कॉमेडी पर थ्रिलर का तड़का
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नेटफ्लिक्स पर नई हिन्दी सीरीज हसमुख के नाम से आयी है। इसके नाम पर मत जाना। इस सीरीज के लीड नायक वीर दास स्टेंडअप कॉमेडियन हैं। इस पहले उन्होंने डेली बैली, गो गोवा गॉन, जैसी फ़िल्मों में हसाने का काम किया है। इस सीरीज में जिन्होंने सोचा था कि वीर दास हसायेंगे। उनकी जानकारी के लिए बता दें। इस सीरीज में वो हसाते नहीं बल्कि रूलाते हैं। क्यों जानने के लिए 10 एपीसोड देखने होंगें।

निर्देशक: निखिल गोंसाल्विस

कलाकार: वीर दास, रणवीर शौरी , सुहैल नय्यर,नीरज पांडें, इनामुल हक़,रवि किशन, रजा मुराद, मनोज पाहवा

प्लेटफार्म: नेटफ्लिक्स

इंडिया में इस तरह का प्लाट कम ही देखने को मिला है। एक कॉमेडियन बिना निर्मम हत्या किये लोगों को हसा नहीं पाता है। एक अच्छा प्लाट होने के बाद भी स्क्रीनप्ले अच्छा नहीं लिखा गया। जबकि सीरीज में निखिल गोंसाल्विस,नीरज पांडे, वीरदास ने खुद भी राईटिंग क्रेडिट लिया है। इनके अलावा तीन और लेखकों ने इसमें कलम घिसाई की है उसके बाद भी उनमें से कोई पता नहीं कर पाया कि सहारनपुर के गांव देहात में कैसी भाषा बोली जाती है। सहारनपुर जिसने देखा है वो वीर दास के मुंह से भोजपुरी जैसे अंदाज में वो का है नासुनते ही समझ जाता हैं। लिखने वालों का सहारनपुर से खास लगाव नहीं है।

एक कहावत है पैसा फैंको तमाशा देखोयह कहानी आधा दर्जन लेखकों ने मिलकर सिर्फ और सिर्फ वीर दास के लिए लिखी है। एक लड़का हसमुख(वीर दास) छोटे से शहर कस्बे सहारनपुर में रहता है हालांकि आपको सहारनपुर स्क्रीन पर देखने को नहीं मिलेगा।

हसमुख के साथ बचपन से लोग उसके साथ बुरा करते हैं। स्कूल में बच्चे उसके साथ गलत करते हैं तो वो उन पर जॉक लिखलिख कर अपना बदला लेता है। उसकी चाची उसको सेडयूस करती रहती है। उसका चाचा उसे बुरी तरह से बेल्ट से मारता है। उसका उस्ताद कॉमेडियन पप्पु गुलाटी(मनोज पाहवा) भी उस से चमचागीरी कराता है। उसे गालियां देता है।

एक दिन हसमुख के उस्ताद गुलाटी का शॉ होने वाला है। गुलाटी जब तक गर्म पकोडे नहीं खा लेता उसे स्टेज पर फील नहीं आता है। ठंडे पकोडे देखकर गुलाटी को गुस्सा आता है। हसमुख और गुलाटी में कहा सुनी होती है। हसमुख चाकु लेकर गुलाटी की गर्दन उड़ाकर उसकी जगह स्टेज पर पहुंच जाता है। यहां हसमुख की कॉमेडी यात्रा शुरू हो जाती है।

हसमुख के उस्ताद गुलाटी से जिस तरह गर्म पकोड़े खाये बिना कॉमेडी नहीं होती थी। हसमुख से लोगों को अपनी बेल्ट से तड़पातड़पा कर मारे बिना कॉमेडी नहीं होती है। सहारन पुर में हत्या से शुरू हुआ उसकी कॉमेडी का सफर मुम्बई के सबसे बड़े स्टेंडअप कॉमेडी शॉ बादशाहो पर जाकर ख़त्म होता है।

इस सफर में हसमुख के साथ उसका मेनेजर जिम्मी दा मेकर(रणवीर शौरी) साये की तरह रहता है। जिम्मी हसमुख के लिए काम नहीं मारने के लिए लोग लेकर आता है। वह बॉडी को ठिकाने लगाता है। हर एपीसोड में एक मर्डर का सीन और एक स्टेंडअप कॉमेडी का सीन है।

बादशाहो शो जैसेजैसे बढ़ता जाता है। बादशाहो शो की क्रिएटिव टीम के लोग उसी तरह से मरते जाते हैं। शहर में हत्या पर हत्या  हो रही हैं। एक तरफ पुलिस हत्यारे को खोज रही है दूसरी तरफ जनता बेस्ट कॉमेडियन को खोज रही है। पुलिस को हत्यारा और जनता को बेस्ट कॉमेडियन एक साथ ही मिलने वाले होते हैं कि सीजन वन ख़त्म हो जाता है। बाकी अगले सीजन में।

सिनेमा की नज़र से

एक स्टेंडअप कॉमेडी सीन और एक मर्डर सीन दस एपीसोड की बस यही कहानी है। हर एपीसोड में हसमुख बिना किसी ख़ास वज़ह के एक हत्या कर रहा है। स्क्रीन पर सारे के सारे पत्ते खुले हुए हैं। एक एपीसोड के बाद ही पता लग जाता है कि अगले एपीसोड में कौन मरेगा। सब कुछ इतना आसान ही रखना था तो दर्जन भर लेखक की टीम को इस्तेमाल क्यों किया। उन लेखकों का योगदान क्या है?

निर्देशक ने हसमुख को अच्छा दिखाने के लिए मरने वालों को खराब दिखाया है। एक लेखक हसमुख की पटकथा किसी और को दे देता है। वह उसे मार देता है। उसका चाचा उसे बेल्ट से मारता है वो उसे मार देता है। उसका उस्ताद उसे गाली देता है वो उसे मार देता है। किसी गुंडे को मार देता है। आधा दर्जन लेखक मिलकर हसमुख की हत्याओं को जस्टीफाई नहीं कर पायें हैं। वह बहुत ही मामूली सी बातों पर लोगों को मार रहा है। निर्देशक अगर अपने हीरो के बुरे काम करने की ठोस वज़ह नहीं दिखा पाता है तो दर्शकों के लिए होरी भी विलेन हो जाता है।

निर्देशक के पास एक अच्छा प्लाट था। अच्छे किरदार थे। उसके पास अच्छे एक्टर थे। वह जिनका अच्छे से इस्तेमाल नहीं कर पाया। सहारनपुर के दरोगा के रूप में (इनामुल हक़) इकलोते किरदार हैं जो स्क्रीन पर सहारनपुर की भाषा बोल रहे हैं। वह कड़क दरोगा हैं लेकिन वो हसमुख के उस्ताद गुलाटी, उसके चाचा, एक नेता की हत्या की तरफ ध्यान ना देकर ऊट पटांग बातें करके कॉमेडी कर रहे हैं। मुम्बई में दो पुलिस वाले हैं। उनके इलाके में हत्या पर हत्या हो रही हैं। इतना आसान केस पुलिस बस डॉयलॉगबाजी करने में लगी है। वह सिर्फ फॉरमेल्टी पूरी कर रहे हैं। उनकी तहकीकात में दर्शक जरा भी मजा नहीं ले रहे हैं। 

इसके अलावा अलंकार चैनल के अंदर भी पॉलीटिक्स चल रही है। वहां क्रिएटिव टीम के दो ग्रुप हैं। एक पहले से बड़े कॉमेडियन के.के(सुहेल नय्यर) को जिताना चाहता है और दूसरा ग्रुप हसमुख को जिताना चाहता है। दोनों ही ग्रुप ऐसा कुछ नहीं कर रहे हैं जिस से दर्शकों को मजा आये। ऐसा लगता है कि सारे के सारे किरदार हसमुख की मदद करने के लिए लिखे गये हैं। हसमुख फिर भी रो रहा है कि उसके साथ जिंदगी में सबने बुरा किया।

अलंकार टी.वी के मालिक( रवि किशन) का अटपटा सा किरदार बस ब्लैकमेल होने के लिए ही लिखा गया है। जमील इंदोरी के किरदार में (रजा मुराद) की एंट्री खतरनाक है। दर्शकों को लगता है कि वो जरूर कुछ करेंगे। लेकिन वह अचानक ही बिना बताये स्क्रीन से गायब हो जाते हैं। हसमुख के अपोजिट में कॉमेडी कर रहा के.के जिस एनर्जी और जॉक्स के साथ कॉमेडी कर रहा है। हसमुख से ज़्यादा उसके जॉक्स पर हसी आती है। हसमुख के जॉक्स ऐसे नहीं लिखे गये कि लगे उनमे कुछ खास बात है जबकि स्क्रीन पर उन्हें सबसे बेस्ट दिखाया गया है।

एक ही किरदार जिम्मी दे मेकर (रणवीर शौरी) मजबूत दिखाई देते हैं। वह स्क्रीन पर मजे ले रहे हैं। वह अपने किरदार को खुलकर जी रहे हैं। इसी वज़ह से वीर दास से ज़्यादा दर्शक उनमें इंटरेस्ट लेने लगते हैं। वीरदास के चेहरे पर एक ही लुक एक ही रिएक्शन दस एपीसोड में देखकर मन ऊब जाता है।

निर्देशक आखिर कहना क्या चाहता था? दस एपीसोड के बाद भी साफ नज़र नहीं आता है। कुछ जगह पर हसी जरूर आती है। जॉक्स सुनकर अच्छा भी लगता है। कुछ जॉक्स बहुत मजेदार भी हैं। कुछ जॉक्स नये भी हैं लेकिन अगर जॉक्स ही सुनने हैं तो वीर दास के शॉ ही काफी थे। दस एपीसोड की सीरीज क्यों?