिया। नतीजा महाभारत हुआ।

कर्ण ने मरते दम तक दुर्योधन का साथ दिया

कर्ण के दम पर ही दुर्योधन ने महाभारत का युद्द लड़ने की ठानी थी। उसे पूरा भरोसा था जब तक कर्ण जैसा योद्धा उसके साथ है उसे कोई नहीं हरा सकता। कर्ण का भी यही मानना था। वीरों की परीक्षा रणभूमि में होती है। लेकिन रणभूमि में जाने से पहले ही कर्ण की मित्रता की परीक्षा होनी थी जिसके लिए इतिहास उसे याद रखता है।

महाभारत के युद्द से पहले पांडवों की माता कुंती कर्ण के पास पहुंची। उन्होंने कर्ण को बताया कि वह उन्हीं का पुत्र है। पांडव उसके सगे भाई हैं। इस युद्द में अगर वो कौरवों की तरफ से लड़ा तो रण में अपने ही भाईयों की हत्या करेगा। कुंती ने कर्ण को समझाया कि पांडवों की तरफ से युद्द करे और बड़ा होने के नाते जीतने के बाद सिंहासन संभाले। वह जिसका उत्तराधिकारी है।

कर्ण ने इस बात पर बड़ी विनम्रता से कुंती को समझाया। युद्द वीरों का गौरव है। वह किसी लालच में नहीं लड रहा है। आज जब विपदा पड़ी है तो आपको पुत्र याद आता है। जीवन भर जो मैने अपमान सहा है, उस अपमान से जिस मित्र ने मुझे बचाया अब मैं उसका साथ छोड़कर इतिहास में मित्रता के नाम पर कलंक नहीं लगाना चाहता। कर्ण ने माता कुंती के आने का भी मान रखा। उसने वचन दिया कि वह रणभूमि में सिर्फ अर्जुन को ही मारेगा। उसके अलावा किसी पांडव पर वार नहीं करेगा। इस तरह वो मरे या जिये कुंती पांच पुत्रों की माता ही कहलायेगी।

दुर्योधन ने भाई होने के बाद भी पांडवों को नहीं जलाने दी कर्ण की चिता

महाभारत के युद्द में एक समय आया जब कर्ण और अर्जुन आमने-सामने आये। कर्ण और अर्जुन के बीच युद्द चल रहा था। कर्ण के रथ का पहिया जमीन में फंस गया। कर्ण उसको निकालने के लिए जमीन पर उतरा और अर्जुन ने निहत्थे कर्ण पर वार कर उसकी हत्या कर दी।

इसके बाद जब युद्द समाप्त हुआ तो पांडवों ने भाई होने के नाते कर्ण की चिता को मुखाअग्नि देने का फैंसला किया। दुर्योधन ने लेकिन ऐसा नहीं होने दिया। उसने कर्ण के सगे भाई पांडवों से ज़्यादा उस पर अपना अधिकार बताया। दुर्योधन ने कहा मृत्यु के बाद उसके शरीर पर तुम्हारा अधिकार कैसे हो सकता है। वह जीवित भी मेरा मित्र, मेरा भाई समान था और मरने के बाद भी मेरा ही मित्र है। मैं ही उसको मुखाग्नि देने का अधिकारी हूं। यह अधिकार अगर पांडवों ने उसे नहीं दिया तो इतिहास पांडवों को माफ नहीं करेगा।

इस बात पर धर्मराज युधिष्ठिर ने भाई होने के बाद भी कर्ण की चिता पर दुर्योधन का ही अधिकार बताया। उन सभी ने स्वीकार किया। महाभारत में जहां चारों तरफ से हुए छल-कपट को इतिहास याद रखेगा। वहीं कर्ण और दुर्योधन की निस्वार्थ मित्रता को भी इतिहास कभी नहीं भूल पायेगा।

इन्ही रिश्तों और मित्रता को दर्शाता महाभारत नाटक दिल्ली, मुम्बई, अहमदाबाद, बैंगलोर, हैदराबाद में सफल होने के बाद  फिर से दिल्ली में होने जा रहा है। इसके बाद कोलकाता, सूरत, वड़ोदरा में जल्द ही होने वाला है।

कब: रविवार 3 नवम्बर और रविवार 9 नवम्बर

कहां: श्री फोर्ट ऑडिटोरियम और कमानी हाऊस, दिल्ली