इमोशन, क्राइम और विज्ञान
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टाइम मशीन आज का विषय नहीं है। टाइम और स्पेस के बारे में कई हज़ार साल पहले से लोग दिमाग़ के घोड़े दौड़ा रहे हैं। सम्राट अशोक ने जब 263 ईशा पूर्व सारे भारत पर विजय प्राप्त की तब रणभूमि वो लाशों के ढ़ेर देखकर परेशान हो गए। उन्होंने उसी समय हथियार ड़ाल दिए और बौद्ध धर्म के अनुयायी बन गये।

निर्देशक: शेलेंद्र व्यास
कलाकार: अभय देओल, पीयूष मिश्रा, पंकज कपूर, रितिका आनंद, राजेश शर्मा।
प्लेटफार्म: सोनी लिव

अशोक सम्राट ने उस समय हर क्षेत्र के बुद्धिजीवियों की एक सोसायटी बनाई। उनसे हर विषय पर किताब लिखने के लिए कहा गया। उस समय 9 ऐसी किताबें लिखी गई थीं जिनमें जीवन सारे के सारे रहस्य थे। उन सभी किताबों को किसी गुप्त स्थान पर छिपा दिया गया ताकि उनका कोई दुरुपयोग ना करे। उन किताबों की हमेशा से खोज़ होती रही है। उन्हीं किताबों के कुछ पन्नों से मार्शल आर्ट का जन्म हुआ।

उन किताबों में एक किताब ऐसी थी जिसमें स्पेस और टाइम ट्रेवल के बारे में बहुत सी अहम जानकारियां थीं। अंग्रेजी शासन के दौरान एक खुदाई में अंग्रेजों को उस किताब के कुछ पन्ने हाथ लगे। उन पन्नों पर कुछ आधी अधूरी कोडिंग थीं। अंग्रेजों ने उस कोडिंग की खोज में विज्ञानियों की संस्था बनाई। आजादी के बाद उस संस्था की फंडिंग बंद कर दी गई। एक वैज्ञानिक ने लेकिन निजी स्तर पर वो खोज जारी रखी।

उस वैज्ञानिक के मरने के बाद उसके बेटे ने वो खोज जारी रखी। जो काम बाप नहीं कर पाया वह उसके बेटे ने एक दिन कर दिया। उसने कम समय में टाइम ट्रेवल करने की कोडिंग ख़ोज ली। लेकिन उसके पास प्रैक्टिकल के लिए पैसे नहीं थे। वह जिस विमान में यात्रा कर रहा था उसी को अगवा करके अपनी कोडिंग के जरिए फ्यूचर में ले गया।

वैज्ञानिक( पीयूष मिश्रा) की कैलकुलेशन के हिसाब से विमान को 35 घंटे में वापस लोटना था। लेकिन उसकी मिस कैल्क्युलेशन के कारण विमान 35 साल बाद वापस लौटा और क्रैश हो गया। उस दुर्घटनाग्रस्त की जांच सी.बी.आई ऑफिसर शांतनु (अभय देओळ) को दी। शांतनु को तहकीकात करने के लिए खुद टाइम ट्रेवल करके 35 साल पहले पास्ट में यानी भूतकाल में जाना पड़ता है। वहां उसे एक ऐसा सच पता चलता है जिसे वह जानने के लिए बेताब था। इसी को 4 एपिसोड की सीरीज जे.एल 50 की कहानी का सार कहा जा सकता है।

सिनेमा की नज़र से

जे.एल 50 सीरीज लेखक और निर्देशक शैलेंद्र व्यास को अशोका की किताब वाली थ्योरी के बारे में कितना कुछ मालूम है, यह तो वही जानते हैं। लेकिन सीरीज में इस थ्योरी को प्रूफ़ करने के लिए जिस तरह उन्होंने स्क्रीन पर पूरे बीस मिनट का समय लिया है। पंकज कपूर जैसे गम्भीर और लेजेंड एक्टर से उसको आसान भाषा में दर्शकों को समझवाया है। यह तो उनकी लिखाई और निर्देशन का ही कमाल है।

टाइम ट्रेवल मुमकिन है। शैलेंद्र व्यास इस थ्योरी को प्रूफ करने के लिए पहले दर्शकों को इतिहास में ले जाते हैं। आधुनिक युग में चल रही तहकीक़ात के सीधे तार 263 ई. पूर्व सम्राट अशोक से जोड़ देते हैं। इसी कहानी में सम्राट अशोक की कहानी भी शामिल हो जाती है। दर्शक जिसके सहारे एक अलग दुनिया को देखता है बल्कि समझता है। उसके बाद कहानी को अंग्रजी शासन से जोड़ देते हैं। अंग्रेजी शासन के बाद आजाद भारत से होती हुई कहानी वर्तमान में आती है। इतना सब लॉजिक देखने और सुनने के बाद दर्शक को इस बात से मतलब नहीं रहता कि लॉजिक कितने सही या ग़लत है। वह जो विजुअली देखता, सुनता और समझता है। उसे उसमें मज़ा आता है।

टाइम ट्रेवल को लेकर इंडिया में बहुत सी फ़िल्में बनी हैं। उनके असफल होने का कारण वही लॉजिक है जिसे सही समझा पाने में निर्देशक कामयाब नहीं हो पाते हैं। शैलेंद्र व्यास ने जे.एल 50 में पूरा एक एपिसोड पहले लॉजिक समझाने के लिए लिया। हालांकि एक विमान के जरिये टाइम ट्रेवल के जरिये पास्ट में जाने का उनका तरीका बहुत ही साधारण है। जिसे अंत देखने के लिए दर्शक के पास बस मान लेने के सिवा कोई चारा नहीं है।

एक्टर अगर कहानी को अच्छे से समझ जाता है तो वह अपने किरदार को जीने लगता है। एक वैज्ञानिक अगर अपना सारा जीवन किसी खोज में लगा दे और वह कामयाब हो जाये तो यक़ीनन वो नार्मल नहीं रह सकता। पीयूष मिश्रा के उस अधपगले वैज्ञानिक के किरादर में एक जुनून नज़र आता है। महत्वाकांक्षाएं साफ़ दिखती है जिन्हें पूरा करने के लिए वह दर्द के एहसास से पार जा चुका है।

अभय देओल का एक संजीदा शांतनु का किरदार जो बस अपना रूटीन पूरा कर रहा है। उसकी पत्नी उस से तलाक ले रही है। उसके जीवन में उत्साह नहीं हैं। ऐसे ऑफिसर को अगर कोई टाइम ट्रेवल की थ्योरी को प्रूफ़ देने के लिए सफर मे साथ ले जाये तो ज़ाहिर सी बात है वो मना कर देगा। लेकिन शांतनु को पास्ट में जाकर जब पता चलता है कि जो पायलट उन्हें पास्ट में लेकर आई है वही उसकी मां है। तब इस सवाल का जवाब कि शांतनु पास्ट में जाने के लिए क्यों तैयार हुआ? मेरे ख्याल से मिल जाता है।

निर्देशक ने सीरीज को बेवजह खींचने से परहेज़ किया है। इस सीरीज़ के सिर्फ़ चार एपिसोड हैं। पहले एपिसोड में निर्देशक ने जे.एल 50 क्या है? तहकीकात के जरिए उस से जुड़े हर किरदार से पहचान करायी है। दूसरे एपिसोड में  छानबीन के जरिए किरदारों की बैक स्टोरी को दिखाया है। तीसरे एपिसोड में जे.एल 50 को अगवा करने का मकसद और टाईम ट्रेवल थ्योरी को समझाया है। चौथे एपिसोड में बिना सब्जेक्ट से इधर उधर भटके अगले सीजन की संभावना देकर सीरीज को ख़त्म कर दिया है। जहां तक याद आता है। यह चार एपिसोड की पहली सीरीज है।

सीरीज की कहानी बंगाल में चल रही है। सिनेमाटोग्राफर ब्रेडली आपको कहानी ही नहीं दिखा रहे हैं। वह कहानी के साथ ही साथ आपको बंगाल भी दिखाते चल रहे हैं। पहला ही सीन है। एक ग्राउंड में कुछ बच्चे फुटबॉल खेल रहे हैं। एक जहाज की परछाई उनके सरों से होकर गुज़रती है। एक सीन में पंकज कपूर बंगाल के पहाड़ी इलाके़ में चले जा रहे हैं। कैमरा उनके साथ-साथ वहां के पूरे कल्चर को, वहां के लोगों के रहन-सहन को अपने आप में समेटता जा रहा है। कई जगह तो सीन एक पैंटिंग की तरह दिखने लगता है। उसे पंकज दा की एक्टिंग और सुंदर बना देती है।

सीरीज में एक बंगाली गाना भी है। वो बंगाली गाना सीन के साथ ही आपको फील कराता है कि आप बंगाल में हैं। पहला एपिसोड जब ख़त्म होता है तब आप चाहकर भी क्रेडिट को स्किप नहीं कर पाते हैं क्योंकि बैकग्राउंड में पीयूष मिश्रा की खट्टी-मीठी सी आवाज़ में एक गाना चल रहा होता है। उसी गाने की लय पर आप सारे क्रेडिट भी अंत तक बिना बोझिल हुए पढ़ जाते हैं।

जो बात हजम नहीं होती।

क्या एक पैसेंजर विमान के जरिये टाइम ट्रेवल किया जा सकता है?

एक सीन में दिखाया है कि एक जुनूनी वैज्ञानिक एक पैसेंजर विमान को अपने टाईम ट्रेवल एक्सपेरिमेंट के लिए आसमान में गायब करके उसे फयूचर में ले जाता है। उसकी कोडिंग के मुताबिक़ उसे 35 घंटों में वापस वर्तमान में आना था। गलत कोडिंग की वजह से वो 35 साल बाद वापस लौटता है। जबकि उसी कोडिंग के हिसाब से दौबारा पायलट 30 मिनट में 35 साल का सफर तय कर देता है। जब वापस आने में 35 साल लगे तो जाने में 30 मिनट कैसे लगे।

सीरीज में एक विमान का अपहरण रोकने के लिए टाईम ट्रेवल करके 35 साल पहले जाते है। वह अगर थोड़ा और पहले चले जाते तो वास्कोडिगामा के जहाज़ में छेद करके उसे इंडिया आने से रोक सकते थे।

कोई क्यों देखे?

बॉलीवुड में अच्छी वैज्ञानिक सीरीज़ देखने की इच्छा रखने वाले देख सकते है। अगर आप गैंगस्टर सीरीज़ बहुत देख चुके हैं और कुछ नया देखना चाहते हैं तो देख सकते हैं। अगर कुछ ऐसा देखना चाहते हैं जो बहुत ज़्यादा समय ना ले तो भी देख सकते हैं। लेकिन अगर आपको साइ-फाइ या साइंस में कोई दिलचस्पी नहीं है या बहुत ही ज्यादा है दिलचस्पी है तो यह सीरीज आपको निराश कर सकती है। क्योंकि जो सीरीज की ताक़त है वही कमज़ोरी भी है।