ऐसे सब्जेक्ट चुनना ही चुनोती है
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बहुत सालों पहले तहलका में एक रिपोर्ट पढ़ी थी। जिसमें कुछ दवाओं की कुछ विदेशी कम्पनियों के बारे में बताया गया था। खास कर उन देशों के बारे में जिन देशों में कानून बहुत ही शख़्त हैं। वह लोग तीसरी दुनिया के देशों में अपनी दवाओं का परीक्षण करते हैं।

उन दवाओं के क्या साईडिफेक्ट होते हैं। किसी को पता नहीं लगता है। वह मरीज जिन पर दवाओं का परीक्षण किया जता है। उन बेचारों को खुद नहीं पता होता है कि डॉ कैसे उनकी जान से खेल रहे हैं। जी5 की सीरीज कर्क रोग  ऐसी ही एक कहानी पर आधारित है।

निर्देशक: दीपांजन एस, चंदा और शमिक के

कहानी: इंद्रनील सान्याल (उपन्यास)

कलाकार: चित्रांगदा चक्रवर्ती, इंद्रनील सेनगुप्ता, राजेश शर्मा, और जयंत कृपलिनी

प्लेटफार्म: Zee5

जिसमें एक कैंसर से पीडि़त पोस्टमार्टम डॉक्टर ब्यास बनर्जी (चित्रांगदा चक्रवर्ती) को पोस्टमार्टम करते हुए लोगों की बॉडी में एक वायरस मिलता है। यह वायरस जिन लोगों की बॉडी में मिल रहा है, उन सबकी मौत एक्सीडेंटल हो रही है। ब्यास बनर्जी को शक होता है। वह इसकी तहकीकात करने लगती है। इस सारे मामले में उसे किसी चाईनीज गिरोह का सुराग मिलता है।

ऐसे किसी गिरोह के बारे में रविकांत अग्रवाल (राजेश शर्मा) पता लगा रहे हैं। राजेश और ब्यास एक साथ मिलते हैं और पता लगाने की कोशिश करते हैं। ब्यास बनर्जी एक लोकल पुलिस अफसर बरून सरकार( इंद्रनील सेनगुप्ता) से मिलती हैं। बरून इस सारे केस के सबूत मिटाने की कोशिश कर रहा है।

ब्यास बनर्जी एक कैंसर पेसेंट हैं। वह फिर भी सुबूत जुटाते-जुटाते अपने ही आस-पास के डॉकटरों के एक ऐसे गिरोह का पर्दाफास करती हैं, जो किसी अस्पताल में कैंसर के मरीजों पर मेडिशन ट्रायल कर रहे हैं। जिन मरीजों में इफेक्ट होता है। यह लोग उन्हें मार देते हैं। इस बात को जिसको पता लगता है, यह लोग उसे भी मार देते हैं।

इस तरह के सबजेक्ट चुनना ही चुनोती है।

यह सब्जेकट किसी रिपोर्ट की तरह है। किसी भी निर्देशक के लिए इस तरह के सब्जेक्ट चुनना ही अपने आप में एक चुनोती है। इस तरह के सीरियस कंनटेट में किस तरह मनोरंज पैदा करें, यही सब से बड़ी चुनोती है। लेखक ने इसीलिए इसे शायद सीरियल किलिंग से कनेक्ट किया है।

इस सब्जेक्ट को लेकर बहुत पहले से मीडिया में आर्टीकल आते रहे हैं। इसके बाद भी इंडिया में इस तरह के सब्जेक्ट बहुत कम उठाये जाते हैं। इस से पहले एक फ़िल्म लूसिया जो एक (दवा) मेडिसन को लेकर बनायी गई थी। उस फ़िल्म को भी क्रिटीक ने काफी पसंद किया था। इस तरह के सब्जेक्ट दर्शक कितना पसंद करते हैं। उस बात को नज़र अंदाज करके फिर भी लगातार बनाने की जरूरत है।

यह कहानी हम बंगाल की जमीन पर देखते हैं। कहानी के साथ-साथ हम बंगाल का कल्चर भी देखते चलते हैं। जो सीन को और भी ज़्यादा रियल बनाने में सहायक होता है। उसी पर जब हिन्दी में बंगाली भाषा मिलाकर बोली जाती है तो सुनने में और ज़्यादा सुंदर लगती है।

डॉक्टरों को समाज में भगवान माना जाता है, उसके पीछे उनका स्वार्थ कितना होता है। वह किस तरह से एक आम आदमी की ज़िंदगी से ख़िलवाड कर देते हैं। वह कैसे नई-नई दवाओं को उन पर ट्रायल कर होते हैं। इसमें किस तरह के बड़े लोग शामिल होते हैं काफी अच्छे से समझ में आता है।

सिनेमाई नज़र से

कर्क रोग सीरीज देखते हुए हालांकि बहुत बार कहानी इधर से उधर हो जाती है। आप थोड़ा समझ नहीं पाते हैं। खासकर जब एडीटिंग में कोई सीन कहीं भी नज़र आता है। इस तरह की कहानी को अगर सीधे-सीधे भी दिखा दिया होता तो मेरे ख़्याल से ज़्यादा बेहतर होता है।

निर्देशक की मेहनत साफ दिखाई देती है लेकिन कहीं-कहीं उनकी चूक भी साफ दिखाई देती है। जैसे कहानी को और भी ज़्यादा किलियर किया जा सकता था। जो बीच बीच में उलझ जाती है। हां उनकी इस बात में तारीफ करनी होगी कि एक्टरों से उन्होंने एक्टिंग बहुत सही करा ली है।

ब्यास बनर्जी के रूप में (चित्रांगदा चक्रवर्ती) ने जो किरदार निभाया है। उसे देखने के बाद कहीं नहीं लगता कि यह लड़की सच में कैंसर से पीडित नहीं है। अमूमन किरदार गलती करते हैं कि वह बॉडी से बिमार दिखने की कोशिश करते हैं लेकिन एक सीन में चित्रांगदा जब अपने फियोन्से के साथ बैड पर हैं और उन्हें अपनी बॉडी देखकर जो दर्द फील होता है। उस उनके साथ देखने वाले को भी यक़ीन हो जाता है कि उसे वकाई में कैंसर है।

इसके अलावा रविकांत अग्रवाल के रूप में राजेश शर्मा ने ना बहुत अच्छी और ना बहुत बुरी एक्टिंग की है। वह एवरेज रहे हैं। इंद्रनील सेन गुप्ता भी ऐवरेज ही रहे हैं।

अगर कुछ नया देखने के मन है, जो थोड़ा डार्क भी हो तो देख सकते हैं। देखकर निराशा नहीं होगा।