यह उन्नीस सो नब्बे से पहल की बात है। हिन्दुस्तान के एक तिहाई हिस्से में लाईट नहीं थी। मनोरंजन के साधनों में सबसे बड़ा साधन रेडियो था। जिसकी पहुंच हिन्दोस्तान के 98 प्रतिशत लोगों तक थी। इसी बीच 1980 के दशक में टी.वी पर हम लोग से धारावाहिक की शुरूवात हुई।

यह वो जमाना था। चैनल भी सिर्फ दूरदर्शन ही था। टी.वी जब हर किसी के घर पर नहीं मिलता था। टी.आर.पी चेक करने के ट्रांस मीटर नहीं थे लेकिन कुछ रिपोर्ट के आधार पर उस वक़्त एक टी.वी पर 10 परिवार निर्भर करते थे।

उन दिनों जो लोग बच्चे थे। उनके ज़हन में उन नाटकों की यादें आज भी ज़िंदा होंगी। जिन नाटकों को उस वक़्त नहीं देख पाये अब उन्हें  आसानी से प्राइम पर देख सकते हैं।

‘ये जो है ज़िंदगी’ (1984)

यह नाटक हिन्दी का भी और इंडिया का भी पहला कॉमेडी नाटक था। जो शुक्रवार को रात 9 बजे आया करता था। नाटक का समय 25 मिनिट होता था। इस नाटक का दर्शकों पर इतना असर था कि उस वक़्त 9 से 12 वाला सिनेमा हॉल का शो खाली जाता था।

इस नाटक के टाइटल सोंग को किशोर कुमार ने अपनी आवाज दी थी। निर्देशन कुंदन शाह, मंजुल सिन्हा, रमण कुमार ने मिलकर किया था। नाटक में शफी इमानदार, राकेश बेदी, सतीश शाह, स्वरूप संपत और फरीदा ज़लाल थे।

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‘मालगुड़ी डेज’ (1987)

मालगुड़ी डेज आर.के नारायण की कहानियों का गुच्छा है। इन कहानियों पर उनके भाई आर.के लक्षमण ने कार्टून बनाये हैं। दूरदर्शन ने जिन्हें बड़े सहेज कर लोगों तक पहुंचाया था। मालगुड़ी डेज की सामाजिक ताने बाने में बुनी हुईं कहानियां आज भी लोगों को याद हैं। इसी वज़ह से यू टयूब पर लोग मालगुड़ी डेज को सर्च करते हैं। इसका मुख़्य किरदार स्वामी आज तक लोगों को याद है।

यह धारावाहिक दूरदर्शन पर 1987 में आया था। इसका निर्देशन शंंकर नाग ने किया था। गिरीश कर्नाड मुख़्य भूमिका में नज़र आते थे।

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‘फौजी’ (1988)

यह धारावाहिक फौज की ट्रेनिंग ले रहे एक केम्प पर आधारित है। यह नाटक बताता है कि किस तरह हमारे जवान फौज की ट्रेनिंग लेकर आम आदमी से मजबूत फौजी बनते हैं।

उस वक्त शायद किसी ने नहीं सोचा होगा। इस नाटक में काम करने वाला एक आम सा लड़का एक दिन बॉलीवुड का सुपर स्टार होगा। आज उस आम से लड़के को सारी दुनिया शाहरूख़ ख़ान के नाम से जानती है। इस नाटक को हालांकि दौबारा दूरदर्शन ने भी चलाया है।

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‘ज़बान संभाल के'( 1993)

यह आम लोगों की कहानी थी। जो 1993 मे दूरदर्शन पर नज़र शुरू हुआ था। यह हिन्दी भाषा को लेकर था। इसमें ऐसे बहुत सारे लोग एक क्लास में हिन्दी सीखने के लिए आते हैं, जिनकी ज़बान अरबी,रशियन, तमिल, तेलगु और अंग्रेजी होती है। इन लोगों को एक बेरोजगार इंजीनियर हिन्दी सिखाता है।

यह नाटक ब्रिटिश सीरियल माइंड यॉर लेंग्वेज का रूपांतरण था। जिसको नये रूप में  नये कलाकारों के साथ फिर से आल्ट बाला जी ने बनाया है। और पुराना नाटक पुराने कलाकारों के साथ अमेजन प्राइम पर देखा जा सकता है।

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‘शक्तिमान'( 1997)

हिन्दी नाटकों का पहला सुपर हीरो शक्तिमान। इस किरादर ने बच्चों के बीच इतनी गहरी पैठ बना ली थी कि सरकार को इसमें दख़ल देना पड़ा था। जिस से हर एपीसोड़ से पहले शक्तिमान को बच्चों को बताना पड़ता था कि वह ऐसा बिल्कुल भी ना करें।

शक्तिमान सुपर मेन की ही तर्ज पर इंडियन सुपर हीरो था। जिसके पास कुछ अदभुत शक्तियां थीं। असीम ताक़्तें थीं। जो दुनिया को बचाना चाहता था। दूसरी तरफ तमराज किलविश था जो अपनी काली शक्तियों के दम पर दुनिया पर राज करना चाहता था। शक्तिमान लेकिन उसे कभी कामयाब नहीं होने देता था। शक्तिमान के रूप में मुकेश खन्ना मुख़्य भूमिका में थे।

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‘राजा और रेंचो’ (1997)

राजा और रेंचो दूरदर्शन पर आने वाला अलग तरह का जासूसी नाटक था। जिसे बच्चे और बड़े दोनों को ध्यान में रखकर बनाया गया था।  इसका हीरो जिसका नाम राजा एक जासूस था। उसके साथ एक बंदर रहता था जिसका नाम रैंचो था।

राजा और रैंचों दोनों मिलकर स्टंट करते थे। राजा रैंचो के साथ मिलकर उन मर्डर मिस्ट्रियों को सुलझाता था। जिन्हें सुलझाने में पुलिस भी नाकाम रहती थी। इस नाटक के जमाने में हालांकि बाकी चैनल भी आ चुके थे। हालांकि उस वक़त तक प्राइवेट बहुत सारे चैनल आ चुके थे और दर्शक धीरे-धीरे दूरदर्शन से उनकी तरफ खिसक रहा था।

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