‘Code M’ Review : जात न पूंछों सिपाही की

जात-पात के साईडिफेक्ट
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किसी भी समाज में, किसी भी महकमें में जात-पात भेदभाव कितना ख़तरनाक होता है। इस बात को लेकर बहुत ही लम्बें समय से काम हो रहा है। यही भेदभाव अगर किसी भी देश की आर्मी में होता है तो कितना ख़तरनाक हो सकता है। जिसके भी पास ऑर्डर देने का पावर है। उसका देश को किसी भी धर्म-जात से ऊपर को रखना कितना जरूरी है। यह सीरीज दिखाती है।

सिनेमा में आर्मी को लेकर हाल फिलहाल में भी और उस से पहले भी बहुत काम होता रहा है। वक़्त-वक़्त पर वक़्ती हालातों को छूने की कोशिश की गई है। इंडिया में ज़्यादातर फ़िल्में सेना के वक़ार उसके हौसले उसकी तारीफ में बनी हैं। इसमे कोई शक़ नहीं की उन फ़िल्मों की सफलता ने भी बुलंदियों को छुआ है।

कुछ लेखक निर्देशकों ने लेकिन आर्मी का आदर करते हुए। इसके अनदेखे पहलुओं को छूने की कोशिश की है।  जनवरी 15 को आल्ट बाला जी और जी5 पर 8 एपीसोड की सीरीज कोड एम,  भी उन्हीं में से एक है। जिसे देखने पर आपको एक नया नजरिया मिलेगा।

निर्देशक: अक्षय चोबे

लेखक: सुलगना चटर्जी,सुभ्रा चटर्जी,अनीरूद्धा गुहा

कलाकार: जेनिफर विंगेट, रजत कपूर,आलेख कपूर, केशव साधना, अंगद संधू।

प्लेटफार्म: आल्ट बाला जी और जी5

इस कहानी को आसान लफ्जों में इस तरहा समझा जा सकता है। भारतीय संविधान बनने के बाद भारतीय संविधान के मुताबिक सभी धर्मों-जातों से उपर भारतीय संविधान को रखा जायेगा। यह बात अलग है कि ओहदेदार लोगों ने हमेशा ही अपनी जात-पात को अपने कर्तव्य से उपर रखा। ऐसा करना कितना ख़तरनाक है। इस से क्या नुकसान हो सकते हैं। यही कहानी का मुद्दा है।

यह कहानी भी एक ऐसे ही अंहाकारी कर्नल सूर्यवीर चौहान( रज़त कपूर) की छोटी सोच सेे उपजती है। सूर्यवीर चौहान किसी राज घराने से ताल्लुक रखता है। उसे आर्मी से ज़्यादा अपने राजवंशी ख़ून पर नाज़ है। उसी ख़ून की रक्षा करते हुए। वह अपने ही दलित अफसर को फेक एनकाऊंटर में मरवा देता है और अपनी असलियत छिपाने के लिए एक झूंठी तहरीर बनाता है।

सूर्यवीर ऐसा इसलिए करता है क्योंकि उसकी बेटी उस दलित अफसर से प्यार करती है। वह इस काम में जिन अफसरों को ब्लैकमेल करके इस्तेमाल करता है। वह दोनों मेजर शक्ति ( आलेख कपूर) और मेजर गौरव (केशव साधना) समलेंगिक हैं। आपस में उनके जिस्मानी सम्बंध है। इस बात से दोनों ही ड़रते हैं कि सेना में किसी को उनके बारे में पता चला तो उन्हें निकाल दिया जायेगा। सूर्यवीर उनकी इसी कमजोरी का फायदा उठाकर उनसे दो मुस्लिम लड़कों के साथ अपने होने वाले दामाद को भी मरवा देता है।

इस एनकाऊंटर की तहक़ीकात करने के  लिए मेजर मोनिका चौहान(जेनिफर विंगेट) को बुलाया जाता है। मोनिका एक म़र्डन ख़्यालात की लड़की है। वह अपना एक अलग नज़रिया रखती है। जिसके कारण उसे  शक्ति और गौरव की इंकवायरी करने के लिए अपने ही साथ वालों से बहुत कुछ सुनना पड़ता है। लेकिन सभी परेशानियों की बदोलत मोनिका सूर्यवीर और उन दोनों हत्यारों का पर्दाफाश कर ही देती है।

सिनेमा की नज़र से

‘यह लोग कोटे से नौकरी पाकर हमारे साथ खाना खायेंगे, हमारे घरों में घुसने की कोशिश करेंगे, हमारी बेटी से शादी करके हमारे ख़ून को गंदा करेंगे, हम नहीं होने देंगे’

यह सीरीज का आखिरी डॉयलॉग है। स्वदेश दीपक का नाटक कोर्ट मार्शल या राहुल बॉस की फ़िल्म शोर्य  का बहुत हिस्सा इस सीरीज से मिलता है। इसमें मुझे कोई परेशानी भी नहीं दिखती क्योंकि भेदभाव की वारदातें ना उस वक़्त कम थीं ना आज कम हैं। यह जब तक हैं तब तक ऐसा सिनेमा बनता रहना चाहिए।

इस सीरीज दो आर्मी को अफसरों को समलेंगिक दिखाना। उनके बारे में लोगों की सोच को दिखाना। इतना आसान नहीं है। इसकी लेखक सुभ्रा चटर्जी फ़िल्म शोर्य से भी जुड़ी रही हैं। यही कारण हो सकता है कि सीरीज के बहुत सारे शीन फ़िल्म शोर्य के शीन जैसे ही लगते हैं। जो सिनेमा के लिहाज से कई सारे सवाल भी खड़े करते हैं। शोर्य फ़िल्म में जिस तरह से के.के. मेनन आखिर में अपना सच करते हैं। कोड एम का कर्नल चौहान भी आखिर में कुछ उसी तरह अपना ज़ुर्म क़ुबूल करता है।

सूर्यवीर चौहान जो एक बहुत ही चालाक ऑफिसर है। इतनी आसानी से  उनका अपना जुर्म कुबूल करना रज़त कपूर की बेहतरीन अदाकारी का ग्राफ भी गिरा देता है। जबकि उन्होंने पूरी सीरीज में जितनी समझदारी से सूर्यवीर चौहान का किरदार निभाया है। आर्मी अफसर का वैसा किरदार मैने अभी तक किसी का नहीं देखा है।

उनकी दमदार अदाकारी की वज़ह से ही मुझे मेजर मोनिका के किरदार में जेनिफर विंगेट सफल नज़र नहीं आती हैं। सीरीज में उनका सामना जब-जब कर्नल सूर्यवीर चौहान से होता है तब-तब लगता है कि कोई और होना चाहिए था। खासकर जब एक सीन में रजत कपूर उन से कुछ कहते हैं और वह हिन्दी सीरियल की तरह अपनी आंखें नम कर लेती हैं। वह तब केरक्टर से बाहर चली जाती हैं। 

मेजर शक्ति और मेजर गौरव के किरदार में खासकर केशव साधना ने भी बाकियों से काफी अच्छा काम किया है। सही कहूं तो उन्हें अपनी एक्टिंग साबित करने के लिए एक सीन मिला है। जिसमें उन्हें एक आर्मी ऑफिसर के बेटे और आर्मी ऑफिसर के समलेंगिक होने वाले दर्द को बयान करना है। उस सीन को उन्होंने जिस तरह से निभाया उसी में वह अपने आपको साबित कर जाते हैं। 

आखिर में, सूर्यवीर की बेटी अपने बाप के गाल पर एक जोरदार थप्पड मारती है। यह हिन्दी सिनेमा में एक आईडियल सीन है। हिन्दी सिनेमा में बहुत देखा गया है कि इज्ज़त के चलते बाप बेटी के प्रेमी को मार देता है। उस पर भी दलील की अपनी बेटी से प्यार करता है इसलिए किया है। लेकिन इस सीरीज में जब सूर्यवीर चौहान की बेटी अपने बाप के गाल पर तमाचा मारती है तब सिर्फ वो अपने बाप के गाल पर नहीं तमाम रूढ़िवादी निज़ाम के गाल पर  तमाचा मारती है।

इस कहानी का मुद्दा जितना गम्भीर है। उसके साथ निर्देशक ने इमानदारी दिखाने की पूरी कोशिश की है लेकिन फिर भी कहीं ना कहीं कमी रह ही गई है। इसमें कोई बड़ी बात भी नहीं है, हमेशा सब कुछ परफेक्ट नहीं होता। बस कुछ कास्ट और एपीसोड को देखने के बाद ऐसा लगता है कि शायद कुछ और हो सकता था।

कोई क्यों देखे?

एक पढ़े लिखे समाज में जात-पात के नाम पर किसी के साथ भेदभाव रखना इस देश के लिए, इस देश की तरक़्की के लिए, इस देश की महिलाओं के लिए, इस देश की सिक्योरिटी के लिए कितना ख़तरनाक हो सकता है? जानने कि लिए देख सकते हैं।

Naseem Shah: