दोस्ती, मुहब्बत और साजिश
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यह 1988 की बात है। सात बार का विश्व चेम्पियन खिलाड़ी अपनी प्रेक्टिस करके स्टेडियम से बाहर निकलता है। बाहर निकलते ही उस पर ताबडतोड़ गोलियां चला दी जाती हैं। वह खिलाड़ी मोके पर ही मर जाता है। यह केस सी.बी.आई को दे दिया जाता है। इस केस में सी.बी.आई मरने वाले की पत्नी और उसके दोस्त के साथ सात लोगों के  ख़िलाफ चार्जशीट दायर करती है।

उसी चार्जशीट के आधार पर अदालत में केस चलता है। वकील रामजेठमलानी सी.बी.आई की चार्जशीट को चेलेंज करते हैं। यह तो एक नेशनल चेम्पियन की असल कहानी है। इसी से मिलती-जुलती या यूं कहें की इसी के नाम बदलकर चार्जशीट  सीरीज जी5 पर मौजूद है।

निर्देशक: शशांत शाह

कलाकार: अरूनोदय सिंह,शिव पंडित,हर्षिता भट्ट,त्रिधा चोधरी,सिकंदर खैर, अश्विनी केलकर, किशोरी शहाने।

प्लेटफार्म: जी5

मैं कहानी की शुरूवात सीरीज के एक संवाद से करूंगा ” राजपूत औरतें मर जायेंगी पर अपने सिंदूर के ख़िलाफ नहीं जायेंगी”। यह डॉयलॉग एक नेता और राजघराने से ताल्लुक रखने वाला एक राजा (अरूनोदय सिंह) सी.बी.आई के एक अफसर विधुर (सिकंदर खैर) से अपनी राजपूत पत्नी की तारीफ में बोलता है।

राजा साहब को अपनी पत्नी पर नहीं उसकी रगों में दौड़ रहे ख़ून पर भरोसा है। उनकी पत्नी मर जायेगी मगर उनके ख़िलाफ गवाही नहीं देगी। क्योंकि उसकी रगों में राजपूतों का ख़ून है। उनके दोस्त सिराज मलिक(शिव पंडित) की पत्नी अंतरा मलिक ( त्रिधा चोधरी) अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने पति का ख़ून करा देगी। क्योंकि पतियों के लिए जान तो राजपूत औरतें देंती हैं, दूसरी औरतें तो जान लेती हैं?

यह संवाद वैसे तो बहुत ही साधारण है। इस सीरीज को समझने के लिए लेकिन काफी मददगार है। प्रेम करने का अधिकार सिर्फ राजा को है। प्रेमिका चाहे किसी और की पत्नी ही क्यों ना हो। विरोध ना सुनने का अधिकार सिर्फ राजा को है। विरोध करने वाला चाहे कितना भी ईमानदार और देश प्रेमी क्यों ना हो। बाकी सब राजा साहब को बचाने का काम करते हैं। राजा चाहे जितना भी अन्यायी क्यों ना हो।

यह कहानी भी ठीक वैसी ही है। राजा साहेब की दोस्ती एक टेबिल टैनिस के खिलाड़ी सिराज मलिक(शिव पंडित) से हो जाती है। बेचारा खिलाड़ी राजा साहेब को दिल से अपना समझने लगता है। लेकिन राजा तो किसी के होते नहीं। यह बात सिराज को जल्द ही पता लग जाती है।

सिराज को जब राजा और अपनी पत्नी के सबंधों के बारे में पता चलता है। वह इस शर्त पर उसके बाद अपनी पत्नी अंतरा मलिक( त्रिधा चोधरी) को माफ कर देता है कि वह आगे से ऐसा ना करे। अंतरा अपने पति से वादा भी कर लेती है और वह राजा का फोन नहीं उठाती है।

लेकिन राजा तो राजा ठहरे। उन्हें कोई मना करे। वो भी एक स्त्री उन्हें भला कैसे मंजूर होता। वह अंतरा को बीच सड़क से उठा लाते हैं। उसे प्यार का एहसास कराते हैं। अंतरा को पति से ज़्यादा राजा साहेब के प्यार पर भरोसा होता है। यह त्रिकोणीय प्रेम आपसी रंजिश का रूप ले लेता है। जिसमें सिराज मलिक की हत्या हो जाती है। कुछ टाईम के लिए राजा को जैल होती है। राजा पर मुकदमा भी चलता है। पर राजा तो राजा ठहरे उन्हें भला कोई क्या सजा दे सकता है चाहे क़ानून के हाथ कितने भी लम्बें क्यों ना हों। राजा अदालत से बाइज्ज़त बरी हो जाता है।

सिनेमा की नज़र से

वह घटनाएं जिनमें कल्पना से ज़्यादा हक़ीकत में ज़्यादा ड्रामा हो। मीडिया जिनका बहुत पहले ही रस निचोड़ चुकी हो। सिनेमा में फिर उन पर बहुत कुछ दिखाने के लिए नहीं रह जाता है। उन घटनाओं पर जब सिनेमा बनता है तो एक सवाल बनता है। निर्देशक कहीं किसी के के पक्ष में तो नहीं झुक जायेगा। इस सीरीज में निर्देशक कम से कम निष्पक्ष दिखने की कोशिश तो कर रहा है। लेकिन उस वक़्त की सरकार की तरफ एक संदेह वाला इसारा करके कहीं ना कहीं जजमेंटल भी हो रहा है। किसी भी निर्देशक को जबकि ऐसा करने से बचना चाहिए।

इस सीरीज को देखने में मजा तो आया लेकिन उस से भी ज़्यादा मज़ा मुझे 1988 की एक ऐसी ही असल कहानी को उसके असल किरदारों को जानने में आया। किसी सच्ची घटना से प्रभावित होकर जब आप काम करते हैं तो आपको किरदारों को दिखाना होता है कि उनका नज़रिया क्या था?

सिराज मलिक की हत्या हो जाती है। उसकी पत्नी अंतरा जो मुख़्य किरदार थी। मुझे उसका किरदार ही समझ नहीं आ रहा था। वह लालची है, उसे बड़ा बनना है, वह खिलाडी है, वह प्रेमिका है क्या है? अंतरा को जस्टीफाई करने के लिए उसकी मां का किरदार रखा गया है। सिनेमा किसी भी दस्तावेज को उठाकर हुबहू दिखाने का नाम नहीं होता है।

अरूणोदय सिंह में एक राजा का अंहकार तो दिखता है। उन्होंने काफी हद तक किरदार को पकड़ने की कोशिश की है। इसके अलावा भी लेकिन वो बहुत कुछ कर सकते थे। अंतरा के किरदार में चित्रा चोधरी भटकी हुई नज़र आती हैं, जिन्हें खुद नहीं पता कि उन्हें क्या करना है। सिकंदर खेर और सतीश कोशिख ने अपना अनुभव स्क्रीन पर दिखाया है।

कहानी को पहले से ही जानने के बाद भी लेखक ने कुछ नये तरीके से लिखने की कोशिश तो की है। किरदारों पर लेकिन बहुत ज़्यादा काम नहीं कर पाये लेकिन उसके बाद भी एक बार आसानी से देखा जा सकता है।