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मणिकर्णिका में रानी लक्ष्मीबाई का किरदार कितना सच है?

“ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी”

सुभद्रा कुमारी चौहान की यह कविता लगभग हर उस आदमी ने एक बार पढ़ी होगी जो कभी स्कूल गया होगा। वीर रस की इस कविता ने लगभग सभी बच्चों के मन में झांसी की रानी का चित्र बनाया है। हर बच्चे के ज़हन में वह चित्र, वह सम्मान कहीं ना कहीं आज भी बरकार है।

कविता के साथ ढाल और तलवार लिए रानी लक्ष्मीबाई अपने बच्चे को पीठ पर बांधें कविता के पन्ने पर छपी रहती थीं। इस समय उनकी ज़िंदगी को रंगीन सुनहरे पर्दे पर दिखाने के लिए कंगना रनौत तैयार हैं। फ़िल्म की रिलीज के लिए उन्होंने दिन भी गणतंत्र दिवस को चुना है। फ़िल्म कितनी सफल रहेगी यह तो आने वाला वक़्त ही बतायेगा लेकिन हम बात कर रहे हैं फ़िल्म मणिकर्णिका में रानी लक्ष्मीबाई का किरदार कितना सच है? चलो देखते हैं-

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लक्ष्मीबाई के वकील ने ऐसा बताया था उनका का रंग-रूप

‘रानी मध्यम कद की तगड़ी महिला थीं. अपनी युवावस्था में उनका चेहरा बहुत सुंदर रहा होगा, लेकिन अब भी उनके चेहरे का आकर्षण कम नहीं था. मुझे एक चीज़ थोड़ी अच्छी नहीं लगी, उनका चेहरा ज़रूरत से ज़्यादा गोल था. हाँ उनकी आँखें बहुत सुंदर थीं और नाक भी काफ़ी नाज़ुक थी. उनका रंग बहुत गोरा नहीं था. उन्होंने एक भी ज़ेवर नहीं पहन रखा था, सिवाए सोने की बालियों के. उन्होंने सफ़ेद मलमल की साड़ी पहन रखी थी, जिसमें उनके शरीर का रेखांकन साफ़ दिखाई दे रहा था. जो चीज़ उनके व्यक्तित्व को थोड़ा बिगाड़ती थी- वो थी उनकी फटी हुई आवाज़.’

यह शब्द उस ऑस्ट्रेलियन वकील जॉन लैंग के हैं जिसने रानी लक्ष्मीबाई का केस अंग्रेजी सरकार से लड़ा था। यह सब जॉन लैंग ने तब देखा जब पर्दे के पीछे बैठी रानी से वह उनके केस के बारे में बात कर रहे थे। उनके बेटे दामोदर ने अचानक पर्दा हटा दिया था।

( रेनर जेरॉस्च  किताब, ‘द रानी ऑफ़ झाँसी, रेबेल अगेंस्ट विल.’)

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कैसे हुई रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु

कैप्टटन रौड़्रिक ब्रिग्स जब भी हमला करने के लिए रानी की तरफ बढ़ते, उनके सैनिक उन्हें चारों तरफ से घेर लेते। तभी अचानक जरनल रोज़ की एक रिजर्व टुकड़ी ने पीछे से आकर रानी पर हमला किया। रानी के सैनिक भागे नहीं पर एक-एक कर कम होते रहे। रानी ने अपने सैनिकों को आवाज दी” मेरे पीछे आओ” रानी के पीछे पन्द्रह सैनिक बड़ी फुर्ती से उनके पीछे हो लिए।

रौड़्रिक ने अपने सिपाही उनके पीछे भेजे। कोटा की सराय पर रानी के सिपाहियों और ब्रिटिश सिपाहियों मे दौबारा से लड़ाई हुई। एक अंग्रेज सैनिक ने पीछे से उनके सीने मे एक तलवार भोंक दी, रानी ने पलटकर उस पर जोरदार हमला किया। वह वहीं ढ़ेर हो गया। ब्रिटिश सैनिकों के मुकाबले रानी के सैनिक बहुत कम थे।

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रानी अपने एक सैनिक के साथ वहां से जख़्मी हालात में  निकलीं। आगे छोटा सा पानी का झरना आया। रानी अगर उस झरने को पार कर जातीं तो अंग्रेज उन्हें नहीं पकड़ पाते लेकिन उनका घोड़ा झरने को देखकर इतनी तेजी से रूका कि उनका शरीर झटका खाकर घोड़े की गर्दन पर झूल गया। उन्होंने बहुत कोशिश की मगर उनका घोड़ा आगे नहीं बढ़ सका। रानी को अपनी पीठ में कुछ चुभता सा महसूस हुआ। राईफल की एक गोली उनकी कमर में आ लगी। रानी के बायें हाथ की तलवार नीचे छूट गई।

(उस लड़ाई में भाग ले रहे जॉन हेनरी सिलवेस्टर की किताब ‘रिकलेक्शंस ऑफ़ द कैंपेन इन मालवा एंड सेंट्रल इंडिया’ )

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रानी लक्ष्मीबाई के आखरी शब्द

रानी के माथे पर एक अंग्रेज सिपाही की तलवार इतनी गहरी लगी थी कि उनका माथा बुरी तरफ फट गया था। सर से ख़ून निकलने की वज़ह से लगभग वह अंधी हो चुकी थीं। उनका एक सिपाही उन्हें उठाकर मंदिर में ले आया। मंदिर का पुजारी उनके मुंह में गंगा जल डालने की कोशिश कर रहा था। वह अपने सैनिक से बोल रही थीं ” दामोंदर मैं उसे तुम्हारी देख रेख में छोड़ती हूं, उसे छावनी ले जाओ,,,दौडो उसे ले जाओ” रानी की सांसे धीरे-धीरे थम रही थीं, उनका खून उनके फेफड़ों में जम रहा था। उन्होंने अचानक ज़ोर से बोला “अंग्रेज़ों को मेरा शरीर नहीं मिलना चाहिए” और हमेशा के लिए शांत हो गईं।

(एंटोनिया फ़्रेज़र अपनी पुस्तक, ‘द वॉरियर क्वीन‘)

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फ़िल्म का नाम मणिकर्णिका ?

रानी लक्ष्मीबाई का जन्म बनारस में एक मराठी परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका ही था। उनका विवाह जब झांसी के राजा गंगाधर राव के साथ हुआ तो  उनका नाम लक्ष्मी बाई रखा गया। इतिहास में वह झांसी की रानी के नाम से जानी जाती है।

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राजपूत रानियां ही क्यों ?

मणिकर्णिका पिछले कुछ सालों में राजपूत रानियों के जीवन पर बनी तीसरी बड़ी फ़िल्म है। इस से पहली दोनों फ़िल्में  बाजीराव मस्तानी और पदमावत काफी सफल रहीं। राजपूत रानियों की जीवनी बॉलीवुड़ के लिए कहीं हिट फार्मुला तो नहीं बन रही हैं? हालांकि यह बात और है कि तीनों ही फ़िल्मों पर राजपूतों ने अपने इतिहास से छेड़-छाड़ के आरोप लगाये हैं।

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रानी लक्ष्मी बाई सबके ज़हन में बचपन से हैं। वह उसे पर्दे पर जब तक वैसा ही नहीं देख लेंगे जैसा की सुभद्रा कुमारी की कविता में बताया है, स्वीकार नहीं करेंगे।

Naseem Shah :