ठीक-ठाक
60%Overall Score

नेटफिलिक्स की नई हिन्दी सीरीज बार्ड ऑफ ब्लड के पहले सीजन के सात एपीसोड नेटफिलिक्स पर 27 सितंबर से आ चुके हैं। यह सीरीज कई मायनों में ख़ास मानी जा रही थी। एक तो शाहरूख़ ख़ान का प्रोड़क्शन हाउस रेड चिलीज इसके साथ जुड़ा है। दूसरी हिन्दी फ़िल्मों के बेहद रोमांटिक हीरो इमरान हाशमी ने नये कलाकारों के साथ इस सीरीज में काम किया है। सीरीज उम्मीदों पर कितनी ख़री उतरती है जानने के लिए एक नज़र देखें।

निर्देशक: रिभु दासगुप्ता

लेखक: बिलाल सिद्दीकी (उपन्यास), मयंक तिवारी, गौरव वर्मा

कलाकार: इमरान हाशमी, सोभिता धूलिपाला, विनीत कुमार सिंह, कीर्ति कुल्हारी, जयदीप अहलावत

कहानी एक था टाइगर, मद्रास कैफे, टाईगर जिंदा है, रोमियों अकबर वाल्टर, विश्वरूपम जैसी इंडियन जासूसों पर बनी बहुत सारी फ़िल्मों से अलग नहीं है। लेकिन बार्ड ऑफ ब्लड में जासूसों के काम करने के तरीके को जिस तरह से दिखाया गया वो बाकी कहानियों से अलग है।

एक जासूस आनंद कबीर(इमरान हाशमी) ब्लूच में एक मिशन पर अपने दोस्त विक्रम (सोहुम शाह) को खो देता है। जिसके चलते वो एजेंसी से दूर है। एजेंसी को उसकी जरूरत तब पड़ती है जब चार जासूस ब्लूच में पकड़े जाते हैं। ऐजेंसी के ऑफिसर का मर्डर हो जाता है, जिसके तार भी वहीं से जुड़े होते हैं।

आनंद कबीर एक जासूस लड़की इशा (सोभिता धूलिपाला) को साथ लेकर अपने चार आदमियों को बचाने के लिए ब्लूच पहुंच जाता है। वहां उन्हें एक पुराना ऐजेंट वीर (विनीत कुमार) मिलता है। यहां से ताश के पत्तों की तरह कहानी में परतें खुलनी शुरू होती हैं।

आनंद कबीर के साथ पहले यहां क्या हुआ था? उसकी खबरें दूसरे मुल्क़ के जासूस को कौन पहुंचा रहा था? वहां किसके साथ उसका इश्क़ अधूरा रह गया। आनंद कबीर के समाने चुनोतियां ही चुनोतियां हैं। वह अपने साथी वीर और इशा को ज़िंदा वापस भेज पायेगा? वह अपने पकड़े गये चार साथियों को बचा पायेगा? वह सीरीज के मुख्य ख़लनायक मुल्ला ख़ालिद और उसके बेटे को मार पायेगा? वह अपनी महबूबा के क़ातिल शहजाद (जयदीप अहलावत) से बदला ले पायेगा?

ऐसे ही बहुत सारे सवाल देखने वालों के ज़हन में पैदा करके सीरीज की कहानी आगे बढ़ती है। कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है धीरे-धीरे इन सारे सवालों के जवाब मिलते रहते हैं।

क्या हो सकता था क्या नहीं?

सिनेमा के हिसाब से बार्ड ऑफ ब्लड सीरीज में कुछ अच्छी बातें हैं तो कुछ बातों का कोई मतलब ही नहीं है। हम अगर पहले अच्छी बातों पर गौर करें तो सीरीज देखते हुए आपको कहीं नहीं लगता है कि आप ब्लूच को नहीं देख रहे हैं। हर फ्रेम में वहां के बाजार, वहां की गलियां, वहां के लोग, वहां का रहन सहन, वहां की अंदरूनी राजनीति जो इस पहले कभी नहीं दिखी और सबसे अहम जो कहानी में किरदारों को और सच्चा बना देती है वहां की भाषा। सीरीज में कलाकार जब वहां की क्षेत्रीय भाषा बोलते हैं तो फर्क़ कर पाना मुश्किल हो जाता है कि यह लोग असली हैं या नकली।

सीरीज को अगर कास्टिंग के हिसाब से देखें तो कास्टिंग काफी अच्छी की गई है। ब्लूच में रह रहे पंजाबी जासूस के किरदार में विनीत कुमार का काम देखने के बाद लगता है कि उनसे बेहतर उस किरदार को कोई और नहीं कर पाता। मुल्ला खालिद के किरदार में (दानिश हुशैन) ने जो किरदार की बारकियों का और ज़बान का इस्तेमाल किया है वाकई क़ाबिले तारीफ है। दुश्मन जासूस शहजाद के किरदार को (जयदीप अहलावत) ने जिस संजीदगी और बारीकियों के साथ निभाया है तारीफ के क़ाबिल है। इसी फेहरिस्त में एक और किरदार की तारीफ बहुत ज़रूरी है। (कीर्ति कुल्हारी) ने ब्लूच की बेटी जन्नत का किरदार बहुत अच्छे से निभाया है। हालांकि मुख़्य किरदार इमरान हाशमी अपने किरदार में भटके से नज़र आते हैं। जिस तरह टीजर में और सीरीज शुरू होते ही उनकी भूमिका बतायी जाती है। पूरी सीरीज में कहीं भी उनका किरदार वैसा नज़र नहीं आता है। सोभिता धूलीपालिया भी एक जासूस जैसी कम ही नज़र आती हैं।

सीरीज की सिनेमाटोग्राफी और लोकेशन कहानी के मुताबिक बहुत सही हैं। फ्रेम में कहीं भी कुछ फालतु कम ही नज़र आता है। सीन देखने में भी अच्छे लगते हैं। कहीं भी देखने पर नहीं लगता कि ब्लूच नहीं देख रहे हैं। इसका श्रेय चिरंतन दास को दिया जा सकता है।

जो बातें हज़म नहीं होतीं

इसके अलावा सीरीज में कुछ ख़ामियां भी हैं। लेखक स्क्रीनप्ले में दर्शकों के बीच पकड़ बनाये रखने में कामयाब नहीं हो पाता है। एक एपीसोड़ देखने के बाद अगला देखने के लिए कोई बेताबी नहीं होती है। कहानी का जो मैन प्लाट है, चार पकड़े गये जासूसों को वापस लाना। लेखक की पकड़ इस प्लाट से छूट जाती है। वह कहानी को सादिक शेख़, ओडीनस की लव स्टोरी, वहां की इंटरनल राजनीति बहुत सारी चीजों में उलझा देता है। जिसकी वजह से कई सारे सवालों के जवाब सुलझने के बजाय और उलझ जाते हैं।

किसी भी फ़िल्म के लिए कंटीन्यूटी (निरंतरता) बहुत ज़रूरी है। सीरीज में कई जगह जिसकी चूक साफ नज़र आती है। एक जगह आनंद कबीर को गोली लगती है। अगले ही सीन में वह गोली चला रहा है, उसका जख़्म कब भर जाता है, पता ही नहीं लगता है और तो और उसके कपड़ों पर भी ख़ून का कहीं निशान नज़र नहीं आता है। आनंद कबीर को शहजाद अंत में चाकू मारता है। उसके बाद भी वो आसानी से उठता है और भागने लगता है। उस चाकू का भी उसकी बॉडी पर कोई असर नहीं होता है। चलो इतना हज़म भी कर लेते कम से कम जख़्म के निशान तो दिखा देते।

एक सीन में ऐजेंट इशा को दिखाया है कि वो एक दुश्मन पर गोली नहीं चला पा रही है। उसे हथियार चलाना नहीं आता है। जबकि वह शातिर एजेंट है। यह भी अगर मान लें तो अगले ही सीन में इशा एक दम प्रोफेशनल शूटर की तरह गोलियां चला रही है। इस तरह की बारीकी किसी भी किरदार की संज़ीदगी (गम्भीरता) को कम कर देती हैं।

सबसे असल बात यह पहली जासूसी कहानी है जिसमें सब कुछ ओपन (खुलेआम) हो रहा है। सारे किरदार पहले ही एक्सपोज (बेनकाब) हैं, सबके बारे में सबको पता है। कोई किसी की जासूसी नहीं कर रहा है। खुलेआम फाइट चल रही है। ट्रेलर में एक जासूस की इतनी बड़ी भूमिका देखने के बाद सीरीज देखने पर सब कुछ खुलेआम होना ख़लता तो है।