अजब लव स्टोरी है
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चमन बहार एक छोटी सी फ़िल्म है जिसे आज से ही नेटफिल्कस पर देखा जा सकता है। फ़िल्म गांव देहातों के वातावरण, वहां के रोजगार, वहां के रिश्ते, वहां की दोस्ती और वहां के प्रेम को दिखाती है जिसे देखकर आपको हल्की-हल्की सी हसी आती है और कहीं-कहीं गुस्सा भी।

कहानी

कहानी छत्तीसगढ़ के कस्बे लोरमी की है। कहानी में ऐसा भी कुछ नहीं है जिस से फ़िल्म को समझने में मुशकिल हो।फ़िल्म बहुत ही साधारण से प्लाट से आगे बढ़ती है।

वन विभाग में काम करने वाला बिल्लु (जितेंद्र कुमार) एक रात भालू से ड़रकर नौकरी छोड़ देता है। वह एक चमन बहार पान की टपरी लगा लेता है लेकिन कुछ ही दिन पहले जिला बदल जाने के कारण उस रास्ते से लोगों का गुजरना लगभग बंद हो जाता है जिसके कारण उसकी टपरी पर कोई नहीं आता।

जैसा कि हर कस्बें में एक दो नमूने होते हैं। लोरमी में भी सोमू(भुवन अरोड़ा) और छोटू (धीरेंद्र तिवारी) दो लड़के हैं जो 90 के दशक की फ़िल्मों से प्रभावित हैं और हर किसी को बात-बात डैडी कहते हैं। यह इनका तकिया कलाम है। यह दोनों बिल्लु को फ्री में सलाह देते हैं और फ्री में ही उसकी सुपारी भी खाते हैं।

कहानी के 15 मिनट ऐसे ही किरदारों का परिचय कराने में गुजर जाते हैं। कहानी का ड्रामेटिक पोइंट जब आता है तब बिल्लु की टपरी के सामने सरकारी आवास में एक इंजीनियर बाबु अपने परिवार के साथ रहने आते हैं। उनकी बिटिया रिंकु( रितिका बदियानी) है जिसके रहने सहने के अंदाज से ही लगता है कि किसी बड़े शहर में पली बढ़ी है।

रिंकु को छोटे कपड़ों में देख कस्बे के सारे लड़के टपरी के चक्कर लगाने लगते हैं। उसकी एक झलक देखने के लिए  पान की टपरी पर खड़े रहते हैं। सोमू और छोटू भीड़ और मौके का फायदा उठाकर कस्बे के दो छुटके नेताओं को चूना लगाकर वहां कैरम बोर्ड खिलाना शुरू कर देते हैं। इस तरह बिल्लु की दुकान तो चल निकलती है लेकिन रिंकु का घर से निकला मुश्किल हो जाता है।

बिल्लु सहित कस्बे का हर लड़का उसके सपने देखने में लगा हुआ है। रिंकु जबकि किसी को आंख भरकर भी नहीं देखती है। फ़िल्म का बड़ा हिस्सा इन्हीं सपनों में गुजर जाता है। सपने ख़त्म होते ही समझ आता है कि फ़िल्म अंत तक आ पहुंची है।

बिल्लु नई साल पर रिंकु के घर पर कार्ड फैंकता है जो उसके पिता के हाथ लग जाता है। वो  खतरनाक पुलिस वाले भदौरिया से शिकायत करते हैं। भदौरिया बिल्लु सहित पान की टपरी पर खड़े लड़कों को मुर्गा बनाकर पीटता है। बिल्लु का दिल टूट जाता है और वो सोनम गुप्ता बेवफा है कि तरह हर जगह रिंकु मनोरिया बेवफा है लिखने लगता है। वह सड़कों पर, दिवारों पर, नोटों पर हर जगह रिंकु मनोरिया बेवफा है लिख देता है। पुलिस वाले भदौरिया को इस बात का पता लगता है और फिर बिल्लु की ठुकाई होती है।

भदौरिया बिल्लु के साथ-साथ बिल्लु की टपरी भी तोड़ देता है और उसे थाने ले जाता है। रिंकु के पिता जी शहर छोड़ने से पहले बिल्लु को घर बुलाकर उसके सामने शर्मिंदा होते हैं।

बिल्लु की पिटाई देखकर रिंकु का दिल भी पिघल जाता है। वह घर से जाते हुए बिल्लु के लिए एक पेपर में छोड़कर जाती है, जिस पर बिल्लु की और उसकी तशवीर बनी है। बिल्लु के साथ दर्शकों को भी पता लगता है कि बिल्लु ने जिस लड़की को बदनाम किया था वो भी उस से प्यार करती थी। ।

सिनेमा की नज़र से

फ़िल्म के निर्देशक अपूर्वधर बडगैयां की पहली फीचर फ़िल्म है। यह बात जल्द ही फ़िल्म देखने वालों का समझ में आ जाती है। उनके फिल्माये सीन जिस तरह साधरण नज़र आते हैं उसकी एक वजह तो बजट हो सकती है और दूसरी निर्देशक का कम तजुर्बा हो सकता है।

निर्देशक हालांकि प्रकाश झा जैसे बड़े निर्देशक के अस्सिटेंट रह चुके हैं लेकिन प्रकाश झा ने भी अपनी पहली फ़िल्म दामुल कम बजट में ही बनाई थी जिसे हर तरफ सराहा गया था और उसी से उनकी पहचान बनी थी। अपूर्वधर बडगैयां जब एक कस्बे की कहानी दिखा रहे हैं तो उन्हें ख़्याल रखना चाहिए कि कस्बे में सिर्फ एक ही घर नहीं होता है, एक ही लड़की नहीं होती है, एक ही जैसे मूवमेट नहीं होते हैं।

निर्देशक को ऐसे सीन रखने से बचना चाहिए था। एक लड़का नोटों पर किसी लड़की का नाम लिखकर पब्लिक में उसको बदनाम कर रहा है। वह लड़की फिर भी उस से प्यार कर रही है। यह काम वो हीरो की जगह किसी सहायक किरदार से करा सकते थे।

फ़िल्म की नायिका कम से कम 7 बार अपने डॉगी को लेकर घर से निकलती है। 10 बार स्कूटी से जाती नज़र आती हैं। नायक अपनी पान की टपरी पर बैठा बस उसे देख रहा है।  इन सीनों को दर्शक कितनी बारे देख सकता है दर्शक छोडिए खुद निर्देशक कितनी बार देख सकता हैं।

अच्छी एक्टिंग पर कहानी में फिट नहीं

अपूर्वधर बडगैयां क्योंकि फ़िल्म के लेखक भी हैं। एक निर्देशक ही जब लेखक होता है तो वह इस बहाने भी नहीं बच सकता कि लेखक का लिखा सीन उसे समझ नहीं आया। सोमू और छोटू किरदार अच्छे गढ़े थे। उनके किरदार में धीरेंद्र और भुवन ने एक्टिंग भी अच्छी की है लेकिन फ़िल्म की कहानी को आगे नहीं ले जा पाते हैं।

जितेंद्र कुमार अपने शुरूवाती दौर में टी.वी.एफ के टेक कनवरसेशन में ऐसे टच में नज़र आये थे। कुछ दिन पहले प्राइम पर उनकी पंचायत सीरीज आयी अगर गौर से देखें तो एक ही जैसी एक्टिंग देखने को मिलेगी। यही कारण है इस फ़िल्म में उनके किरदार को देखकर कुछ भी नया नहीं लगता ऐसा लगता है जैसे सब पहले कई बार देख रखा है।

फिल्म की नायिका रितिका के पास सिर्फ पोज देने के अलावा कुछ भी नहीं हैं। फ़िल्म में उनके हिस्से सिर्फ पासिंग सीन आये हैं। उन्हें एक संवाद तक बोलने को नहीं मिला। हालांकि सहायक किरदारों में सिला भय्या के किरदार में आलम खान और आसु भय्या के किरदार में अश्विनी कुमार ने बखूबी छोटे-छोटे से सीनों को सजाने का काम किया है।

संगीत जो दिल छू लेता है

एक बड़े संगीतकार का कहना है कि संगीत किसी भी कहानी की रूह होती है। संगीत वही है जो सीन पर और कहानी पर फिट बैठता है। आप की फ़िल्म का हीरो अगर एक पान की दुकान पर बैठा सोच रहा है और गाना चल रहा है तो फिर रूहअफजा, किमानी, मल्लहम,जाफरानी इनसे बेहतर हर्फ नहीं हो सकते। इसके अलावा धुन-धुन गाना भी मस्त कर देता है और फ़िल्म के अंत में हीरो के इमोशन के दर्शाने के लिए क्षेत्रिय भाषा का गीत ‘एक तारा तीर’ दिल में उतर जाता है। इस समय जब गाने के बोल हल्के होते जा रहे हैं चमन बहार के संगीतकार मंगेश दहाकड़े और अंशुमन मुखर्जी की तारीफ तो बनती है।

इसके अलावा कैमरा और लाइट बहुत ही साधारण हैं। फ़िल्म के कई सीन तो ऐसे हैं जिन्हें देखकर डिपलोमा फ़िल्में याद आने लगती हैं हालांकि फ़िल्म अगर बहुत ज्यादा मजा नहीं देती है तो बोर भी नहीं करती है।

कोई क्यों देखे

आप साई-फाई फैंटेसी, एक्शन, ड्रामा से अगर ऊब चुके हैं तो इस फ़िल्म को जरूर देखें। यह आपकों बहुत ही अलग सी लगेगी। इसका हीरो आपको हवा में उड़ने वाला नहीं बल्कि एक आम आदमी लगेगा जिसे गांव कस्बों में हम सबने देखा है।

शहर में ही नहीं गांव कस्बों में लड़कियों को लेकर लोगों की क्या सोच होती है। एक शरीफ परिवार को किन परेशानियों का सामना करना पड़ता है। देख सकते हैं।

कुछ ऐसा देखना चाहते हैं जो आपको हल्का-हल्का अंदर से गुदगुदाये तो देख सकते हैं। मजा आयेगा।

निर्देशक: अपूर्वधर बडगैयां
लेखक: अपूर्वधर बडगैयां
कलाकार: जितेंद्र कुमार, भुवन अरोड़ा, रितिका बदियानी, आलम खान, धीरेंद्र तिवारी
प्लेटफार्म: नेटफ्लिक्स