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इस समय इंसान की सबसे बड़ी समस्या है कि इंसान ही उसे समझ नहीं पा रहा है। एक ही घर में रह रहे दो लोगों के बीच भी इतने मतभेद होते हैं कि लोग बात-बात पर एक दूसरे से इरीटेट हो जाते हैं। इन्हीं मतभेदों के चलते आदमी अपने दोस्तों से करीबियों से बात करने से भी बचने लगता है।

आदमी ही जब आदमी से बात करने से बचता है तब आदमी जानवरों से अपने मन की बात करता है। एक पेट आपका सबसे अच्छा दोस्त बन जाता है। वह आपके परिवार का हिस्सा हो जाता है। आप उसके दर्द को समझते हो, वह आपके दर्द को समझता है। आप उसके दुख में दुखी होते हो वो आपके दुख में दुखी होता है। वह आपके दिन भर के स्ट्रेस को कम कर देता है। हम जो भाग दौड़ भरी ज़िंदगी जीना भूल चुके होते हैं। वह हमें जीना सिखाता है। पेट इंसान नहीं होते लेकिन फिर भी हमारी हर बात को कैसे समझ लेते हैं। इन्हीं एहसासों को दिखाती MX Player पर टी.वी. एफ की छोटी सी सीरीज चीजकेक बहुत कुछ कह जाती है।

क्रिएटर: पलाश वासवानी

कलाकार: अकांक्षा ठाकुर, जितेंद्र कुमार, कुमार वरूण, महेश मांजरेकर, दिलनाज इरानी

प्लेटफार्म: MX Player

कहानी हर आदमी को आसानी से समझ में आने वाली है। जिसे आदमी समझ ही नहीं सकता, महसूस भी कर सकता है। क्योंकि इस दौर में इंसान के पास मनोरंजन के सबसे ज़्यादा संसाधन है। उसके बावजूद भी वह अकेलेपन से जूझ रहा है।

इंसान से उसका भरोसा उठ चुका है। वह एक इंसान से ज़्यादा एक पेट पर भरोसा करता है। वह इंसान से ज़्यादा एक पेट को लेकर इमोशनल हो जाता है। चीजकेक में भी नील(जितेंद्र कुमार) और समीरा(अकांक्षा ठाकुर) पति पत्नी होने के बाद जरूरत से भी कम बातें कर पाते हैं।

यह दोनों ही अपने-अपने कामों में बहुत व्यस्त हैं। एक दूसरे के लिए बहुत कम समय निकाल पाते हैं। यह सब दुखड़े समीरा अपनी बहन के साथ शेयर करती है। समय लेकिन किस के पास बचा है। समीरा को एक दिन एक डॉगी मिलता है। वह उसे ऐसे ही थोड़ा प्यार करती है और वह उसके पीछे-पीछे चल देता है।

समीरा उसे घर ले आती है। जितेंद्र को जो पसंद नहीं है। समीरा उसे सड़क पर छोड़ देती है लेकिन वह तब भी नहीं जाता है। वह लोग उसे जानवरों के आश्रम लेकर जाते हैं। वहां भी उसको नहीं रखा जाता है। वह उसे अडोप्ट कराने के लिए सोशल मीडिया पर इमेज डालते हैं और उसका नाम चीजकेक रखते हैं।

इतना सब होने के बाद नील और समीरा को एहसास होता है कि इसके बहाने ही सही कई साल बाद हमने एक दूसरे से इतनी बात की है। हमने अपना-अपना काम छोड़कर एक साथ वक़्त बिताया है। एक आदमी चीजकेक को अडोप्ट करने के लिए आता भी है, लेकिन उस आदमी का व्यवहार देखने के बाद यह लोग उसे चीजकेक देने से मना कर देते हैं।

यह लोग जैसे ही फैंसला करते हैं कि वह चीजकेक को अपने पास ही रखेंगे। उसी वक़्त उन्हें चीजकेक के असली मालिक का पता लगता है। यह लोग चीजकेक को उसे देने से मना कर देते हैं। लेकिन जब समीरा और नील को पता चलता है कि चीजकेक किसी अंधी बच्ची का सहारा था। वह चीजकेक को उसी लडकी के दरवाजे पर बांध आते हैं। चीजकेक तो चला जाता है लेकिन नील और समीरा अपने आपको पा लेते हैं।

सिनेमा की नज़र से

टी.वी.एफ जिस तरह के कॉन्सेप्ट चुनता है। यह देखकर कर कोई भी बता सकता है, इसको बनाने में उन्हीं का हाथ है।

कहानी और कोन्सप्ट के स्तर पर तो चीजें बहुत ही सही हैं। नई हैं। लेकिन पटकथा में बहुत सी ख़ामियां भी हैं। समीरा का पति नील चीजकेक को पसंद नहीं कर रहा है लेकिन अचानक से ही इतना पसंद करने लगता है कि इमोशनल हो जाता है। यह बात पांच एपीसोड के स्क्रीनप्ले में थोड़ी कच्ची रह गई, पूरी तरह पकी नहीं।

प्रोड़क्सन की कमी भी साफ दिखाई देती है। एक ही लोकेशन का बार-बार इस्तेमाल बज़ट कम के लिए तो सही है लेकिन दर्शक नये सीन के साथ कुछ नया देखना चाहता है। जैसे समीरा का बॉस 5 एपीसोड में तीन-चार बार दिखाई देता है। उसी कोस्टयूम में, उसी रूम में, उसी जगह, उसी पोजीशन में। नील अपने दोस्त के साथ जहां काम करता है, उसे कई बार उसी जगह उसी पोजीशन में देखकर एक ही जैसी बातें सुनकर नये सीन में कुछ नया देखने की इच्छा मर जाती है।

निर्देशन देखकर ही लगता है कि टी.वी.एफ का प्रोग्राम है। ऐसा क्यों लगता है, यह निर्देशक को सोचना चाहिए। निर्देशक अगर चाहता तो कहानी काफी इमोशनल कर सकता था। इस सब्जेक्ट पर उसके पास दिखाने के लिए बहुत कुछ था। लेकिन उसने दिखाने के लिए उस जगह को चुना जहां डॉग रखे जाते हैं। उन लोगों को चुना जो अपनी सारी तन्ख़वाह जानवरों पर लगा देते हैं। उसने चुनी ऐसी जगह जहां जानवरों की भाषा के एक्सपर्ट लोग जानवरों की भाषा समझकर उनसे बात करते हैं। यह कितना सच है नहीं पता लेकिन नया ज़रूर था।

हालांकि चीजकेक के असली मालिक की दुखभरी कहानी थोड़ी तो फ़िल्मी हो जाती है। चीजकेक भी अपने ट्रेनर के पीछे तो भाग लेता है और जिसने उसे पाला उस लड़की की तरफ देख भी नहीं रहा है। वहां तो पता लगता है कि चीजकेक की ट्रेनिंग में कमी रह गई।

संगीत अच्छा है। काफी इमोशनल करने वाला है। दोनों ही किरदार लेकिन थोड़े ज़्यादा ही इमोशनल हो जाते हैं।

क्यों देखना चाहिए?

आप अगर घर में पेट लाना चाहते हैं। आपको लगता है कि लायें क्या ना लायें। ले आये तो क्या होगा। इन सब सवालों के जवाब पाने के लिए चीजकेक देख सकते हैं।

वह लोग जिन्हें पेट पसंद हैं। वह लोग जो उन्हें देखकर इमोशनल रहते हैं और वो भी जो नहीं रहते हैं। इंसानों का व्यवहार घर में पेट के आने से कैसे बदलता है। दोनों ही तरह के लोग देख सकते हैं।

वह बच्चे जो अपने पेट से बहुत ही प्यार करते हैं। यह वह लोग जिन्हें जानवरों से प्यार है। वह लोग जो जानवरों को लेकर काफी गम्भीर हैं। उन्हें देखकर काफी अच्छा लगेगा, यह उन्हीं के मतलब का है।

इसके अलावा बहुत डार्क या कुछ ऐसा जो बहुत लम्बें समय तक याद रहे, देखना चाहते हैं तो आप निराश हो सकते हैं।