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काफ़िर Zee 5 पर रिलीज हो चुकी है। निर्देशक सोनम नायर ने कहानी का संतुलन बनाये रखने की कोशिश की है। फिर भी सीरीज और बेहतर हो सकती थी।

अच्छी कहानी की बेकार पटकथा

कहानी का प्लाट अच्छा है। एक लड़का वेदांत (मोहित रेना) जिसका खुद का भाई मिलिटेंट के हाथों मारा जा चुका है। वह एक ऐसी लड़की केनाज़ (दिया मिर्जा) की लडाई लड रहा है जो सरहद पार करने के ज़ुर्म में भारतीय जेल सजा काट रही हैं।

केनाज़ के साथ जेल में बलात्कार होता है। जिसके बाद उसे एक बच्ची होती है। वेदांत केनाज़ और बच्ची को उसके मुल्क़ पाकिस्तान पहुंचाने के लिए नौकरी, परिवार, दोस्त सब छोड़ देता है। वेदांत केनाज को भारतीय जेल से तो रिहा करा देता है मगर पाकिस्तानी सरकार जेल में पैदा हुई उसकी बेटी सहर को अपनाने से इंकार देती है। वेदांत केनाज को घर पहुंचाने के लिए फिर से संघर्ष करता है।

कहानी सुनने में अच्छी है मगर बिना सब प्लाट के आठ ऐपीसोड खींचना समझदारी नहीं थी। निर्देशक स्क्रीन पर केनाज़ का दर्द फील कराने में नाकाम रहे। क्योंकि केनाज की कहानी होने के बाद भी वेदांत सब कुछ करता है।  इस लिहाज़ से कहानी वेदांत की है।

कहानी कश्मीर पर आधारित है, यह सिनेमेटोग्राफी से पता चलता है। किसी भी किरदार की भाषा से बिल्कुल भी पता नहीं चलता है। मुस्लिम किरदारों को वही पचास साल पुराना टिपिकल रूप, तीन बीवियां, गले में बड़ा सा ताबीज़, हाथ उठाकर आदाब करना।

हज़म नहीं हुए लॉजिक

फ़िल्म की लेखक और निर्देशक जब दोनों अनुभवी हों। यह बातें तब और ज़्यादा हज़म नहीं होतीं।

आर्मी वाले गलती से सरहद पार करने वाली एक लड़की को छोडने का फैंसला करते है, मगर एक सिविल आदमी के जज़्बाती हो जाने पर उसे जेल भेज देते हैं।

केनाज़ का बलातकार करने वाला सिपाही दस साल की उम्र में अपने बाप को मार चुका है। वह दिमाग से पागल है, फिर पुलिस में क्या कर रहा है? अदालत में कौन रंडी, रंडी चिल्लाता है?

शूर्या अंकल के हादसे में मरने का कॉल और वेदांत के पिता के ऑपरेशन का कॉल एक साथ आता है। पिता ऑपरेशन थिएटर से बाहर भी नहीं निकले और सूर्या आंटी फयूनरल करके घर की आग बुझा रही हैं। शूर्या अंकल के जिंदा रहते आंटी केनाज़ से नफरत करती हैं, उनके मरते ही केनाज़ पर उनका प्यार उमड आता है। अचानक से किरदारों का हृदय परिवर्तन नहीं होता साहब कुछ लॉजिक देना होता है।

जिस जेल में केनाज़ रहती है, उस से बुरी हालत में लोग दिल्ली के स्लम में रहते हैं। आर्मी, पुलिस,अदालत, पडोसी सब लोग अच्छे ही अच्छे हैं उन्हें देखकर ही लगता है एक्टिंग कर रहे हैं।

 तारीफ के क़ाबिल हैं

काफ़िर का संगीत फ़िल्म की थीम के मुताबिक और बैकग्राऊंड में चल रहे  विजुअल पर फिट बैठता है। सिनेमेटोग्राफी के लिए कैमरामेन ने बेहतर काम किया है। मोहित और दिया को छोड़कर बाकी सब किरदार एक्टिंग करते साफ नज़र आते हैं।

इस प्लाट पर जबिक बजरंगी भाई जान, वीर ज़ारा, जैसी कामयाब फ़िल्में बन चुकी हैं, उसके बाद भी कुछ नया करने की अच्छी कोशिश की गई है।