काम चलाऊ
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समाज में मानष्कि दबाव इतना बढ़ चुका है कि आदमी, आदमी से ही बच रहा है। आदमी खुद को लोगों की भीड़ से बचाने के लिए अपने ही घर में हाऊस अरेस्ट होकर रह जाता है। नेटफ्लिक्स पर हाऊस अरेस्ट ऐसे ही एक आदमी की ज़िंदगी पर आधारित है। जिसने 9 महीने से अपने घर से बाहर कदम नहीं रखा। यह घर से क्यों नहीं निकलता है, यह अपने घर में क्या करता है, कैसे रहता है? जानने के लिए एक नज़र देखें।

निर्देशक: समित बासु, शशांका घोष

लेखक: समित बासु

कलाकार: अली फज़ल,श्रिया पिलगांवकर जिम सरब, बरखा सिंह

कहानी इतनी कॉमन सी है कि ज़्यादातर लोगों ने अपने आस-पास के दोस्तों में या लोगों में कितनी बार सुनी देखी होगी। आपके साथ नहीं तो ऐसा आपके किसी दोस्त के साथ तो जरूर हुआ होगा। आपके दोस्तों में एक दोस्त तो जरूर इतना घटिया होगा कि आपकी प्रेमिका या आपकी पत्नी के साथ भी जा सकता है। यह सोचे बिना की दोस्त पर क्या बीतेगी।

यह बात जब बाकी लोगों को पता चलेगी कि आपका करीबी दोस्त और प्रेमिका ने आपको बना दिया तो आप उनसे नज़रे नहीं मिला पायेंगे। इसी ड़र से आप घर से निकलना बंद कर देंगे। आपको लोगों से मिलने में डर लगेगा और आप हाऊस अरेस्ट होकर रह जायेंगे।

हाऊस अरेस्ट में करण (अली फज़ल) के साथ कुछ ऐसा ही होता है। उसकी पत्नी उसे छोड़कर उसके बॉस के साथ चली जाती है। वह अपने आपको घर के अंदर कैद कर लेता है और नौ महीने तक घर से बाहर नहीं निकलता है। करण का दोस्त जे.ड़ी (जिम सरब) अपनी एक्स गर्लफ्रेंड शायरा (श्रिया पिलगांवकर) को साक्षातकार के बहाने उसके पास भेजता है।

शायरा के साथ भी वही हुआ है जो करण के साथ हुआ है। शायरा जे.ड़ी की एक्स है और जे.ड़ी उसे छोड़कर उसकी दोस्त के साथ चला जाता है। इंसानी रिश्तों से उम्मीद खो चुके शायरा और करण एक दूसरे को पसंद तो करने लगते हैं लेकिन विशवास नहीं करते हैं।

एक ड़ॉन लेड़ी पिंकी (बरखा सिंह) एक आदमी को किडनेप करके करण के घर में छिपा जाती है। शायरा और करण  को जब एक दूसरे पर विशवास होता है तो वह छिपा हुआ आदमी किसी तरह से बाहर निकल आता है। शायरा करण को छोड़कर चली जाती है। लेकिन सही समय पर आकर पिंकी शायरा को सब कुछ सच बता देती है।

करण फिर भी शायरा को अपने घर से भगा देता है लेकिन उसे जब प्यार का एहसास होता है तो अंत में शायरा को मनाने के लिए ही वो घर से बाहर निकलता है।

सिनेमा की नज़र से

एक आदमी अपने घर से बाहर नहीं निकलना चाहता है। वह खुद को घर में कैद करके बैठा है। यह प्लाट सुनने में तो अच्छा लगता है लेकिन आगे क्या? बात यहीं आकर बिगड़ जाती है। फ़िल्म का ट्रीटमेंट बहुत ही हल्का रहा क्योंकि पटकथा बहुत ही कमजोर तरीके से लिखी गई है।

किसी भी फ़िल्म को एक ही लोकेशन पर एक ही घर के अंदर दो घंटे की बनाना बहुत चेलेंजिंग होता है। निर्देशक जिसमें कामयाब नहीं हो पाये। किरदार अच्छे थे पर उनके पास करने के लिए बहुत कुछ नहीं था।

एडीटर ने फोन कॉल को विजुअली दिखाकर कुछ नया करने की कोशिश की है लेकिन बहुत ज़्यादा असर नहीं छोड़ पाया हैं। निर्देशक की बस तारीफ करनी होगी की उसने इस सब्जेक्ट को ऐसे समय में उठाया है जब रिसर्च बता रही है कि पिछले कुछ सालों में एंजायटी और डिप्रेशन के यंग मरीजों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ी है और बढ़ रही है।

अली फज़ल ने करण के किरदार में अच्छी एक्टिंग की है और पिंकी के रूप में बरखा सिंह की भी अच्छी एक्टिंग रही है। सिनेमाटोग्राफी और म्यूजिक ओसत दर्जे का ही है।

क्यों देखनी चाहिए

यह नया सब्जेक्ट है। इस समय हर किसी का कोई ना कोई करीबी दोस्त एनजायटी की दिक्कतों से जूझ रहा होगा। वह अपने दोस्तों के बारे में क्या सोचता है, उसे क्यों किसी पर विशवास नहीं हो पाता है और हम उसकी कैसे मदद कर सकते हैं। फ़िल्म के जरिये समझ सकते हैं हालांकि फ़िल्म कोई उपचार का तरीका नहीं है पर मनोरंजन के लिए तो देख ही सकते हैं।

आप अगर कॉमेड़ी पसंद करते है तो हल्की फुल्की फ्रेश कॉमेडी भी आपको देखने को मिल सकती है। हालांकि आपने अगर हिचकॉक की रियर विन्डो देखी है तो आपको बहुत सारे सीन देखे हुए से भी लग सकते हैं।