चमक-धमक का जमाना गया
40%Overall Score
Reader Rating 0 Votes
0%

फितरत आल्ट बाला जी और जी5 पर 18 अक्टूबर को 15 एपीसोड़ के साथ रिलीज हुआ है। इस सीरीज में बहुत सारी बातें अच्छी हैं और बहुत सारी बातें अच्छी नहीं हैं। वह बातें क्या हैं जानने के लिए एक नज़र देखें।

निर्देशक: बलजीत सिंह चड्ढा, संतोष सिंह
कलाकार: क्रिस्टल डिसूजा, आदित्य सील, दिव्या सेठ, कुमार कंचन घोष।
सीजन: 1

कहानी एक मीडिल क्लास लड़की तारिणी बिष्ट (क्रिस्टल डिसूजा) की है जो बचपन से ही अमीर बनना चाहती है। बचपन से ही जिसका सपना है किसी अमीर लड़के से शादी करके उसकी दौलत पर मजे मारना। वह अमीर स्कूल में जाती है। वहां उसकी एक लड़की एमी शेरगिल  (अनुष्का रंजन) से दोस्ती होती है। तारिणी अपनी दोस्त के पैसों पर पलने लगती है।

तारिणी किसी कालेज से मीडिया में गोल्ड मेडल हासिल करती है। तारिणी के किरदार का आई क्यू लेवल देखकर गोल्ड मेडल वाली बात पर यकीन नहीं होता है। तारिणी अपनी दोस्त एमी के घर पर रहने लगती है। यह गोल्ड मेडलिस्ट लड़की किसी अमीर लड़के को फसाने के चक्कर में लग जाती है। वह अमीर लड़का एमी का मंगेतर वीर शैरगिल (आदित्य सील) निकलता है। एमी को जब पता चलता है तो तारिणी को ज़लील करके घर से भगा देती है।

यहां से तारिणी का इंतकाम शुरू होता है। तारिणी क्या वीर को बेनक़ाब कर पायेगी। वह अपनी बहन जैसी दोस्त को फिर से वापस पा लेगी। इन्हीं सवालों के इर्द-गिर्द कहानी लिखी गई है।

क्या निर्देशक को पता है वो क्या कहना चाहते हैं?

अच्छी लोकेशन चमक धमक कहानी की कमी को पूरा नहीं करती है। यह आल्ट बालाजी की क्रियटिव टीम को समझने की ज़रूरत है। उनकी ज़्यादातर सीरीज का यही हाल है। हर सीरीज देखने के बाद ऐसा लगता है कि निर्देशक ने या तो बिना कहानी पढ़े काम शुरू कर दिया है या फिर कहानी को समझा नहीं है।

इस सीरीज में कुछ समझ नहीं आता है। एक लड़की जो पत्रकारिता में गोल्ड मेडलिस्ट है। वह पत्रकारिता की जगह किसी अमीर लड़के को फंसाकर उस से शादी करके अमीर होना चाहती है। वह इतनी खुद्दार भी है कि बाप से पैसे नहीं लेती है लेकिन हमेशा अपनी दोस्त के पैसों पर पलती है। अपनी दोस्त के भाई को फलर्ट करके उस से शॉपिंग कराती है। ये कैसी खुद्दारी है?

निर्देशक एक तरफ साबित करना चाहता है। एक महिला की शक्ति उसकी इंडिपेंडेंस को और दूसरी तरफ उस लड़की को इस हद तक बुज़दिल दिखा रहा है कि एक लड़का चाहे जहां उसे रोक लेता है और उसके साथ बदतमीजी करता है। वह उस बात को आसानी से बर्दाश कर रही है। यह कैसा किरदार है। जो बिल्कुल भी समझ नहीं आता है।

किसी भी लेखक या निर्देशक को दुनिया को दिखाने से पहले अपने किरदारों को खुद अच्छी तरह जान लेना चाहिए। इस सीरीज को देखने पर लगता है कि निर्देशक किरदारों के बारे में कुछ नहीं जानता। उसके किरदार की आदतें क्या हैं, वह क्या चाहते हैं। निर्देशक कुछ नहीं जानता। इसलिए सारे के सारे किरदार कहानी में भटकते हुए नज़र आते हैं।

संगीत का चुनाव बहुत ही गलत तरीके से किया गया। संगीत किरदारों के मूड और सिचवेश्न के साथ मैच किया जाता है। सीरीज के कितने सीन में किरदार एक दूसरे को चुनोती दे रहे हैं और बैकग्राऊंड में प्रेम वाली धुन चल रही है।

जो बातें हज़म नहीं होती

दिल्ली के एक बियर बार में पुलिस तारिणी बिष्ट को शराब पीते पकड़ती है। पुलिस उस पर प्रोष्टीटयूशन का चार्ज लगा देती है। थोड़ी देर बाद सबको छोड़ भी दिया जाता है। एक पत्रकार लड़की को उठाकर पुलिस ऐसा चार्ज लगा देगी और एडीटर सवाल पूंछने की जगह लड़की को ही नोकरी से निकाल देगा। लगता तो नहीं।

एक गोल्ड मैडल पाने वाली पत्रकार लड़की भृष्टाचारी आदमी का पर्दाफास करने के लिए पत्रकारिता का नहीं बल्कि अपने लड़की होने का सहारा लेगी। इस समय जब इंडीपेंडेंट लडकियों को लेकर बहुत कुछ लिखा जा रहा है। इसमें जबकि उल्टा ही है।

सीरीज के अंत में मुख़्य किरदार बहुत बड़ी एड़ीटर दिखाई है, लेकिन 15 एपीसोड की सीरीज में उसने ऐसा कुछ नहीं किया कि लगे वो बड़ी एडीटर बन सकती है।

अच्छी लोकेशन और चमक धमक से बेवकूफ बनाने वाले जमाने जा चुके हैं। दर्शकों को 15 एपीसोड रोकने के लिए कुछ अच्छा और हटकर करना होगा।