गेम ऑवर 14 जून को सिनेमा घरो में रिलीज हो रही है। फ़िल्म में तापसी पन्नों मुख़्य किरदार में हैं। फ़िल्म के ऑफिसल ट्रेलर के मुताबिक तापसी एक दिमागी बिमारी का शिकार हैं। ट्रेलर में एक डॉक्टर जिसके बारे में बताता है।

” एनीवर्सरी रिएक्शन, जो हमें मेंटली और फिजिकली बहुत ज़्यादा इफेक्ट करता हो, वो हमारे दिमाग में पूरी तरह से छप जाता है। फिर हर साल जब भी वो दिन या वो वक़्त पास आने लगता है तो हमे पता भी नहीं चलता, हमारी बॉडी और हमारा माईंड ऑटोमेटिकली रिएक्ट करने लगता है”

तापसी क्या फ़िल्म में इसी बिमारी का शिकार हैं? तापसी इसी बिमारी से बाहर निकलने की कोशिश कर रही है? तापसी के साथ ऐसा क्या हुआ होगा, जिसका इतना गहरा असर उनके दिमाग पर हुआ है। ऐसा क्या हुआ है, जो हर साल उस वक़्त से पहले उनकी बॉडी रिएक्ट करने लगती है? इन सारे सवालों का जवाब आपको फ़िल्म देखने पर ही मिलेगा।

game over

इस फ़िल्म से पहले मनोरोग पर बन चुकी हैं कामयाब फ़िल्में

मैने गांधी को नहीं मारा :  झानु बरवा के निर्देशन में बनी थी। इस फ़िल्म में अनुपम खेर और उर्मिला मातोंडकर लीड रोल में थे। फ़िल्म में अनुपम खेर को ऐसी मानषिक बिमारी थी जिसमें उन पर बचपन की बातों का असर होता है उन्हें लगता है कि उन्होंने गांधी को मारा है। फ़िल्म ने नेशनल अवार्ड के साथ-साथ और भी अवार्ड जीते थे।

भूल-भुलैया:  एक कामयाब फ़िल्म थी। इस फ़िल्म में विधा बालन एक ऐसी मानषिक बिमारी का शिकार होती हैं। जिसमें उन्हें लगता है कि वह कोई और हैं।

गजनी:  आमिर खान की इस फ़िल्म ने सबको हैरान कर दिया था। इस फ़िल्म में आमिर खान एक शॉर्ट टर्म मेमोरी नाम की बिमारी से घिरे होते हैं।

फोबिया:  फ़िल्म में राधिका आप्टे के साथ एक हादसा हो जाता है। इस हादसे के बाद उनके दिमाग में ऐसा ड़र बैठ जाता है, जिस से वो बाहर नहीं निकाल पाती हैं। फ़िल्म को क्रिटीकस ने बहुत ज़्यादा पसंद किया था।

हिन्दी मनोरोग विषय पर बहुत सारी फ़िल्में बनी हैं। यह फ़िल्में सिर्फ मनोरंजन ही नहीं करती एजुकेट भी करती हैं।

‘गेम ऑवर स्पेशल’

game over

निर्देशक:  अश्विन सारावनन की पहली फ़िल्म माया भी कुछ इसी तरह के सब्जेक्ट पर थी। इस तरह के सबजेक्ट को अच्छे से प्रजेंट करने में अश्विन सारावनन माहिर हैं। उन्होंने थ्रिलर से ही अपनी पहचान बनायी थी।

तापसी पन्नू: तापसी पन्नू यूं तो कमाल की एक्टर हैं, इस फ़िल्म को लेकर लेकिन उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ी। इस फ़िल्म के लिए उन्हें काफी मुश्किलों का भी सामना करना पड़ा। उन्होंने हाल ही अपने ट्वविटर अकाउंट से एक फोटो शेयर की है, जिसमें उनका हाथ बुरी तरह से जला हुआ है, उनके पैरों पर प्लास्टर है और उन्होंने यह भी लिखा कि शिफॉन की साडी पहनकर 25 दिन रहना मुश्किल था इसीलिए मैने इसे चुना।

अनुराग कश्यप: गेम ऑवर  तमिल,तेलगु, हिन्दी में रिलीज होगी। अनुराग कश्यप इस फ़िल्म के हिन्दी संस्करण को पेश करेंगे। अनुराग ने फ़िल्म के बारे में कहा है ” इस गेम चेंजिंग फ़िल्म के लिए मैं काफी उत्सुक हूं, यह फ़िल्म साबित करती है कि साऊथ का फ़िल्म निर्माण बहुत बेहतर है। यह देखकर अच्छा लगा कि कैसे डॉयरेक्टर अश्विन सारावनन ने दो विभिन्न शैलियों को मिलाकर एक अच्छी फ़िल्म बना दी है।

इस विषय पर फ़िल्में क्यों ज़रूरी हैं।

भारतीय समाज में मनोरोग को बिमारी कम कोई शक्ति ज़्यादा माना जाता है। मनोरोग के बारे में भारतीय लोग बहुत ही कम जागरूक हैं। हम अगर आंकड़ों की बात भी करें तो पिछलें 15 सालों में एक लांख से ज़्यादा मनोरोगियों ने खुद को नुकसान पहुंचाया है। राष्ट्रीय मानव आयोग के अनुसार 1990 में सिर्फ 3 प्रतिशत लोग मानषिक रोगों से परेशान थे, 2013 में यह आंकड़े बढ़कर दौगुने हो गये हैं। अब नई-नई तकनीकों की वज़ह से लोगों में अकेलापन बढ़ा है। वह अकेला पन कब मानषिक बिमारी बन जाता है पता नहीं चलता।

ऐसे समय में जब लगातार मनोरोगी बढ़ते जा रहे हैं। हम उनकी परेशानियों को समझ भी नहीं पाते हैं, उनसे ठीक से व्यवहार नहीं कर पाते हैं। इस तरह की बिमारी पर बनी फ़िल्में मनोरंजन के साथ समाज में जागरूकता लाने का काम कर सकती हैं।