संजय दत्त का जिन्हें वो जमाना याद है। संजय दत्त जब हर दूसरे फ़िल्म बनाने वाले की पहली पसंद थे। फ़िल्म सड़क उनके उसी जमाने की फ़िल्म है। सड़क के पूरे 29 साल बाद सड़क2 आयी है। संजय दत्त को सड़क से जितनी सफलता मिली थी कि वो फ़िल्म आज भी लोगों के दिल में बसी हुई है। सड़क और सड़क2 के बीच जो फांसला है। यह पांच बातें उसका कारण हो सकती हैं।

फ़िल्मों की कहानी

यह उन दिनों की बात है। फ़िल्मों के चाहने वाले फ़िल्मों के पोस्टर घरो में लगाया करते थे। फ़िल्म सड़क को वो पोस्टर जिसमें संजय दत्त पूजा भट्ट को बांहों में लिए सड़क पर खड़े दिखाई देते थे। वह बचपन में बहुत घरो में देखा था। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि तब फ़िल्म को कितना पसंद किया गया था। उस जमाने के हिसाब से कहानी में नयापन भी था।

पुरानी सड़क की कहानी टेक्सी ड्राईवर संजय दत्त और पूजा भट्ट की कहानी थी। संजय दत्त की बहन वेश्यालय चलाने वाली अर्धनारीश्वर महारानी के कारण आत्म हत्या कर लेती है। संजय दत्त जिसे बर्दाश नहीं कर पाते हैं। एक रात उन्हें सड़क पर पूजा भट्ट मिलती हैं। उन्हें पूजा से प्यार होता है तो पता चलता है कि उसका सगा चाचा उसे वेश्यालय में छोड़ गया है।

संजय दत्त जो महारानी के चंगुल से अपनी बहन को नहीं बचा पाता है प्रेमिका को भी वहीं फंसा देख तड़प उठता है। वह अपनी प्रेमिका को किसी भी कीमत पर वहां से भगा ले जाता है। महारानी के गुंडे शिकारी की तरह उनके पीछे पड़े हैं और वो परिंदो की तरह जान बचाते फिरते हैं। यह स्टोरी 1991 की कामयाब लव स्टोरी बनी थी।

सड़क2 में इन्हीं बातों की कमी दिखती है। सड़क2 की कहानी में लव स्टोरी को सही से नहीं बुना गया। ना ही फैमली ड्रामे को सही से बुना गया। कहानी आलिया भट्ट की है जिसकी मां को उसकी सौतेली मां ने मार दिया है। आलिया को पागल घोषित कर दिया है। उसकी मां ने जायदाद उसके नाम कर दी है। वह अपनी प्रेमी आदित्य रॉय कपूर के साथ केलाश पर्वत पर जाकर शादी करना चाहती है। ट्रेवल एजेंसी चलाने वाले दिमागी तौर से परेशान संजय दत्त उसे लेकर जाने का जिम्मा अपने सर लेते हैं और उसको अपनी बेटी मानकर उसे मारने वाले बाबा ज्ञानप्रकाश मकरंद देशपांडे से लड़ते हुए मर जाते हैं। कहानी में इतने सारे सबप्लाट हैं। मैन प्लाट क्या है वही समझ से दूर चला जाता है। दर्शक किसी एक किरदार से इमोशनली ना जुड़कर भटकता रहता है।

फ़िल्म की ज्योग्राफी

पुरानी सड़क फ़िल्म में कहानी के मुताबिक और किरदारों के मुताबिक एक माहौल पर्दे पर दिखाई देता है। सदाशिव का अर्धनारी किरदार, उसका वर्चस्व, उसका वेश्यालय, वेश्यालय में काम करने वाली लड़कियां, उसमें फंसी पूजा भट्ट। एक वेश्यालय मे किस तरह के लोग रहते हैं। वह किस तरह अपना धंधा चलाते हैं। टेक्सी ड्राईवर संजय दत्त, उसके टेक्सी चलाने वाले दोस्त, उसके आस-पास वह किन लोगों के बीच रहता है। एक पूरा माहौल दिखाई देता है। देखने वाला जिसमें खो जाता है।

सड़क2 में जबकि सब कुछ गायब है। उसका विलेन एक बाबा है। कहानी में उसे बहुत ही बड़ा दिखाया गया है लेकिन उसके आस-पास स्क्रीन पर ऐसा कुछ नज़र नहीं आता। आलिया भट्ट का अपने मां-बाप के साथ कोई कनेक्शन ही नहीं बन पाता है। संजय दत्त की ट्रेवल एजेंसी का भी कोई बैकग्राऊंड नहीं दिखता। आदित्य रॉय कपूर का भी कोई बैकग्राऊंड मजबूत नहीं दिखता है। फ़िल्म का सत्तर प्रतिशत या तो गाड़ी में है या फिर किसी घर में है।किसी भी किरदार के इर्द गिर्द जो माहौल बनता है कहीं नज़र नहीं आता है।

फ़िल्मों के विलेन

सड़क फ़िल्म का हीरो संजय दत्त तो मुम्बई में टेक्सी चलाने वाला एक जज़बाती इंसान था ही लेकिन फ़िल्म हिट बनाने के लिए उसमें अर्धनारी महारानी के किरदार में सदाशिव अमरापुरकर की दमदार भूमिका भी थी। सदाशिव ने उस किरदार को निभाया ही नहीं जैसे जिया था। फ़िल्म देखने वालों में उसका ख़ोफ दिखता था। इसलिए उस किरदार को देखने वालों ने बहुत पसंद किया था।

सड़क2 में जबकि ऐसा कुछ नहीं दिखता है। महेश भट्ट ने हालांकि महारानी जैसा ही किरदार लिखने की कोशिश तो की थी। उस किरदार को मगर पर्दे पर सही से उतार नहीं पायें। सड़क2 का ज्ञान प्रकाश बस गांजा पीकर एक कमरे में झूम रहा है। कहानी में उसके करने के लिए बहुत कुछ नहीं दिखता। उसको जितना बड़ा बताया उतना दिखा नहीं पाये।

गीत और संगीत

फ़िल्म सड़क 1991 में आयी थी। उस फ़िल्म की यादें अगर अभी तक लोगों के दिमाग में हैं तो इसलिए क्योंकि फ़िल्म में गाने बहुत ही अच्छे थे। गानों को फ़िल्माया भी बहुत ही अच्छे से गया था। फ़िल्म की कहानी में गाने फिट बैठते थे।  इसलिए गाने भी कहानी का हिस्सा बन गये थे। इसलिए उनका असर भी दोगुना हो गया था।

सड़क2 में गाने अच्छे तो हैं मगर पुरानी सड़क की तरह फ़िल्म की कहानी में जुड़ नहीं पाते हैं। सड़क 2 के गाने कहानी का हिस्सा नहीं बन पाते हैं। इसलिए देखने वालों पर उनका असर भी इतना नहीं होता है।

किरदारों का महत्व

अच्छी कहानी वही होती है जिसका हर एक किरदार छोटा हो या बड़ा हो। फ़िल्म देखने वाले को कहानी में उसकी जरूरत लगे। कहानी में कहीं ना कहीं उसका महत्व दिखाई दे। पुरानी सड़क में हर किरदार का अपना महत्व है। संजय दत्त की छोटी बहन जो वेश्यावृति के कारण ही आत्म हत्या करती है। जिस से वेश्यालय में फंसी पूजा भट्ट बाहर निकालने का संजय दत्त का मकसद और मजबूत हो जाता है। उसके दोस्त जो उसकी प्रेमिका को भगाने में उसकी मदद करते हैं। उसके दोस्त जान दे देते हैं लेकिन अपने दोस्त का पता नहीं बताते हैं। हर किरदार कहानी की जरूरत लगता है।

सड़क2 में जबकि सारे के सारे किरदार बिना मकसद के भटक रहे हैं। संजय दत्त और आलिया भट्ट को इमोशनली कनेक्शन कमजोर लगता है। आदित्य रॉय कपूर और आलिया भट्ट की लव स्टोरी में कोई जान नहीं दिखती। आदित्य पूरी फ़िल्म में अपनी जगह के लिए तरसते दिखते हैं। दिलीप हथकटा के किरादर में गुलशन ग्रोवर का किरदार बहुत ही कच्चा लगता है। एक पुलिस वाले का किरदार जो सिर्फ बाबा के यहीं दिखता है।

हर किरदार अपनी कहानी फ्लेशबैक में बता रहा है। दिलीप हथकटा बताता है उसने हाथ क्यों काटा। विशाल (आदित्य रॉय कपूर) बताता है कि वो आलिया को क्यों मारना चाहता है। संजय दत्त अपनी कहानी आलिया को बताता है। आलिया अपनी कहानी संजय दत्त को बताती हैं। आलिया का पिता अपनी कहानी अपनी पत्नी को बताता है। सब अपनी अपनी कहानी बता रहे हैं। सबकी कहानियों के चक्कर में फ़िल्म की असल कहानी क्या है, समझ से बाहर हो जाती है।