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किसी ज्ञानी आदमी की वाणी है “दोस्त किताबों की तरह होते हैं और किताबें अच्छी और बुरी दोनों ही तरह की होती हैं”। हर किसी की ज़िंदगी में कुछ ऐसे दोस्त होते ही हैं जो सिर्फ़ अपनी ज़रूरतों के लिए इस्तेमाल करते हैं। कुछ ऐसे होते हैं जिन्हें कोई फर्क़ ही नहीं पड़ता। लेकिन उन्हीं दोस्तों में से एक ऐसा भी दोस्त जरूर होता है जिसके ना होने पर उसकी बातें सबक की तरह याद आती हैं। अफसोस! हम ऐसे ही दोस्तों की कद्र नहीं कर पाते और ठोकर खाते हैं। लेकिन ठोकर खाना हमेशा बुरा भी नहीं होता है। ज़िंदगी में कुछ बातें ऐसी होतीं है जिन्हें ठोकर खाकर ही आदमी समझता है। वह कौन सी बातें हैं Zee5 पर लव स्लीप रिपीट देखने के बाद पता चलता है।

निर्देशक: अभीषेक डोगरा
लेखक: अनमोल राणा
कलाकार: अंशुमन मल्होत्रा, प्रियल गौर, मनोज जोशी, रायमा सेन, हर्षद्दा विजय, प्रिया बनर्जी
प्लेटफार्म: Zee5

कहानी अनमोल राणा के उपन्यास दोज सेवेन डैज  पर आधारित है। जिसे एक दिन के हिसाब से एक एपीसोड में तब्दील किया गया है। पहला एपीसोड देखते ही बात आपको समझ में आ जायेगी। बहुत ज़्यादा सीरियस होने की जरूरत नहीं है। बस कुछ देर के लिए मज़ा लीजिए।

विश्वास (अंशुमन मल्होत्रा) प्यारा सा, भोला सा, भावुक सा इंजीनियर लड़का है। जो इतनी जल्दी सब लोगों पर यकीन कर लेता है कि ना चाहकर भी लोग उसका उल्लू काट जाते हैं। विश्वास अपनी पहली नौकरी के लिए  पंचगनी से पुणे आता है। रास्ते में एक लड़की उस से मीठी-मीठी बातें करके अपने सारे काम करा लेती है। लेकिन मंजिल पर पहुंचते ही पता लगता है कि उसका उल्लू कट गया।

विश्वास इतना सीधा है कि उसके छोटे भाई की दोस्त ही उसके पैसों से नशा करके उसका काट जाती है और इसी चक्कर में उसकी चाची उसे घर से निकाल देती है। इसके बाद वो अपने बचपन के दोस्त हर्सा (पुनीश शर्मा) के पास जाता है। हर्सा सिर्फ उसका काटता ही नहीं है बल्कि उसे थाने और पहुंचा देता है। वहां से किसी तरह उसे उसकी बॉस बचाती है।

वह कम्पनी में जॉइन करता है तो उसकी कुलिग उसे कार्ड मैजिक में फसाकर हॉटल ले जाती है और वहां अपने बॉयफ्रेंड के साथ मिलकर उसको लूट लेती है। यह दुख अभी जाता भी नहीं है कि एक और लड़की मंगनी का नाटक करके उसका काट जाती है। यह सब होने के बाद उसे सिर्फ़ अपनी बॉस (रायमा सेन) पर भरोसा है जो बेघर होने पर उसे अपने घर में पनाह देती है, उसे थाने से छुटाकर लाती है, जो उसे कम्पनी के बॉस से बचाती है लेकिन अंत में उसकी बॉस ही जब उसका फायदा उठाना चाहती है तो वह उसका घर और नौकरी छोड़कर अपनी बचपन की दोस्त सेलजा (प्रियल गौर) के पास वापस पंचगनी आ जाता है।

सिनेमा की नज़र से

हर एपीसोड में कहानी बदलती है। हर कहानी में एक साईड से नया किरदार आ जाता है। यह सब मेड इन हेवेन  देखने से पहले नया था। इस सीरीज लेकिन पटकथा लिखने में इसका अच्छा इस्तेमाल नहीं हो पाया है। हर एपीसोड में एक लड़की आती है जिस से विश्वास को प्यार हो जाता है और सच कुछ और होता है। इसलिए आसानी से पता लग जाता है कि आगे क्या होने वाला है।

इस सीरीज के सात एपीसोड देखने के बाद लडकियों के मन में भी सवाल उठना लाज़मी है। विश्वास को इस्तेमाल करके उल्लू बनाने वाली लडकियां ही क्यों? सात दिन में सात अलग-अलग लडकियां विश्वास के साथ फलर्ट करके उसका उल्लू बनाती हैं। ऐसा लगता है कि शहर की सारी लडकियां बस उसी का इंतजार कर रही थीं।

लेखक ने संवाद लिखते समय ज़रा भी पुणें महाराष्ट्र की भाषा को ध्यान में नहीं रखा। पुणे की कहानी में किरदार भाषा दिल्ली की बोल रहे हैं। यह कमी हर एपीसोड की कहानी में कहीं ना कहीं कमी नज़र आती है। लोकेशन कुछ जगह पर अच्छी इस्तेमाल की हैं जिन्हें देखकर आपको पुणे याद आ जायेगा। कुछ छोटे-छोटे किरदारों ने बहुत अच्छी एक्टिंग भी की है। रायमा सेन ने अपने तजुर्बे से अपने किरदार को काफी अच्छा निभाया है। हालांकि कुछ एक्टर एक्टिंग कर रहे हैं यह साफ नज़र आता है। कहानी में मनोज जोशी को करने के लिए बहुत कुछ नहीं है।

इस सीरीज के सात एपीसोड सिर्फ इस उम्मीद पर देखे जा सकते हैं कि अगले एपीसोड़ में विश्वास का किस तरह कटेगा।

बातें जो हज़म नहीं होतीं

आप सीरीज देखने पर अगर नोट करें जो बातें आपको हज़म नहीं हुईं तो सीरीज के अंत में पाओगे की आपकी ड़ायरी का एक पेज भर गया। सीरीज देखते हुए ऐसी बहुत सी बातें नज़र आयेंगीं।

जैसे विश्वास जिस आई.टी कम्पनी में जॉइन करता है। वहां उसकी कुलिग विश्वास को मैजिक कार्ड में फसाकर उसे हॉटल में ले जाती है और अपने बॉफ्रेंड के साथ उसकी घड़ी और पर्स के पैसे लूट लेती है। कौन इंजीनियर लड़की एक हजार रूपये की घड़ी लूटने के लिए अपनी लांखों की नोकरी गवा देगी? कुछ भी।