नाम बडे पर काम नहीं
60%Overall Score

नेटफिलक्स पर हाल फिलहाल में तीन सीरीज आयी हैं। जामतारा, ताजमहल 89 और शी। इत्तेफाक से तीनों का रिश्ता एक ही प्रोडक्शन हाऊस से है। इन तीनों सी सबसे आखिर में यानी 21 मार्च को रिलीज हुई है। इसकी ख़ास बात है कि इसे बॉलीवुड के बडे निर्देशक इम्तियाज अली ने लिखा है। उनकी फ़िल्मों का असर, उनके किरदारों की फॉलासफी और उनकी गहराई इस सीरीज में भी दिखती तो है मगर कितनी यह बताना थोड़ा समझना पड़ेगा।

निर्देशक: आरिफ अली, अविनाश दास

लेखक: इम्तियाज अली, मनीष गायकवाड, दिव्या जोहरी

कलाकार: अदिती सुधीर पोहनकर, विजय वर्मा, विश्वास कीनी, शिवानी रंगोली, संदीप धाबले, साकिब अय्यूब

प्लेटफार्म: नेटफ्लिक्स

इम्तियाज अली की ज़्यादातर फ़िल्मों की कहानी दोतरफा होती है। वह अपने किरदार के दिमाग में घुस जाते हैं और वो कहलवा कर ही रहते हैं जो वो सोचते हैं। इस सीरीज पर भी उनकी फिल्मों का असर साफ दिखाई देता है।

इम्तियाज अली की 2014 में आयी फ़िल्म हाइवे  को लोगों ने काफी सराहा था। फिल्म की कहानी थोड़ी अलग हटकर थी। उसमें एक लड़की को किडनेप करने वाले गुंडे से प्यार हो जाता है क्योंकि उस लड़की के घरवाले जो बात नहीं समझ पाते हैं वो गुंडा समझता है।

शी की कहानी भी थोड़ी उसी तरह है। यह एक पुलिस कांस्टेबल भूमि परदेसी (अदिती सुधीर पोहनकर) की कहानी है जिसका पति लोखंडे(संदीप धाबले) उसे तलाक दे रहा है क्योंकि उसमें कोई आकार्षण नहीं है और ना ही वो रोमांटिक है।

भूमि को शरीफ लोगों के बीच कोई पसंद नहीं करता है। सब उसकी छोटी बहन रूपा (शिवानी रंगोली) को पसंद करते हैं। आस-पास के सभी लोग लड़के यहां तक की भूमि का पति भी उस पर लाइन पर मारता है। उसे फलर्ट करता है और उसके साथ सोना चाहता है। रूपा का ब्वायफ्रेंड भी उस पर महंगे-महंगे गिफ्ट लुटाता है। रूपा बन संवरकर रहती है। भूमि की भाषा में वो हॉट है।

भूमि की खुद से पहचान जब होती है तब उसे मुम्बई क्राईम ब्रांच ऑफिस में दो दिन की ट्रेनिंग देकर प्रोस्टीटयूट बनाकर एक बहुत ही शातिर क्रिमिनल सस्सया(विजय वर्मा) को फसाने के लिए भेजा जाता है। वह सस्सया को अपने जाल में फसाकर पकड़वा तो देती है लेकिन सस्सया उसका दिवाना हो जाता है।

यही कहानी का मूल अंश है। एक तरफ सभ्य समाज में भूमि का पति, उसके साथी मर्द कांसटेबल, उसकी बहन और उसका ब्वायफ्रेंड किसी को भी उसे देखकर लड़की जैसा फील नहीं आता है। सबको उसकी छोटी बहन रूपा को देखकर फील होता है। दूसरी तरफ एक गुंडा है प्रॉस्टिट्यूट जिसकी कमजोरी है। सभ्य समाज जिस वजह से उसे नकारता है सस्सया उसी वजह से उस पर फिदा हो जाता है।

भूमि को अपनी बहन से एहसास ए कमतरी रहता है। भूमि बीच-बीच में किसी भी लड़के को उक्सा कर अपना परीक्षण करती है कि उसे देखकर उन्हें आकर्षण होता है कि नहीं। ऐसा सच मे कहीं होता है क्या? यह सवाल तब और ज़्यादा लाज़िमी हो जाता है जब पटकथा बहुत ही अनुभवी निर्देशक लिख रहा हो।

इम्तियाज अली का मुख्य किरदार भूमि कभी गम्भीर महिलावादी नजर आती है तो कभी समझोता करती नजर आती है। इम्तियाज कभी फेमिनिज़्म की बातें करते हैं तो कभी समझोते की बातें करते हैं। इस खिचड़ी में देखने वाला ही कंफ्यूज़ हो जाता है आखिर चल क्या रहा है। इस सीरीज को देखने के बाद एक बात तो साफ होती है कि तीन घंटे की फ़िल्म लिखना और सात एपीसोड की सीरीज लिखना दोनों अलग बात हैं। यह बात फ़िल्म निर्देशकों को भी समझनी चाहिए।

सिनेमा की नज़र से

निर्देशक: शी का निर्देशन दो निर्देशकों ने मिलकर किया है। एक अविनाश दास हैं जिन्होंने अनारकली ऑफ आरा जैसी फ़िल्म का निर्देशन और दा बैटल ऑफ बनारस जैसी फ़िल्म की पटकथा लिखी है। अविनाश का कहानी कहने का अंदाज थोड़ा अलग है। वह पर्दे पर दिखाने के लिए किरदारों का वो हिस्सा चुनते हैं बाकी निर्देशक जिसे छूते तक नहीं हैं।

इस सीरीज में दूसरे निर्देशक आरिफ अली और अविनाश दास की फ़िल्म कला का तजुर्बा तो साफ नज़र आता है लेकिन बहुत सारी कमियों के साथ नज़र आता है। वह किरदारों की तह में जाने की कोशिश करते हैं। लेकिन वहां पहुंचते-पहुंचते कहानी में भटक जाते हैं।  वह अपने मुख़्य किरदार भूमि के परिवार को उसकी सोच को हर तरफ से दिखाते हैं। एक सीरीज में इन सबके अलावा भी लेकिन और बहुत कुछ होता है।

सीरीज का पहला एपीसोड रोमांच पैदा करता है। दर्शक बिना हिले दूसरे एपीसोड तक जाता है दूसरे एपीसोड में सस्सया का भूमि पर फिदा होना और दोनों के बीच की बातें भी मनोरंजक हैं लेकिन तीसरे एपीसोड से चीजें कमजोर होने लगती हैं। निर्देशक की किरदारों से पकड़ छूटने लगती है और कहानी मुद्दे की जगह इधर-उधर भटकने लगती है। वह इतनी भटक जाती है कि निर्देशकों के हाथों से छूट जाती है और ऐसा तब होता है जब निर्देशक एक नहीं दो थे।

एक्टिंग: सारे ही किरदारों ने अच्छी की है। सारे ही किरदारों को अच्छे से लिखा भी गया है। सस्सया बने विजय वर्मा की बात करें तो वह अपनी एक्टिंग और अटपटी लुभावनी हैदराबादी भाषा से ही तीन एपीसोड तक दर्शकों को हिलने नहीं देते हैं। लेकिन जैसे ही दर्शक उनके बारे में और ज़्यादा जानना चाहता है अचानक सस्सया के किरदार को साइड कर दिया जाता है। यह सीरीज की कमजोर कड़ी है।

अदिति सुधीर ले लयभारी फ़िल्म में जो जलवा दिखाया था। सीरीज शी में उस से बिल्कुल अलग देखने को मिलेगा। उन्होंने एक मराठी तलाकशुदा कांस्टेबल लडकी के किरदार को निभाने में अपनी पूरी ताकत लगा दी है। वह जिस अंदाज में मराठी टच के साथ बोलती हैं दर्शकों के मन में एक छवि बनाती हैं। लेकिन उनका भटकता किरदार उनका बहुत साथ नहीं दे पाता है।

नायक नाम का विलेन जो बाद के दो एपीसोड में दिखाई देता है। वह किरदार बहुत समझदार है बहुत ही शान्त है उसके बात करने का अंदाज भी अलग है। उसकी बातें भूमि के अंदर एक बदलाव पैदा करती हैं और उसके अंदर एक क्रांति पैदा कर देती हैं जिसके चलते वो अपने ऑफिसर से भिड जाती है। किरदार तो अच्छा लिखा गया है लेकिन उसके बारे में ज़्यादा अगले सीजन में ही पता लग पायेगा।

रूपा ने भूमि की बहन का छोटा पर बहुत ही सही किरदार निभाया है। वह जब-जब नज़र आती है अपने अलग अंदाज में नज़र आती है। हैड कांस्टेबल बने मात्रे (अजय जाधव) का किरदार बिल्कुल वैसा ही जैसा दा फैमली मैन   मे था। इसके अलावा विश्वास कीनी क्राइम ब्रांच ऑफिसर के किरदार में बहुत कुछ खास नहीं कर पा रहे हैं। वह बिल्कुल असहाय लगते हैं।

गीत और संवाद: संवाद के लिए तो एक बार ज़रूर देखनी चाहिए। हर मुख़्य किरदार अलग भाषा के टच के साथ हिन्दी बोल रहा है। एक हैदराबादी टच के साथ हिन्दी बोलता है तो एक मराठी टच के साथ हिन्दी बोलता है तो एक तमिल टच के साथ हिन्दी बोलता है। जो सुनने में बहुत ही अच्छा लगता है।

इसके अलावा इरशाद कामिल का लिखा गाना बीच-बीच में आता है जिसे फ़िल्माने निर्देशकों से शायद चूक हुई है। गाने के बोल अच्छे हैं लेकिन गाना कहीं भी ध्यान नहीं खींचता है।