‘Ghoomketu’ Review: नवाजुद्दीन और अनुराग की एक्टिंग भी काम नहीं आयी

एक्टिंग के सिवा कुछ नहीं
40%Overall Score

घूमकेतु जी5 की ऑरीजनल फ़िल्म 22 मई को रिलीज हुई है। फ़िल्म ने आने से पहले जितना हल्ला मचा रखा था आने के बाद वैसा बिल्कुल नहीं रहा। फ़िल्म के नाम की तरह ही दर्शक भी गोल-गोल घूमता रहता है हालांकि कुछ सीन में मजा भी आता है। इस फ़िल्म में दर्शक कितना मज़ा लेता है और कितना घूमता है। जानने के लिए पढ़ कर देखें।

निर्देशक: पुष्पेंद्र नाथ मिश्रा
लेखक: पुष्पेंद्र नाथ मिश्रा
कलाकार: नवाजुद्दीन सिद्दीकी, अनुराग कश्यप, रागिनी खन्ना, रिचा चड्ढा, रघुवीर यादव, इला अरूण, स्वानंद किरकिरे
प्लेटफार्म: जी5

कहानी एक कहानीकार की है जो बिल्कुल एक लेखक की तरह भटकती रहती है। लेखक का फिर भी एक मकसद होता है कि उसे क्या करना है। इस कहानी का लेकिन कोई मकसद नज़र नहीं आता कि निर्देशक को क्या करना है। फ़िल्म को देखने के बाद एक हल्की सी हसी आती है। यह हसी फ़िल्म देखकर नहीं बल्कि फ़िल्म के बारे में सोचकर आती है। एक फ़िल्म लेखक के स्ट्रगल पर लिखी कहानी भी सही नहीं लिखी गई।

उत्तर प्रदेश के लेखक घूमकेतु (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) की कहानी है जिसने हिन्दी में एम.ए किया है। वह ट्रकों के उपर लाइन लिखता है। घूमकेतु अपनी लिखी लाइनों से प्रभावित होकर गुदगुदी अखबार में लिखने के लिए जाता है। गुदगुदी के संपादक(बिजेंद्र काले) फ़िल्मों पर लिखी अपनी एक किताब देकर उसे फ़िल्मों में लिखने के लिए कहता है।

घूमकेतु का परिवार उसे मुम्बई नहीं जाने देगा। उसका परिवार क्योंकि थोड़ा अटपटा सा है। उसके पिता दद्दा (रघुवीर यादव) बहुत ही गर्म मिज़ाज के आदमी है वह बात-बात पर गुस्सा हो जाते हैं। उसके चाचा गुड्डन (स्वानंद किरकिरे) एक नेता हैं जिन्होंने कभी शादी ही नहीं की। एक संतो बुआ हैं जो ऐसी डकार लेती है कि सारा घर भाग जाता है। उनकी ड़कार सुनकर सब लोग परेशान हो जाते हैं।

घूमकेतु घर छोड़कर मुम्बई भाग जाता है। उसका परिवार उसके अपहरण की सूचना थाने को देता है। थाने में जब उस पर गौर नहीं किया जाता है तो विधायक गुड्डन चच्चा थानेदार को धमका देते हैं। गुड्डन चच्चा थानेदार को एक महीने का समय देते हैं।

घूमकेतु के मुम्बई जाने के संकेत मिलते हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस मुम्बई पुलिस से संपर्क करती हैं और मुम्बई की एस.पी इंसपेक्टर बदलानी(अनुराग कश्यप) को केस देती है जो रिश्वत लेता है। बदलानी के पास एक महीने का समय है। उसे मुम्बई में घूमकेतु को खोजना है। घूमकेतु के पास भी एक महीने का समय है उसे अपनी स्टोरी किसी प्रोडयूसर को बेचनी है। घूमकेतु का एक महीना पूरा होता है। मुम्बई में उसकी कहानियों को कोई पूंछता भी नहीं है। वह वापस लोट जाता है। एक दिन घूमकेतु की लिखी लाइनें अमिताभ बच्चन के हाथ लग जाती हैं। वह उन लाइनों को बोलते हैं, घूमकेतु सुनकर खुश हो जाता है।

कहानी पढ़कर नहीं आयी ना समझ में। यही देखने वालों का भी हाल है। फ़िल्म देखने के बाद दर्शकों को भी समझ में नहीं आता है। कहानी में इतने एक्सपेरिमेंट हैं कि कहानी लेखक की पकड़ से छूट जाती है।

सिनेमा की नज़र से

हिन्दी सिनेमा में उन लोगों को जाना जाता है जिन्होंने कुछ अलग तरीके का सिनेमा बनाया है। उसमें कुछ लोगों को बहुत ही सफलता भी मिली जैसे गुरूदत्त, श्याम बेनेगल, विशाल भारद्वाज, अनुराग कश्यप काफी लोकप्रिय हुए। फ़िल्म के कुछ सीन श्याम बेनेगल की फ़िल्मों की तरह दिखते हैं लेकिन उनकी फ़िल्मों की तरह दर्शकों को जोड़ते नहीं हैं।

निर्देशक फ़िल्म में भटका हुआ नज़र आता है। गोविंद निहलाणी की फ़िल्मों में कोई किरदार सिर्फ एक ही सीन में दिखता है लेकिन उसी सीन में दर्शक सब कुछ जान लेता है। इस फ़िल्म में ऐसा कुछ नहीं है। कहानी में जोड़-तोड़ किये गये हैं जो साफ दिखते हैं। निर्देशक के जोड़-तोड़ कामयाब नहीं होते हैं।

कलाकार फ़िल्म में बस एक्टिंग ही है जिस पर नम्बर दिये जा सकते हैं। रघुवीर यादव, इला अरूण, अनुराग कश्यप, स्वानंद किरकिरे जैसे बडे कलाकारों ने एक साथ काम किया है। इसमें इला अरूण और रघुवीर यादव ने अपनी अदाकारी के दम पर दर्शकों का मनोरंजन किया है। इनके अलावा अनुराग कश्यप ने एक्टिंग में थोड़ा निराश किया है हालांकि फ़िल्म में उनके सीन देखकर ऐसा लगता है कि निर्देशक ही उनसे एक्टिंग नहीं करा पाये हैं। अमिताभ बच्चन और रणवीर सिंह और सोनाक्षी को फ़िल्म में एक सीन करने के लिए दर्शक धन्यवाद के सिवा कुछ नहीं दे सकते।

टेक्नीकली फ़िल्म को समझने के लिए थोड़ी मुश्किल होती है। फ़िल्म कभी लगती है कि वयंग्य है कभी लगती है कि ब्लैक कॉमेडी है, कभी लगता है कि मैलोड्रामा है और अंत में कुछ समझ नहीं आता है। इसके अलावा एडीटिंग में कुछ अच्छा करके की कोशिश की गई है। फ़िल्म में कहीं ब्लैक एण्ड व्हाईट तो कहीं कलर सीन आते हैं। फ़िल्म राइटिंग की किताब के हिसाब से सीन एडिट किये गये हैं। जो काफी क्रिएटिव हैं।

कोई क्यों देखे

फ़िल्म में रघुवीर यादव और इला अरूण की एक्टिंग नवाजुद्दीन का नया अंदाज और अनुराग कश्यप की खराब एक्टिंग देखने का अच्छा मौका है। इन दिनों सब लोगों को घर पर ही रहने के आदेश दिये गये हैं तो मनोरंजन के लिए अगर देखना चाहें तो देखने में कोई बुराई नहीं है। इसके अलावा कुछ नये एक्सपेरिमेंट किये गये हैं जिन्हें देखा जा सकता है।

Naseem Shah: