भारत में आजादी के बाद एमेरजेंन्सी को काला इतिहास माना जाता है। उस समय बहुत कुछ हुआ, बहुत से लोगों को जैल जाना पड़ा। बहुत से लोगों को नज़रबंद किया गया। बहुत से लोगों को दिल्ली से दूर जाना पड़ा। यह सब तो लोगों ने फिर भी झेल लिया। इस सब के बावजूद भी कुछ लोग ऐसी अनहोनी के शिकार हुए जिसे वो नहीं झेल पाये। वह अनहोनी क्या थी। उसी पर फ़िल्म आधारित है।

निर्देशक: बिष्नु देव हलदार

लेखक: बिष्नु देव हलदार, रवि कुमार, सुधीर सिंह

कलाकार: दिव्येन्दु शर्मा, स्वेता बसु प्रसाद, शीतल ठाकुर,आकाश दबहाडे

प्लेटफार्म: जी5

यह 1975 की बात है। दिल्ली में जब लोग जान से ज्यादा अपनी इज्ज़त बचाते घूम रहे थे। क्योंकि सरकारी फरमान था कि जनसंख्या कम करने के लिए लोगों की नसबंदी की जाये। इसमें कुछ लोगों ने अपनी मर्जी से नसबंदी करायी तो कुछ लोगों की जबर्दस्ती कर दी गई। जबर्दस्ती जिनकी नसबंदी की गई उनकी संख्या मर्जी से कराने वालों से कई सो गुना ज़्यादा थी।

एक इंद्र (दिव्येन्दु शर्मा) नाम का लड़का जो दिल्ली में किसी फैक्ट्री में काम करता है। एक दिन अचानक उसे पकड़कर जबर्दस्ती उसकी नसबंदी करा दी जाती है। इस घटना के एक हफ्ते बाद उसकी शादी भी हो जाती है।

इंद्र इसी ड़र के कारण अपनी पत्नी से दूर रहता है। यह बात धीरे-धीरे उसके सारे रिस्तेदारों को पता लग जाती है। वह उसका कुछ ना कुछ घरेलू उपाय करते हैं। इंद्र का डर लेकिन दूर नहीं होता उसकी शादी शुदा जिंदगी में बाधा आ जाती है। इंद्र हार थक कर एक हक़ीम के पास जाता है। वह उसे समझाता है कि नसबंदी से बस बच्चे नहीं होंगे बाकी कोई परेशानी नहीं है। हक़ीम की बात सुनकर इंद्र को अपने आप पर यक़ीन होता है। उसकी शादीशुदा ज़िंदगी में कुछ वक़्त के लिए खुशी आ जाती है।

यह खुशी बहुत दिनों तक नहीं रहती है। इंद्र को शहर जाने पर पता चलता है कि उसकी पत्नी प्रेगनेंट है। इंद्र के पैरों तले ज़मीन खिसक जाती है। वह मान लेता है कि उसकी पत्नी ने उसके साथ धोखा किया है। उसके पेट में बच्चा किसी और का है। वह इसी गुस्से में एक लड़की आकर्ती (शीतल ठाकुर) के साथ सबंध बना लेता है। जिसे वो शादी से पहले से जानता है। यह दोनों कुछ दिन ही साथ रहते हैं कि इंद्र की पत्नी रीमा (स्वेता बसु प्रसाद) दिल्ली आ जाती है।

आकर्ती के दबंग पिता और भाई इंद्र की शादी उस से कराना चाहते हैं। इंद्र उनको अपनी नसबंदी वाली बात बताता है तो वह उसे डॉक्टर के पास ले जाते हैं। डॉक्टर उन लोगों को बताता है कि उसकी नसबंदी नहीं हुई है। वह सही है।तब इंद्र को अपनी पत्नी पर भरोसा होता है।

यह कहानी है जिसे तीन लोगों ने मिलकर लिखा है। उसके बाद भी कोई सीन ऐसा नहीं जिसे याद रखा जा सके। कोई सीन ऐसा भी नहीं है जिस पर आदमी को खुलकर हसी आये। कोई सीन ऐसा भी नहीं है जहां आदमी को रोना आ जाये। ऐसा लगता है जैसे फ़िल्म बस बनाने के लिए बना दी गई है। जबकि यह एक गम्भीर कहानी हो सकती थी। लेखक चाहते तो बहुत कुछ दिखा सकते थे।

दिव्येन्दु शर्मा की सुक्राणु में एक्टिंग देखने के बाद और मिर्जापुर में देखने के बाद ऐसा लगता है कि एक अच्छा निर्देशक ही अच्छी एक्टिंग भी करा सकता है। निर्देशक और दिव्येन्दु शर्मा दोनों ही जिसमें नाकामयाब रहे। ऊपर से उनके लिए लिखे गये शीन और संवाद इतने सिम्पल हैं कि साफ पता चलता है कि वह एक्टिंग कर रहे हैं।

यह फ़िल्म 1975 के समय में चल रही है। किरदारों की सोच और उनका रहन सहन आज के दौर का चल रहा है। बस कपड़े भर बदल लेने से आदमी वर्तमान से इतिहास में नहीं चला जाता है। वक़्त और समय के साथ सिर्फ कपड़े और फैशन ही नहीं बदलता सोच भी बदलती है। निर्देशक शायद वहां चूक गये।

यह 1975 की घटना बहुत गम्भीर है लेकिन फ़िल्म गम्भीर नहीं है। इस फ़िल्म में मजे की कोई गारंटी नहीं है। वह देखने वाले को समझ और ज्ञान के मुताबिक आ भी सकता है नहीं भी आ सकता है।