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‘लैला’ नेटफ्लिक्स सीरीज में क्या सही और क्या नहीं

लैला नेटफ्लिक्स पर 14 जून शुक्रवार को रिलीज हो चुका है। जो प्रयाग अकबर के उपन्यास ‘लैला’ पर आधारित है। पहले सेशन में लैला के 6 एपीसोड रिलीज हुए हैं। 

क्या है कहानी?

लैला 2047 की कल्पना है। जब आर्यवृत में सिर्फ जोशी ही भगवान है। उसके अलावा गांधी या किसी और की फोटो लगाना भी ग़ैरक़ानूनी है। जोशी और उसके ख़ास आदमी ही उच्च पदों पर हैं। बाकी सब लोग दूस हैं। जो महिलाएं धर्म के ख़िलाफ शादी करती हैं, उन्हें ज़बरन शुद्धि आश्रम में भेजा जाता है। उनके मिश्रित बच्चे या तो मार दिये जाते हैं या अमीरों को बेच दिए जाते हैं। निर्देशक दीपा मेहता शुद्दि आश्रम का माहौल बनाने में कामयाब रहीं।

कहानी शालिनी (हुमा कुरैशी) की है। जिसे दूसरे धर्म में शादी करने पर उसके पति की हत्या कर शुद्दि आश्रम में रखा गया है। उसकी मिश्रित बेटी लैला का कोई पता नहीं है। शालिनी अपनी मिश्रित बेटी लैला को खोज़ती हुई भानु (सिद्धार्थ) के संपर्क में आती है। भानु दिखाने के लिए सिक्योरिटी है लेकिन असल में विद्रोही है जो जोशी को मारना चाहता है।

क्या सही क्या नहीं

निर्देशक दीपा मेंहता शुद्धी आश्रम को फील कराने में कामयाब तो रहीं लेकिन लैला के शुद्धी आश्रम और वाटर की विधाओं के आश्रम में बहुत अंतर नहीं दिखाई दिया। शुरू के दो एपीसोड मे सिर्फ माहोल बनाया गया है। तीसरे एपीसोड की कहानी में रहस्य भरे कई ट्रेक खुलते हैं लेकिन कई बहुत बड़ी सिच्युएशन, मुश्किलों को आसानी से ख़त्म करना भी ख़लता है।

विजुअली कुछ मेटाफर तारीफ के लायक हैं। जैसे ताजमहल का टूटना, कचरे का पहाड, पानी का ए.टी.एम, बच्चों का ना होना, बैकग्राऊंड में धुंध। यह 2047 का माहोल बनाने की अच्छी कोशिश थी। लेकिन ई-रिक्शा का इस्तेमाल, पानी के एटी.एम के पास नान रोटी 80 रू पलेट का ठेला दिखना, बस्ती के घरो की बनावट जिन्हें देखकर नहीं लगता हम 2047 देख रहे हैं। 

कहानी 2047 में चल रही है। यह सब बीच-बीच में टेक्नोलॉजी के जरिए बताने की कोशिश की है। किरदारों की एक्टिंग, बॉडी लैंग्वेज और सायकॉलोजी टेक्नोलॉजी से मैच नहीं करती है। हुमा कुरैशी जिस तरह हर किसी के लैपटॉप से आसानी से इन्फोर्मेशन ले रही हैं। उनका फंसना और आसानी से बचना लगता है आर्यवृत में बस वही चालाक हैं।

सिद्दार्थ ने एक्टिंग से ज़रूर साबित किया कि भानु के लिए वही बेहतर कास्ट हैं। एक औरत का पति, बेटी, घर सब कुछ छिन जाने वाला दर्द लेकिन हुमा के चेहरे पर नहीं दिखाई दिया। उनके पास कई मौके थे, जब एक मां होने के नाते वो अपनी अंधी ममता दिखा सकतीं थीं। हुमा कुरैशी अपनी पांच साल की बेटी को पाने के लिए तडपती मां कम जासूस ज़्यादा लग रही थीं।

इसके अलावा आकाश ख़ुराना, बच्ची और सीमा बिस्वास की एक्टिंग भी काफी अच्छी थी। इन सबके बावजूद भी लैला  6 एपीसोड तक बांधे रखती है। कहीं भी बोझिल नहीं होती है। हिन्दी की कामयाब वैबसीरीज कहा जा सकता है।

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