संगीतमय ड्रामा
75%Overall Score

इस समय तक़नीकी मदद से बेसुरे भी गा रहे हैं। असल संगीत पर तकनीक इतनी हावी हो चुकी है कि इस पीढ़ी ने उसी को सच मान लिया है लेकिन सच कुछ और है जिसका कुछ हिस्सा इस बंदिश बेंडिटस सीरीज में देखने को मिलता है। संगीत घरानों में आज भी किस तरह संगीत को धरोहर माना जाता है। संगीत के पंडित संगीत के उस्ताद किस तरह पीढ़ी दर पीढ़ी संगीत को आगे बढ़ाते आ रहे हैं। इस समय संगीत की साधना और युटयूब की प्रसिद्दि में क्या फर्क़ है। सीरीज का असल मुद्दा यही है।

निर्देशक: आनंद तिवारी
लेखक: अधीर भट्ट, अमृतपाल सिंह, लारा चांदनी, आनंद तिवारी
कलाकार: नसीरूद्दीन शाह, शीबा चड्ढा, अतुल कुलकर्णी, अमित मिस्त्री, ऋत्विक भौमिक, श्रेया चौधरी
प्लेटफार्म: अमेजन प्राइम

संगीत सम्राट पंडित जी (नसीरूद्दीन शाह) अपने घराने का उत्तराधिकारी खोज रहे हैं। पंडित जी का पोता राधे (ऋत्विक भौमिक) उस दौड में सबसे आगे है। पंडित जी एक दिन राधे की साधना से प्रभावित होकर उसे उत्तराधिकारी के तौर पर उसके हाथ में गंड़ा बांधने की घोषणा कर देते हैं।

राधे तपस्या भंग करने के लिए उसकी जिंदगी में लेकिन एक लड़की तमन्ना (श्रेया चौधरी) आती है। राधे तमन्ना के कारण ही गंडा बंधन समय से दस मिनट लेट हो जाता है। राधे उसी की क्षमा के लिए शुद्धिकरण करता है। वह बिना बोले एक भिक्षू बनकर रहता है। वह अपनी परीक्षा में पास भी हो जाता है।

पंडित जी जैसे ही राधे को अपना उत्तराधिकारी बनाते हैं। एकदम अचानक से एक और संगीत का योद्दा दिग्विजय सिंह राठोर (अतुल कुलकर्णी) मैदान में आ जाता है। अतुल कुलकर्णी उस कुल के उत्तराधिकार पर अपनी दावेदारी करता है और पंडित जी कै मैदान में आने की चुनौती देता है। पंडित जी अपनी जगह अपने उत्तराधिकारी राधे को मैदान में उतारते हैं।

दिग्विजय सिंह पंडित जी का बड़ा बेटा है। पंडित जी जिसे अपना शिष्य तो मानते हैं लेकिन पुत्र नहीं मानते। पंडित जी का छोटा बेटा राजेंद्र (राजेश तलंग) अपनी प्रतिभा के दम पर उत्तराधिकारी नहीं बन पाया। उस से छोटा बेटा भी नहीं बन पाया। उनकी पुत्रवधू जो घर का काम करती है। उनकी हवेली बैंक में गिरवी रखी है। पंडित जी बिमार हैं। संगीत सम्राट का युद्द कौन जीतेगा। यहीं सीरीज का अंत है।

सिनेमा की नज़र से

कहानी पर मैथोलोजी का असर दिखता है। दिग्विजय सिंह जिस कर्ण की तरह है अपने ही लोगों से अपनी पहचान के लिए लड़ रहा है। मोहिनी (शीबा चड्ढा) संगीत में जब पंडित जी को हरा देती हैं तो पंडित जी गुरू द्रोण की तरह मोहिनी से एकलव्य की तरह वचन में उसका संगीत मांगते हैं। मोहिनी पंडित जी को अपना संगीत सोंपकर फिर कभी नहीं गाती। पंडित जी खुद भीष्म की तरह असमंजस में हैं। एक तरफ अंहकारी बेटा है और दूसरी और तपस्वी संगीत प्रेमी है।

संगीत पर बहुत सी फ़िल्में बन चुकी हैं। यह बात अलग है कि वो सभी फ़िल्में पॉपुलर संगीत पर आधारित हैं। दस एपिसोड की इस सीरीज लेकिन खास बात है कि उसमें पॉपुलर संगीत और क्लासिक संगीत दोनों को साथ में दिखाया है। किसी संगीत घराने के बारे में और संगीत की बारीकियों के बारे में उसकी तकनीकियों के बारे में इस सीरीज से ज़्यादा किसी फ़िल्म में शायद ही देखने को मिले। लेखक और निर्देशक दोनों की तारीफ करनी होगी जिन्होंने उन दर्शकों को भी जोडे रखा जिन्हें संगीत की बहुत ज़्यादा जानकारी नहीं है।

नसीर साहब की संगीत प्रेमी के रूप में मिर्जा गालिब, सरफरोश, खुदा के लिए  के बाद अब बंदिश बेंडिट भी शामिल  है। उन्हें संगीत सम्राट पंडित के किरदार में देखकर लगता ही नहीं कि उनका ताल्लुक किसी संगीत घराने से नहीं है। पंडित जी का किरदार निभाने के लिए सिर्फ एक्टिंग ही नहीं संगीत की समझ भी लगी है जो उनके संवादो में साफ दिखाई देती है। संगीत का रियाज करते हुए जिस तरह ठुमरी, राग, भाव, गहराई, ठहराव पर बात हो रही है, एक जानकार ही उस तरह की बातें कर सकता है। नसीर साहब को संगीत और अदाकारी में डूबा देख कला के प्रति श्रद्धा का भाव जाग जाता है।

नसीर साहब के साथ में दिग्विजय सिंह के किरदार में अतुल कुलकर्णी का अनुभव साफ दिखता है। यह दोनो जब एक साथ स्क्रीन पर होते हैं तो सीन देखने लायक बनता है। शीबा चड्ढा और राजेश तलंग का किरदार तो अच्छा है लेकिन उनके पिछले कामों के मुकाबले काम थोड़ा हल्का रहा। अमित मिस्त्री का किरदार हालांकि कुछ सही से लिखा नहीं गया लेकिन उनकी एक्टिंग में जरूर दम था।

सीरीज के मुख़्य किरदार ऋत्विक भौमिक और श्रैया चौधरी दोनों ही अच्छे लगे हैं लेकिन किरदार के लिहाज से भौमिक के पास ज़्यादा चुनौती थी। एक तो उनके ज़्यादातर संवाद संगीत पर थे। दूसरे उनके सामने स्क्रीन पर ज़्यादातर नसीरूद्दीन शाह और अतुल कुलकर्णी जैसे मंझे हुए कलाकार थे। उसके बाद भी उन्होंने काफी अच्छा किरदार निभाया है।

सीरीज संगीत पर आधारित है तो संगीत की बात होना लाजिमी है। इस सीरीज के संगीत के लिए तीन बडे संगीतकारों की मदद ली गई है। शंकर महादेवन, लॉय मेंडोन्सा, एहसान नूरानी इन तीनों का काम अलग-अलग साफ सुनाई पड़ता है। सीरीज में डाली गई आधी जान इन्हीं की है।

कोई क्यों देखे?

संगीत की बारीकियां संगीत प्रेमी ही जाने लेकिन संगीत घराने को लेकर जो पूरा ड्रामा रचा गया है वो देखने लायक है। इस समय जरूरी भी है कि एक कलाकार के मुकाबले लोग यूटयूबर को ज़्यादा जानते हैं। एक आदमी ऑटो टयून की तकनीक से गाकर अपना शोक पूरा कर ले रहा है और एक संगीत के लिए तप कर रहा है। तप करने वाले को फिर भी लोग नहीं जानते हैं। इस बात को समझने के लिए देख सकते हैं। किसी भी कला का शोक और उस कला से प्रेम, उस कला में आस्था क्या होती है जानने के लिए देखा जा सकता है।