लॉजिक भूल जाओ।
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फिक्सर आल्ट बाला जी और जी5 पर 10 एपीसोड़ के साथ रिलीज हुआ है। किसी को सिनेमा में अगर कहानी होने ना होने से कोई फर्क़ नहीं पड़ता। वह आदमी जिसका हाज़मा इतना दुरूस्त हो कि बिना सर पैर की कहानी भी हज़्म कर सके। वही इस सीरीज को पचा सकता है। कृप्या दिमाग लगाने वाले दिमाग ना लगायें। जानने के लिए क्यों? एक नज़र देखें।

निर्देशक: सोहम शाह

लेखक: अधीर भट्ट, ज़िर्बान नूरानी

कलाकार: शब्बीर आहलूवालिया, माही गिल, वरूण बडोला, तिग्मांशु धूलिया, मुकेश छाबड़ा, ईशा कोप्पिकर, अंशुमान मल्होत्रा

कहानी तक़नीक वैसे तो कुछ भी नहीं है। लेकिन अगर तक़नीकी तोर पर देखें तो यह एक पुलिस वाले जयवीर मलिक (शब्बीर आहलूवालिया) की कहानी है। जयवीर मलिक को उसका बॉस शेरावत  (तिग्मांशू धूलिया) सस्पेंड कर देता है। मलिक को सारा शहर ताना मारता है।  मलिक दिल्ली छोड़कर मुम्बई चला जाता है।

मलिक मुम्बई जाकर अपनी एक पुरानी साथी जयंती जावडेकर (इशा कोपीकर) के साथ मिलकर अमीर लोगों के काले धंधों को छिपाता है और बदले में उनसे पैसे लेता है। वह किन-किन लोगों को फसाता है। उस चक्कर में कौन कौन उसका दुश्मन बनता है। अंत में आखिर कौन उसी का अंत कर देता है। 10 एपीसोड़ की सीरीज इसी सस्पेंस के साथ आगे बढ़ती है।

सिनेमाई नज़र से

किसी भी फ़िल्म या सीरीज में लेखक की एक भूमिका होती है। दुनिया भर में सीरीज के लेखक जब पटकथा का नया चेप्टर शुरू कर रहे हैं। पटकथा में एक नया नज़रिया दे रहे हैं। वहीं दस एपीसोड़ की इस सीरीज को देखने के बाद आपको कहीं नहीं लगेगा कि इसको लिखने में कोई मेहनत की गई है। कहानी में कोइंसिडेंस भरे पड़े हैं। नेरेटर खुद घटिया तरीके से कहानी बता रहा है। संवाद के नाम पर सस्ते जॉक्स भरे पड़े हैं। कभी भी कुछ भी हो रहा है, ना एक सीन का दूसरे सीन से कोई ताल मेल है और ना एक एपीसोड़ का दूसरे एपीसोड़ से कोई तालमेल है।

अगर सीरीज की कास्टिंग की बात करें तो बड़े कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा (आगंतुक) खुद एक छोटे से किरदार में दिखाई दे जायेंगे। तिग्मांशु धूलिया जैसे अनुभवी स्टार कहानी में भटकर अपनी एक्टिंग दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। इशा कोप्पिकर क्या कूल हैं हम से ज़रा भी अलग नहीं लगती हैं। और माही गिल तो जैसे एक पत्नी के किरदार में टाइप कास्ट ही हो गई हैं। शब्बीर अहलुवालिया एक्टिंग को छोड़कर बाकी सब कुछ कर रहे हैं।

संगीत के नाम पर सदाबहार पुराने गानों को बोल्ड सीनों के साथ परोसा गया है।

जो बातें हज़म नहीं होती

पहली बात तो कौन पुलिस वाला थाने में प्रोस्टीटयूट बुलाता है और वह काम करता है जो सीरीज में पुलिस का बड़ा अफसर शेरावत कर रहा है।

मलिक कहीं से भी बैठा हुआ अपने फोन से कॉल लगाता है। कॉल रिसीव करते ही मलिक को पता लग जाता है कमरे में क्या हो रहा है। इतनी तक़नीक कहां से सीखी। कुछ तो लॉजिक लगा लो।

एक सीन में बैंक की सी.सी टी.वी फुटेज एक आदमी दो दिन बाद हैक़ करके डिलीट कर देता है। वकील चेक किये बिना फुटेज पैनड्राइव में लेकर अदालत में भी ले जाता है। अदालत में पता चलता है पैनड्राइव में कुछ नहीं है। शूट करने से पहले लिखा था या कुछ भी शूट कर लिया।

इस सीरीज के लिए लॉजिक भूल जाओ। बस देखते जाओ।