सोशल क्राइम थ्रिलर
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हम जिस समाज में रहते हैं। उसी समाज में महिलाओं की जो स्थिति है उस पर लगभग हर देश के सिनेमा में कुछ ना कुछ बना है और बन भी रहा है। लेकिन जी5 पर आयी सीरीज चुड़ैल में ऐसा क्या है कि महिलाओं के दर्द को इतने नज़दीक से देखती है। महिलाओं के खिलाफ घरों में होने वाले अपराधों को नैतिकता के पैमाने से परे एक हक़ और इंसाफ के तराजु में तोलती है।

निर्देशक: आसिम अब्बासी
लेखक: आसिम अब्बासी
कलाकार: सारावत गिलानी, यशरा रिजवी, निमरा बूचा, मेहर बानो।
प्लेटफार्म: जी5

कहानी चार ऐसी औरतों की है जो लगभग एक ही जैसे हालातों से गुजर रही हैं। एक जुबैदा है जो बॉक्सिंग सीखना चाहती है लेकिन उसके घरवाले उसे इजाजत नहीं देते। उसके साथ मारपीट करते हैं। एक जुगनू है जिसका बिजनेस खराब हो जाने के कारण उसे पैसों की जरूरत है। एक सारा है जो वकील है लेकिन एक अमीर आदमी की हाऊस वाईफ बनकर रह गई है। इनमें एक है बतूल जो अपने शौहर के कत्ल के इल्जाम में 20 साल जेल में सजा काटकर लौटी है।

किस्मत इन चारों को एक साथ मिलाती है। यह चारों मिलकर सारा के पति का बाकी औरतों के साथ अफेयर का पता लगाते हैं। उसके बाद सारा अपने पति के पैसे से ही एक गुप्त बिजनेस शुरू करती है। यह लोग एक ऐसी गुप्त एजेंसी बनाती हैं जिसमें अमीर औरतों से पैसे लेकर उनके पतियों की जासूसी करती हैं। गरीब औरतों पर जुल्म करने वाले पतियों को उनके घर में घुसकर सबक सिखाती हैं। यह अपने उसी ग्रुप का नाम चुड़ैल रखती हैं।

चुड़ैल ग्रुप बहुत जल्द ही फैमस हो जाता है तो कुछ बातों को लेकर उनके बीच ही दरार पड़ जाती है। बतूल कुछ ऐसा कर देती है जो बाकी ग्रुप को पसंद नहीं आता है। उसी के कारण इन सबका राज खुल जाता है और चुड़ैल टीम के लोग पकड़े जाते हैं। लेकिन चुड़ैल जो कर रहीं थीं उस से वो औरतों को आजादी दे रहीं थी या छीन रहीं थीं। क्या वह सभी वर्ग की औरतों को आजादी दे रही थीं? उनका यह कदम कानून के दायरे में था। दस एपिसोड की सीरीज में इन्हीं सवालों के जवाब छिपे हैं।

सिनेमा की नज़र से

सीरीज के देखने के बाद कोई नहीं बता सकता कि उसका निर्देशक एक महिला नहीं पुरूष है। ” हम बच्चों को गणित सिखाते हैं, विज्ञान सिखाते हैं, लड़कियों के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए यह क्यों नहीं सिखाते” इस छोटे से संवाद से ही आप अंदाजा लगा सकते हैं कि निर्देशक ने कितने नज़दीक से औरतों पर जुल्म होते देखा है। उन्होंने बहुत छोटे-छोटे से मसलों को दिखाने की कोशिश की है और मजे की बात तो ये है कि दर्शक जिन बातों को औरतों के छोटे मसले समझता है दरअसल वही गम्भीर मसले हैं।

औरतों के शोषण को इतने नजदीक से

यह सीरीज महिलाओं के अधिकारों की बात तो करती है लेकिन एक मोड़ पर जब चुड़ैल टीम की सबसे खतरनाक लैडी बतूल को पता चलता है कि जिस अमीर औरत ने उसकी बच्ची को गोद लिया था उसकी अपनी बच्ची होने पर उसने उसकी बच्ची को छोड़ दिया। उस समय महिला के अधिकारों की बात सिर्फ मर्द से नहीं रह जाती। महिलाओं में भी वर्ग संघर्ष तक चली जाती है। क्लास कनफिलिक्ट तक चली जाती है। सीरीज में जिसे बहुत ही करीब से दिखाया गया है।

सीरीज जब महिलाओं के साथ पुरूषों के धोखे को दिखा रही है। पुरूष से महिला के अधिकारों की बात कर रही है। उसी समय जेंडर की भी बात कर रही है। एक महिला दो समलेंगिक पुरूषों के रिश्ते को कैसे देखती है। इस सवाल पर सीरीज महिलाओं को भी कटघरे में खडा कर देती है। सीरीज में हर औरत की अपनी एक कहानी है। इस तरह मिलकर बहुत सारी कहानियां बनती हैं। इनमें कई कहानियां तो ऐसी हैं कि देखकर दिल दहलने लगता है।

ऐसे किरदार निभाना काफी मुश्किल है

सीरीज में चार मुख़्य किरदार हैं। चारो ही किरदारों का रंग रूप, क्लास, परेशानी सब अलग है। उन चारों को जो आपस में जोड़ता है वह उनका औरत होना है। बतूल का किरदार निभाने वाली निमरा बीस साल सजा काटकर लाैटी लैड़ी से कम नहीं लगती हैं। उन्होंने सीरीज में एक जान फूंक दी है। उनके साथ में सारावत गिलानी, यशरा और मेहर ने और उनके साथ बाकी किरदारों ने भी अपने छोटे काम को बड़ा करके दिखाया है। सभी कलाकार इसका श्रेय निर्देशक को देते हैं। कलाकारों का कहना है कि सभी कलाकार एक साथ रहते थे। एक साथ खाते थे। कोई छोटा बड़ा नहीं था। इसलिए सभी इतने अच्छे से काम कर पाये।

वासेपुर के गानों पर नये सीन 

संगीत सीरीज के बीच में दिल में उठने वाली एक हूक की तरह उठता है। वासे पुर का गाना ‘संय्या काला रे, संय्या काला रे’ को नये अंदाज में जिस तरह से फ़िल्माया गया है। उसमें एक नयापन है। कुछ इंग्लिश गानों को और कुछ फैमस गानों को नई बीट पर दिखाना कई बार अच्छा लगता है लेकिन कई बार मजे से परे होता है।

इसके अलावा सिनेमाटोग्राफी को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि बहुत कुछ कमाल ही कर दिया है लेकिन फिर भी जिस तरह का सिनेमा वहां बनता है। उस हिसाब से काफी बेहतर है।

कुछ बातें जो हज़म नहीं होतीं

एक महिला अपने समलेंगिक पति का गोश्त पकाकर खा जाती है। यह सीन के लिहाज से तो नयापन है लेकिन सिच्वेशन में हज़म नहीं होता।

बतूल की सात साल की बेटी है जब वो अपने पति की हत्या करती है। बतूल की हत्या तक का किरदार किसी और महिला ने और बीस साल बाद जेल से छूटकर आयी बतूल का किरदार किसी और महिला ने निभाया है। इंसान का चेहरा बीस साल में इतना बदल जाता है बात हज़म नहीं होती।

कोई क्यों देखे?

औरत दुनिया के किसी भी मुल्क में हो। उसके साथ कुछ ऐसी बातें होती है जो बाकी दुनिया की औरतों के साथ भी होती ही हैं। वह बातें कौन सी हैं। एक पुरूष और महिला का रिश्ता कितना नाजुक होता है। वह कौन-कौन सी बातें हैं जिनसे भरोसा टूट सकता है। एक अच्छे रिश्ते में भी दरार पड़ सकती है। यह जानने के लिए देख सकते हैं।