लखनऊी अदब और सियासत
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गुलाबोसिताबो अवध की दो मशहूर कठपुतलियों के नाम हैं। अब भी लखनऊ में या उसके आसपास की सड़कों पर कोई गरीब रोज़ी रोटी के लिए गुलाबोसिताबो कठपुतलियों को आपस में लड़ाता मिल जाएगा। यह खेल नवाबों के ज़माने से हो रहा है। इन दोनों कठपुतलियों की कहानी कलाकार गाकर सुनाता है। कुछ साहित्यकारों के मुताबिक आज़ादी से पहले कुछ कलाकारों ने गुलाबोसिताबो कठपुतलियों के जरिये अंग्रेजी सरकार के ख़िलाफ़ लोगों को जागरूक करने का काम किया था।

अब इस दौर में सुजीत सरकार ने गुलाबो सिताबो फ़िल्म बनाई है। हालांकि उन्होंने फ़िल्म किसी को जागरूक करने के लिए नहीं बनाई है। फ़िल्म ग़लती से किसी को जागरूक करती भी नहीं है।

निर्देशक: सुजीत सरकार
लेखक: जूही चतुर्वेदी
कलाकार: अमिताभ बच्चन, आयुष्मान खुराना, विजय राज, बिजेंद्र काले, सृष्टि श्रीवास्तव, फर्रूख़ ज़फर
प्लेटफार्म: अमेजन प्राइम।

फ़िल्म की कहानी समझने के लिए कठपुतलियों की कहानी को समझना बहुत जरूरी है। यह कठपुतलियां एक मियां की दो बीवियां होती हैं। इसमें एक ब्याहता है और एक भागकर आई है। यानी एक मियां के निक़ाह में है और एक इश्क़ है। फ़िल्म के अहम क़िरदार 70 साल के मिर्ज़ा( अमिताभ बच्चन) हैं। जो 85 साल की बेगम (फर्रुख जाफ़र) के ब्याहता हैं यानी उनके निकाह में हैं। एक अब्दुल रहमान हैं जो बेगम की मोहब्बत हैं। ब्याहता मिर्ज़ा को बेगम से नहीं उनकी हवेली फातिमा महल से इश्क है। मिर्ज़ा 50 साल से बेगम के मरने का इंतजार कर रहे हैं। हवेली में रहने वाले किरायेदार बांके(आयुष्मान खुराना) और मिर्ज़ा दोनों में नहीं बनती है।

बांके एक तो किराया नहीं देते हैं। ऊपर से हवेली पर कब्ज़ा करने की भी सोच रहे हैं। बांके एक दिन दबाव में आकर हवेली के पेखाने की दीवार में लात मार देते हैं। पाखाने की दीवार गिर जाती है। इस बात को लेकर मिर्ज़ा और बांके में झगड़ा होता है। यह झगड़ा थाने पहुंच जाता है। वहां से पुरातत्त्व विभाग का अफसर ज्ञानेश (विजय राज) कहानी में घुस जाता है।

ज्ञानेश हवेली को संस्कृतिक धरोहर बताकर उसे सील करना चाहता है। ताकि मिर्ज़ा डरकर हवेली नेता जी को बेच दे। मिर्ज़ा वकील क्लार्क(बिजेन्दर काले) के पास जाता है। क्लार्क मिर्ज़ा को डराकर हवेली बिल्डर को बिकवाना चाहता है। यह सब लोग हवेली के पीछे पडें हैं और 80 साल की बेगम अपने बचपन के आशिक़ अब्दुल रहमान के साथ भाग जाती हैं। हवेली भी उसी के नाम कर देती है।

सिनेमा की नज़र से

यह एक तरह से कठपुतलियों की लोक कथा का अडॉप्टेसन है। भारतीय समाज में दूसरी औरत के लिए सौतन शब्द है लेकिन दूसरे मर्द के लिए कोई शब्द नहीं है। जूही चतुर्वेदी ने अच्छा ये किया है कि एक औरत के दो मर्द हैं जो आपस में लड़ रहे हैं।

जूही चतुर्वेदी ने पीकू की कहानी जिस तरह अंत तक पहुंचाई है। इस फ़िल्म को देखकर भी समझ आता है कि कहानी उन्होंने ही लिखी है। सुजीत सरकार का भी यही तरीका है। उनकी फिल्म के किरदार जिस चीज के लिए संघर्ष करते हैं अंत में वो उन्हें नहीं मिलती। वह अक्टूबर हो पीकू हो या फिर गुलाबो सिताबो हो।

एक बड़े निर्देशक और दूसरी बड़ी लेखक हैं। इसके बाद भी फ़िल्म की कहानी को नहीं समेट पाये। इतने सारे मेटाफर रखने की जगह कहानी को और आसान किया जा सकता था जो नहीं किया गया। कहानी भटकती रहती है। कहानी कभी मिर्जा की तरफ जाती है और कभी बांके की तरफ कभी बेगम की तरफ तो कभी गुड्डो की तरफ इसलिए अच्छी खासी खिचड़ी सी बन जाती है।

किरदारों को न अच्छे से लिखा गया और न समझा गया। सही पूछो तो मिर्ज़ा का किरदार बहुत कमजोर है। दर्शक के मन में अंत तक यही सवाल रहता है कि ये बल्ब चोर, लालची आदमी है कौन। इसने बेगम से शादी क्यों की, ये हवेली को आखिर इतना क्यों चाहता है। कुछ पता नही चलता। आयूषमान का किरदार क्या था। वह क्या चाहता था। समझ से परे है। वह फ़िल्म में क्या कर रहे हैं जिस से उन्हें हीरो माना जाए। बरेली की बर्फी में भी संवाद इसी अंदाज में बोले थे। गुलाबोः सिताबो में भी उसी अंदाज में बोल रहे हैं। जूही चतुर्वेदी अपने किरदारों के आस-पास की रोज मर्रा की बातों को स्क्रीनप्ले में लाने के लिए जानी जाती हैं। यह तरीका लेकिन इस फ़िल्म में काम नहीं आया।

आयुष्मान की बहन के किरदार में गुड्डो (सृष्टि श्रीवास्तव) क्या कर रही है। उनके किरदार के जरिये लेखक ने लड़के और लड़की के बीच गैर बराबरी के मुद्दे को टच करने की कोशिश की है। एक तरफ गुड्डो अपने नये बॉय फ्रेंड को अपने चार एक्स के बारे में बता रही है। गुड्डो अपने भाई को बारबार आज की महिला की ताकत का अंदाज़ा करा रही है और दूसरी तरफ एक अधिकारी को ब्लैकमेल करने के लिए सेक्स ऑफर कर रही है। वो किरदार बिल्कुल भी समझ में नही आता।

फ़िल्म में अचानक सोने की खुदाई का सीन आ जाता है। अचानक से पुरात्तव विभाग की लैब दिखाने लगते हैं। अचानक से बांके और उसकी प्रेमिका को दिखाने लगते हैं। अचानक गुड्डो को उसके बॉयफ्रेंड के साथ दिखाने लगते हैं। इतने सारे किरदार जो कहानी में अपना-अपना हिस्सा मांग रहे हैं। मिर्जा से भटक कर कई बार कहानी इन्हीं सब में खो जाती है।

अमिताभ बच्चन इतने अनुभवी कलाकार होने के बाद भी पटकथा में अपना किरदार नहीं समझ पाए। वह फ़िल्म में सिर्फ एक लालची आदमी हैं जो अपनी बेगम के मरने की दुआ कर रहे हैं। फ़िल्म में कहीं भी उनसे हमदर्दी नही होती है। जावेद अख्तर कहते हैं कि आज की फिल्मों के हीरो कुछ काम नही करते हैं। मेरा मानना है काम तो करते हैं मगर वो नहीं करते जो कहानी के हिसाब से फ़िल्म में करना चाहिए। बिल्कुल गुलाबो सिताबो की तरह।

किसी नोसिखिये कि तरह सब कुछ दिखाने के चक्कर में निर्देशक और लेखक भूल गए कहानी कहाँ जा रही है। और अगर उन्होंने जान बूझकर यही बनाई है तो फिर अलग बात है। वह क्या शिक्षा देना चाहते थे कि लालच बुरी बला है। यह तो तीसरी क्लास का पाठ है। एक बड़ा निर्देशक इतनी भारी गलती कैसे कर सकता है। पखाने की जिस दीवार से फ़िल्म आगे बढ़ती है वो फ़िल्म में सो साल पुरानी है लेकिन ईंटे आज ज़माने की हैं। उस ज़माने में लखोरी ईंट हुवा करती थीं जबकि दीवार की ईंटें नए फर्मे से बनी हैं । फ़िल्म का संगीत और सिनेमैटोग्राफी बहुत अच्छी हैं। बस उन्हें देखकर ही लगता है कि फ़िल्म किसी बड़े निर्देशक की है। बाकी सब नार्मल है।

कोई क्यों देखे?

अमिताभ बच्चन को इस फ़िल्म में मिर्जा का किरदार निभाने के लिए तीन घंटे मेंकअप करना पड़ता था। वह पूरी फ़िल्म में कमर को मोड़कर चले हैं जबकि उनकी लम्बाई बहुत है। उनकी मेहनत भरी दमदार एक्टिंग के लिए फ़िल्म देख सकते हैं।

सुजीत सरकार के निर्देशन में बनी और जूही चतुर्वेदी की कलम से लिखी जिसने सारी फ़िल्में देखीं हैं तो वह जरूर देखें। यह फ़िल्म उनके लिए बहुत अहम है।