थोड़ा इमोशनल थोड़ा ख़तरनाक
70%Overall Score

मुम्बई जुर्म की दास्तान सुनाती 14 एपीसोड की एक और सीरीज एक थी बैगम एम.एक्स प्लेयर पर 8 अप्रेल को रिलीज हुई है। जुर्म की जिस दुनिया में जहां बड़े-बड़े इक्के और बादशाह भरे पड़े हों जिनके सामने सारी की सारी चाल बेकार हैं। वहां एक बैगम सबको मात दे जाती हैं। यह बैगम आखिर है कौन? जानने के लिए एक थी बैगम देखनी पडेगी।

निर्देशक: सचिन दारेकर

कलाकार: अनुजा साठे,अंकित मोहन,अभीजीत च्वहाण,संतोष जुवेकर,विजय निकम,चिन्मय दीपक मांडलेकर,राजेंद्रा शिष्टाकर, रेशम पी.एस।

प्लेटफार्म: MX PLAYER

कहानी ज़हीर(अंकित मोहन) से शुरू होती है। अंकित मोहन मकसूद भाई का बाग़ी गैंगस्टर है जो मुम्बई में ड्रग्स का कारोबार रोकने के लिए एक अलग गैंग बनाता है। ज़हीर मुम्बई में मकसूद भाई का काम देख रहे नाना( राजेंद्र शिष्टाकर) के भाई रघु को मार देता है।

नाना पहले तो अपने वफादार पुलिस वाले तावड़े(अभीजीत च्वहाण) से ज़हीर को उठवाता है। ज़हीर लेकिन अदालत से छूट जाता है। उसके बाद मकसूद भाई के कहने पर नाना और तावड़े मिलकर ज़हीर को मार देते हैं।

ज़हीर की पत्नी अशरफ(अनुजा साठे) पुलिस में रिपोर्ट से लेकर मीडिया तक सब जगह चली जाती है लेकिन उसके जाने का कोई फायदा नहीं होता है। अशरफ उसके बाद खुद बदला लेने का फैंसला करती है। वह एक डान्स बार में काम करने लगती है और ऐसा जाल बिछाती है कि एक-एक कर सबको मौत के घाट उतार देती है। वह अंत में खुद भी मारी जाती हैं।

अशरफ ही वो बैगम है जो बड़े-बड़े जुर्म को बादशाहों को काट देती है।

सिनेमा की नज़र से

मुम्बई जुर्म की दुनिया के इर्द-गिर्द एक तो बहुत ही सारी फ़िल्में बन चुकी हैं। जिनमें कुछ फ़िल्मों का तो हिन्दी सिनेमा में तोड़ ही नहीं है। मधुर भंडारकर ने एक फ़िल्म चांदनी बार आयी थी जिसमें तब्बु की एक्टिंग को हमेशा याद किया जायेगा। इस सीरीज का कुछ पार्ट भी थोड़ा वैसा ही लगता है।

इस सीरीज की एक अच्छी बात है। इसके किरदार बहुत ही सही चुने गये हैं। वह मुम्बई की ही भाषा बोलते हैं जिस से किरदार और असली हो जाते हैं। ज़हीर के किरदार में अंकित मोहन और नाना के किरदार में शिष्टाकर ने जो भूमिका निभाई है काबिले तारीफ है। तावड़े के किरदार में अभीजीत च्वाहण जो भी कमाल का काम किया है। इन सब के बीच अशरफ के किरदार में अनुजा साठे की अदाकारी बहुत फीकी लगती है।

इस सीरीज के 14 एपीसोड एक साथ देखना सोचने में बोझिल है लेकिन जब देखने बैठते हैं तो आसान हो जाता है। निर्देशक ने दुबई से लेकर मुम्बई की अच्छी लोकेशन का चुनाव किया है। कुछ सीन तो इतने असली लगते हैं कि फ़िल्म सत्या की याद दिला देते हैं।

एक तरफ अशरफ के बदले की कहानी आगे बढ़ रही है, उसी के साथ-साथ अशरफ की प्रेम कहानी भी आगे बढ़ रही है। प्रेम कहानी में बीच-बीच में गाने भी आते हैं। फ़िल्म की सिच्वेशन के हिसाब से गाने भी सही समय पर आते हैं और माहोल बदलने का काम करते हैं।

इस सब के बाद भी देखने वाले 14 एपीसोड में अशरफ के साथ कहीं इमोशनल अटैच नहीं हो पाते हैं। इसकी सबसे बड़ी वज़ह पटकथा है। लेखक ने अशरफ का सफर इतना आसान कर दिया कि उसकी मदद के लिए हर जगह एक किरदार गढ़ दिया। हालांकि कहानी में आता है कि किसी सच्ची घटना से प्रभावित है उसके बाद भी लेखक अशरफ की जर्नी में डगमगा रहा है।

सीरीज में एक मीडिया हाऊस को भी दिखाया गया है। एक पत्रकार जो कि पुलिस वालों के ख़िलाफ लिख रही है उसका कहना है कि वो अपने भाई का बदला ले रही है जिसका सीरीज में कुछ खास काम देखना को नहीं मिलता है।

एम एक्स प्लेयर की अगर पिछली सीरीज देखें तो उसका कंटेट बाकी प्लेटफार्म के मुकाबले काफी अच्छा है। उसकी क्राइम सीरीज भौकाल जो उत्तर प्रदेश के क्राइम पर आधारित थी। यह मुम्बई के क्राइम पर आधारित है। अगला देखें किस पर आधारित होगा।