सोच से बड़ा घोटाला
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सोनी लिव पर 10 एपिसोड की सीरीज स्केम 1992 देखी जा सकती है। यह सीरीज 1992 के एक बहुत ही फैमस आदमी हर्षद मेहता के जीवन पर आधारित है। एक मामूली सा आदमी जिसने शेयर बाजार और मनी मार्कीट के ऐसे गुण सीखे कि रातों रात अमीर होता चला गया। उस अमीरी के पीछे लेकिन एक झोल था। वह झोल क्या था? सीरीज उसी के इर्द-गिर्द घूमती है।

निर्देशक: हंसल मेहता, जय मेहता
कलाकार: शारिब हाशमी, प्रतीक गांधी, सतीश कौशिक, रजित कपूर, श्रेया धनवंतरी,
लेखक: सौरव डे, सुमित पुरोहित, वैभव विशाल, करण व्यास।
प्लेटफार्म: सोनी लिव

कहानी सुचेता दलाल और देबाशीश बसु की किताब ‘दा स्केम’ पर आधारित है। दस एपिसोड की सीरीज में सुचेता दलाल का भी एक केरेक्टर है। उनके किरदार के रूप में श्रेया धनवंतरी कहानी को नेरेट भी कर रही है। दरअसल सुचेता दलाल को पता चलता है कि एस.बी.आई बैंक में पांच सौ करोड़ रूपये का घोटाला हुआ है। वह उस घोटाले के बारे में जब जानने की कोशिश करती हैं तो हर्षद मेहता नाम के एक ब्रोकर का नाम आता है।

सुचेता दलाल एक पत्रकार के नाते उसकी तहकीकात में लग जाती हैं। वह मार्कीट के हर पहलू पर गौर करती है। उनकी नज़रों में ऐसे बहुत से लोग निकलकर आते हैं जो उसमें शामिल होते हैं। सुचेता हर्षद के खिलाफ सुबूत जुटाने लगती है। उन्हें इस घोटाले के जब पूरे साक्ष्य मिलते हैं तो उनकी रिपोर्ट बाहर आती है।

उस रिपोर्ट के आने के बाद भारतीय शेयर मार्कीट में तहलका मच जाता है। भारतीय अर्थव्यवस्था पर सवाल उठने लगते हैं। सी.बी.आई की जांच होती है। उसमें हर्षद को सजा होती है।

सीरीज को समझने से पहले इतिहास समझना होगा

यह 80 का दशक था। शेयर मार्कीट में बिग बुल और बैर नाम के दो ग्रुप थे। इन्हीं में से बुल को हर्षद मेहता संभालता था। हर्षद मेहता का बचपन जिन हालातों में बीता था। उसे उसके मकाम पर देखकर हर कोई सोच में पड़ जाता था। उसका इतना छोटा सा घर था जिसमें सारा परिवार रह भी नहीं सकता था। उसने शेयर मार्कीट का ब्रोकर बनकर धंधा सीखा। उसने प्रसन्न परिजीवनदास को अपना गुरू मानकर उनसे शेयर मार्कीट के बहुत सारे गुण और दोष जान लिए।

हर्षद लेकिन उतने से संतुष्ट नहीं था जितना वो जानता था। उसने अपनी कम्पनी खोल ली। जिसे उसका भाई और वो देखते थे। हर्षद मेहता कैसे शेयर मार्कीट का रूख बदल देता था। इस बात का अंदाजा इस घटना से लगाया जा सकता है कि एसीसी के शेयर 200 रूपये के थे। उसने जैसे ही अपने लोगों को शेयर खरीदने के लिए बोला कुछ समय में शेयर 900 को हो गया।

हर्षद मेहता ऐसा कैसे कर रहा था। इस बात का जब खुलासा हुआ तो पता चला कि वो बैंकों को चूना लगा रहा था। यह बात जब तक सरकार की नज़रों में आयी तब तक 4072 करोड़ का घोटाला हो चुका था। उस समय तक हर्षद के पास बेशुमार दौलत, मंहगी से मंहगी गाडियां थीं। अमीर से अमीर लोग उस से मिलने के लिए तरसते थे।

उस समय नरसिम्हा राव की सरकार की थी। मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे। भारत के बाजार दुनिया के खोल दिये गये थे। भारत में विदेशी कम्पनियों का आना शुरू हुआ था। हर्षद कितना चालाक और मंझा हुआ खिलाड़ी था। उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसने प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को ही एक करोड़ रिश्वत देने का इल्ज़ाम लगा दिया। हालांकि जॉंच में बात सिद्द नहीं हो पायी थी।

सिनेमा की नज़र से

हंसल मेहता सच्ची कहानियों के खिलाड़ी हैं। उनकी ज़्यादातर फ़िल्में सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं। उनमें भी किसी ऐसे इंसान की ज़िंदगी पर आधारित हैं जो विवादित रही है। इसे हंसल मेहता का हुनर ही मानिए कि उन्होंने शाहिद, अलीगढ़  जैसी फ़िल्मों से लोगों को झकझोर कर रख दिया था। उन किरदारों के मरने के बाद उन्होंने उनमें वो देखा जो जीते जी लोग नहीं देख पाये।

हंसल मेहता की सिनेमा की बात करें तो जब आप उनका सिनेमा देख रहे होते हैं तो ऐसा लगता है। वह अपने किरदार को जितना जानते हैं इतना शायद उनका किरदार भी खुद को नहीं जानता होगा। वह अपने किरदार की ज़िंदगी में पूरी तरह उतर जाते हैं जो पर्दे पर नज़र भी आता है।

हंसल मेहता अपनी सीरीज के किरदार हर्षद मेहता की ज़िंदगी को भी उतने ही नज़दीक से दिखाने में कामयाब रहे। मेरे ख़्याल से उन्होंने हर्षद मेहता की जिंदगी का कोई ऐसा जरूरी पहलू नहीं छोड़ा जिसे सीन में बदलकर दिखाने की कोशिश ना की हो। इस बार लेकिन उनसे कुछ तो चूक हुई है। बहुत जगह सीरीज देखते हुए मालूम होता है कि हर्षद ने बस प्रशासन की कमजोरी का फायदा उठाया है। हर्षद ने जो किया वो तो बहुत लोग कर रहे थे। वहां नियम साफ नहीं थे। हर्षद के घोटाले के बाद शेयर बाजार पर नज़र रखने के लिए सेबी जैसी संस्था को बनाया गया।

अच्छा क्या लगा

हर्षद मेहता पर जहां किताब लिखी जा चुकी है। उस पर बहुत सारे आर्टिकल माडिया में अखबारों में मौजूद हैं। उस पर जब सीरीज बनती है तो ख़तरा रहता है कि कहीं चूक ना हो जाये। हर्षद मेहता का किरदार निभाने वाले प्रतीक गांधी की वहां तारीफ करनी होगी। प्रतीक हर्षद मेहता के किरदार को बहुत करीब से देख पाये। हर्षद मेहता के अगर साक्षात्कार देखें तो बात करते-करते उनका चेहरा स्माइली हो जाता है सीरीज में प्रतीक गांधी का भी वही हाल था। प्रतीक हो सकता है कि इसलिए हर्षद के किरदार को उसकी सोच को समझ पाये कि वो खुद भी गुजरात से आते हैं और गुजरातियों के बारे में कहा जाता है कि वो गुजराती ही क्या जो धंधा ना समझें।

इसके अलावा शारिब हाशमी का किरदार अच्छा तो है लेकिन उतना प्रभाव नहीं डालता जितना की फैमली मैन  में था। श्रेया धनवंतरी  ने एक जर्नलिस्ट की अच्छी भूमिका निभाई है। वह सुचेता दलाल के असल किरदार के बहुत ही नज़दीक नज़र आती हैं। इसके अलावा एक्टिंग में अगर कोई सबसे ज़्यादा तारीफ के काबिल रजित कपूर रहे। इस से पहले भी उनकी अदाकारी को कोड एम  सीरीज में बहुत पसंद किया गया था। उसमें उन्होंने एक कर्नल का किरदार निभाया था। इसमें उन्होंने एक एडिटर का किरदार निभाया है।

सीरीज के एपिसोड की थीम पर पुराने गानों के संगीत और बोल अलग सी बात लगती हैं। शेयर बाजार के बाहर किस तरह से लोग काम करते थे। किस तरह से एक मंड़ी सी लगती थी। यह देखने में बहुत ही नया अनुभव था। यह वाकई में बहुत कम लोग जानते होंगे। कुछ जगह पर सिनेमाटोग्राफी बहुत ही साधारण सी दिखती है लेकिन मजबूत कंटेंट को साधारण तरीके से उसी समय में शूट करना। यह भी हंसल मेहता की खूबियों में से एक खूबी है।

क्या अच्छा नहीं लगा

एक लेखक जब कुछ लिख रहा होता है। वह सबसे पहले अपने सबजेक्ट को इतना आसान करता है कि देखने वालों को अच्छी तरह से समझ आ सके। क्योंकि सबजेक्ट से ही अगर दर्शक कनेक्ट नहीं हो पाया तो फिर अच्छी एक्टिंग और बाकी खूबियां भी देखने वाले को नहीं रोक सकतीं। इसका उदहारण सेक्स एजुकेशन, ग्रेविटी  जैसी फ़िल्में हो सकती हैं। इन फ़िल्मों का सब्जेक्ट साइंस पर आधारित है। पटकथा लेखक और निर्देशक लेकिन सबजेक्ट को इतना आसान करके दिखाते हैं कि हर किसी को आसानी से समझ आ जाता है।

इस सीरीज की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि यह सीरीज शेयर बाजार, इंडियन बैंकिंग सिस्टम, इकॉनोमिक्स पर आधारित है। कहानी शेयर बाजार के इर्द गिर्द और इंडियन बैंकिंग के इर्द गिर्द ही घूमती है। लेकिन जिसका वास्ता इन सब सबजेक्टों से नहीं रहा। वह सीरीज के सबजेक्ट को समझ नहीं पाता है। हालांकि पटकथा लेखकों ने बहुत बार घरेलू उदहारणों से, रोजमर्रा के सीधे साधे उदहारणों से, कहावतों से सबजेक्ट को आसान करके समझाने की कोशिश की है मगर फिर भी पूरी तरह समझाने में नाकाम रहे है।

सीरीज के संवाद सबसे बड़ी कमजोरी है। संवादों को सुनकर बहुत जगह ऐसा लगता है कि कोरी लफ्फाजी चल रही है। हर बात ड्रामेटिक अंदाज में बोली जा रही है। अब असल में अगर हर्षद मेहता ऐसे ही बात करता था तब तो सही है और अगर लेखकों ने संवादों को क्रिएटिव बनाना चाहा है तो फिर उनकी चूक है।

यह सीरीज अस्सी के दशक से शुरू होती है। सीरीज में सिर्फ शेयर मार्कीट के बाहर लगने वाली भीड़ को छोड़कर बाकी बहुत जगह निर्देशक देखने वालों को यक़ीन दिलाने में नाकामयाब रहे कि सीरीज 80-90 के दशक में चल रही है। किरदारों के संवाद और सोच भी उस दशक से मेल नहीं खाती है।

कोई क्यों देखे?

अस्सी के दशक की राजनीति, उस समय की आर्थिकनीति और समाज में बढ़ती प्रतिस्पर्धा को समझने के लिए सीरीज बहुत ही कारगर है। हंसल मेहता किस तरह से एक रियल स्टोरी को फिर से जीवित कर देते हैं, समझने के लिए देख सकते हैं। एक महत्वाकांक्षी आदमी अपने सपनों को पूरा करने के लिए कब सिस्टम को चुनौती देने लगता है। वह कब राह से भटक जाता है और अपने ही हाथों अपना पतन कर बैठता है। समझने के लिए युवाओं को देखनी चाहिए।