मज़ा नहीं आया
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अफ़सोस आठ एपीसोड की सीरीज अमेजन प्राइम पर शुक्रवार को आयी है। इस सीरीज में काम करने वालों को आप पहचानते हो या नो हों लेकिन काम करने वालों के रिश्तेदारों को जरूर पहचानते होंगे। अफसोस का निर्देशन अनुराग कश्यप की बहन अनुभूति कश्यप ने किया है। सीरीज में मुख्य किरदार हीबा शाह हैं। मुख्य विलेन के रूप में टॉम अल्टर के बेटे जेमी अल्टर हैं। सीरीज कैसी है? उसके बारे में जानने के लिए पढ़ सकते हैं।

निर्देशक: अनुभूति कश्यप

लेखक: दिब्या चटर्जी, अनिर्बान दास गुप्ता, सौरव घोष

कलाकार: गुलशन देवैया, अंजली पाटिल, ध्रुव सहगल, हीबा शाह, जेमी अल्टर, आकाश दहिया

प्लेटफार्म: अमेजन प्राइम

कहानी में सब कुछ है। बात सॉयकॉलोजी से शुरू होती है। एक सायक्रेटिस्ट सलूका (अंजली पाटिल) एक ऐसे आदमी नकुल ( गुलशन देवैया) का इलाज कर रही है। जो अपनी ज़िंदगी से परेशान हो चुका है। वह बार-बार मरने की कोशिश करता है लेकिन मर नहीं पा रहा है।

एक प्राइवेट संस्था है। जो मरने वाले लोगों को आसानी से मारने का काम करती है। नकुल उस संस्था को अपनी ही मौत का कॉन्ट्रेक्ट दे देता है। उस संस्था की शूटर उपाध्याय (हीबा शाह) एक साईको किलर है। वह अब तक सो से ज़्यादा लोगों को मार चुकी है। नकुल का मरना तय हो जाता है।

मुश्किल तब आती है जब नकुल मरने से पहले ही अपना इरादा बदल लेता है। वह जीना चाहता है। लेकिन उपाध्याय उसके ना मरने को अपनी बेइज्ज़ती समझती है। वह हाथ धोकर उसके पीछे पड़ जाती है। वह हर हाल में उसे मारना चाहती है। और नकुल उस से अपनी जान बचाता फिर रहा है।

सन 1989 में एक फ़िल्म आयी थी। तेरे बिना क्या जीना उसमें भी शेखर कपूर इसी तरह मरना चाहता है और मर नहीं पाता है। वह सतीश शाह उसको मारने का कॉन्ट्रेक्ट लेता है और उसे हर कीमत पर मारना चाहता है। बिल्कुल इस सीरीज में उपाध्याय की तरह।

सिनेमा की नज़र से

इस कहानी को सुनकर अगर आपके मन में ख़्याल आता है कि लॉजिक क्या है? कहानी में तीन सब्जेक्ट हैं, सायकॉलोजी, मिथ और विज्ञान। यह तीनों आपस में जुडे हुए हैं। साधुओंं के पास एक जल है। उनका विश्वास है कि वह अमृत है जिसे पीने से आदमी अमर हो जाता है।  एक वैज्ञानिक डॉ गोल्ड फिश (जेमी अल्टर) इस पर रिसर्च कर रहा है। वह किसी भी कीमत पर उस अमृत को पाना चाहता है। सबको उस अमर आदमी की तलाश है जो मर ही नहीं रहा है।

सीरीज का पहला एपीसोड तो रोमांच पैदा करता है। अगले ही एपीसोड से लेकिन सारा मजा खराब होने लगता है। बहुत सारी बातें ऐसी हैं जो हज़म नहीं हो पाती हैं। बहुत ही कमजोर पटकथा है, किरदार भी बहुत ही कमजोर हैं। हीबा शाह को छोडकर बाकी सारे किरदार कुछ खास नही कर पाये हैं। या यूं कहें उनकों करने के लिए बहुत कुछ पटकथा में ही नहीं है।

हीबा शाह और गलशन देवैया दोनों ही बड़े मंझे हुए कलाकार हैं। इस बार लेकिन हीबा शाह बाजी मार ले गयीं, उन्होंने जिस तरह से किलर का किरदार निभाया है। वह बहुत ही नया है। निर्देशन में जिस तरह से उम्मीदें थीं कि कुछ नया मिलेगा। अनुभूति क्योंकि वासेपुर, देव डी  जैसी फ़िल्मों के निर्देशन से जुड़ी रही हैं। अफसोस वैसा कुछ देखने को नहीं मिला।

टॉम अल्टर के बेटे जेमी अल्टर को एक विदेशी वैज्ञानिक के रूप में देखकर खुशी भी होती है और दुख भी होता है। हिन्दी फ़िल्मों में जिस तरह उनके फादर को अंग्रेज के रोल में टाइप कास्ट कर दिया था। उनके साथ भी कुछ वैसा ही ना हो कि वह भारतीय फ़िल्मों में बस विदेशी रोल करते रह जायें।

लिटिल थिंग्स  के ध्रुव सहगल को बहुत ही छोटा सा बिना मतलब का रोल क्यों? इस से बेहतर था कि उनकी जगह किसी और को ही ले लिया जाता। उन्हें अगर लिया था तो पटकथा में कुछ को दिया होता।

कुल मिलाकर कहानी बांध के रखने में कामयाब नहीं होती है। कहानी में जबर्दस्ती के लॉजिक लगाकर आगे बढ़ाने की कोशिश की जाती है। जो सफल नहीं होती है।