फ़िल्म निर्देशकों में कुछ नाम ऐसे हैं जिन्हें हिन्दी सिनेमा में चार चांद लगाने के लिए हमेशा याद किया जायेगा। सत्यजीत रॉय के बाद उनमें सबसे पहला नाम श्याम बेनेगल का आता है। श्याम बेनेगल ने हिन्दी सिनेमा को इतना कुछ दिया है कि लम्बे समय तक उनकी फ़िल्मों की छाप बॉलीवुड़ की फ़िल्मों पर बनी रहेगी।

हिन्दी सिनेमा में आर्ट सिनेमा की शुरूवात मृणाल सेन की 1969 में आयी फ़िल्म भुवन सोम से मानी जाती है। इसके बाद उसकी रोटी आयी। यह फ़िल्में हीरो वाली रूमानी ज़िंदगी से अलग एक आम आदमी की रोजमर्रा की दिनचर्या को पर्दे पर दिखाने का काम करती थीं। इन फ़िल्मों पर हमेशा यह डिबेट रही। यह फ़िल्में आम आदमी के जीवन का चित्रण तो हैं लेकिन नाटकों की फंतासी और काल्पनिक दुनिया में रम चुके आम आदमी तक नहीं पहुंच पाती हैं।

श्याम बेनेगल जिनके पिता जी भी फोटोग्राफर थे। गुरूदत्त जैसे नामी निर्देशक भी उनके रिश्तेदार थे। फ़िल्म उनके माहौल में थी। वह फ़िल्मों में आने से पहले ही विज्ञापनों की पटकथा लिखने का क्रिएटिव काम करते थे। आम आदमी के मनोरंज का उन्हें अंदाजा था। उन्होंने अपनी फ़िल्मों की धुन यथार्थवाद और हवा में छलांगे मार रहे हीरो के बीच रखी। उन्होंने एक बीच का रास्ता निकाला और बॉलीवुड में अलटरनेटिव सिनेमा की नींव रखी। श्याम बेनेगल की वो फ़िल्में जिनके बनने के किस्से उतने ही रोचक हैं जितनी की वो फ़िल्में।

‘अंकुर’ (1974)

श्याम बेनेगल की फ़िल्मों के हीरो समाज के उस सबसे निचले तबके से आते थे जिन्हें हासिए पर रखा जाता है। फ़िल्म अंकुर उसका एक उदहारण हैं। यह फ़िल्म हैदराबाद की जमींदारी व्यवस्था को दर्शाती है जिसमें एक जमींदार अपने खेत में काम करने वाली औरत के साथ सबंध बनाता है और औरत उसे रोज मर्रा का हिस्सा मान रही है। उस औरत का किरदार शबाना आजमी ने निभाया है।

अंकुर का जिक्र करते हुए शबाना आजमी बताती हैं कि फ़िल्म की शूटिंग के दौरान फ़िल्म ख़त्म होने तक उन्हें गांव की औरतों के जैसे कपड़े पहनने थे। उनसे उनकी भाषा में ही बात करनी थी। उसे नीचे ही सोना था और जमीन पर उकडू बैठना था। श्याम बेनेगल के कहने पर शबाना आज़मी ऐसा ही कर रही थीं। एक दिन गांव के कुछ लोग शूटिंग देखने पहुंचे तो शबाना उकडू बैठीं थी। गांव वालों ने पूछा हीरोइन कहां है। उन्होंने कहा नहीं पता। तुम कौन हो ? शबाना बोलीं मैं भी गांव की हूं शूटिंग देखने आयी हूं। गांव के सब लोग वापस चले गये। श्याम बेनेगल ने उस दिन शबाना से कहा तुम सफल हुईं। उनकी इसी मेहनत और लगन का ही नतीजा था कि पांच लाख में बनी फ़िल्म ने करोड़ों का कारोबार किया और साथ ही नेशनल अवार्ड भी जीता।

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‘निशांत’ (1975)

श्याम बेनेगल का ताल्लुक हैदराबाद से था इसलिए उनकी फ़िल्मों में हैदराबाद होता था। उन्होंने अपनी फ़िल्मों में उन महिलाओं की कहानी को छुआ जो अपने साथ होने वाले अत्याचार को अपनी किस्मत  मान चुकी थीं। उनकी फ़िल्मों की नायिका गुंडों को क़त्ल नहीं कर दे रही थी। वह उसके ऊपर हो रहे अत्याचार से छटपटा रही थी। वह समाज को झंझोड़ रही थी। यह बेनेगल के सिनेमा की ताकत थी कि फ़िल्म देखने के बाद आदमी जब वापस लौटता था तो अपने आप से शर्मिंदा होकर लौटता था।

फ़िल्म निशांत भी एक ऐसी ही महिला की कहानी है। फ़िल्म की नायिका शबाना आजमी जिसे कुछ जमींदार उठाकर ले जाते हैं। उसका पति कुछ नहीं कर पा रहा है। वह पहले तो लड़ने को छटपटाती है लेकिन आखिर में हारकर उसी को अपनी नियति मान लेती है। यह फ़िल्म आदमी को अंदर तक झंझोड देती है। नसीरूद्दीन शाह फ़िल्म निशांत को याद करते हुए कहते हैं इस फ़िल्म में बेनेगल साहब ने मुझे इसलिए लिया क्योंकि में देखने में उतना अच्छा नहीं था। यह फ़िल्म उनकी ज़िंदगी में मील का पत्थर साबित हुई।

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‘त्रिकाल’ (1985)

श्याम बेनेगल के सिनेमा की एक खास बात थी वह अपनी फ़िल्मों में कहानी के हिसाब से ऐसा माहौल बनाते थे कि बहुत ही छोटी से छोटी चीज को भी पर्दे पर उतार देते थे। वह अपने किरदारों के रिचवल, उनका रहन सहन, उनका पूरा कल्चर स्क्रीन पर ले आते थे। यही सब उनकी फ़िल्मों को बाकी निर्देशकों से अलग बनाते थे।

फ़िल्म त्रिकाल उसका एक उदहारण है। फ़िल्म गोवा के एक ऐसे इसाई परिवार की कहानी है जिसमें एक लेड़ी डोना मारिया अपने पति की आत्मा से बात करती है। वह अपनी ज़िंदगी के सारे फैसले उसकी आत्मा से पूछकर करती है। गोवा में ईसाइ परिवारों का रहन-सहन उनका कल्चर हिन्दी सिनेमा में इससे पहले कहीं देखने को नहीं मिलता है। फ़िल्म सामाजिक बुराइयों पर गहरी चोट करती है। इस फ़िल्म को भी नेशनल अवार्ड से नवाजा गया था।

फ़िल्म को याद करते हुए नीना गुप्ता ने अपने साथी निखिल भगत के साथ एक 35 साल पुराना फोटो सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए लिखा, थ्रोबैक-त्रिकाल में मैं और निखिल। निखिल अब तुम कहां हो और अब कैसे दिखते हो?

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‘मंडी’ (1983)

श्याम बेनेगल की फ़िल्म मंडी से पहले तवायफ़ों की ज़िंदगी पर बहुत फ़िल्में बन चुकी थीं। बेनेगल की मंडी लेकिन उन महिलाओं के जीवन को जितना करीब से दिखाती है कोई और नहीं दिखा पाया था। बेनगल जब प्रोस्टीटयूट की कहानी कहते हैं तो उसके हर पहलु पर बात करते हैं। इन औरतों का सामाजिक स्तर क्या होता है। आर्थिक स्तर क्या होता है। सभ्य समाज को उनकी और उनको समाज की कितनी जरूरत है।

श्याम बेनेगल ने इस फ़िल्म में स्मिता पाटिल की तारीफ मे कहा था कि उन्होंने स्मिता को अपनी फ़िल्मों में इसलिए लिया क्योंकि कैमरा उनसे प्यार करता था।

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‘सरदारी बेगम’ (1996)

श्याम बेनेगल ने देश के अलग-अलग क्षेत्रों में जाकर फ़िल्में बनायी हैं। उन्होंने अलग-अलग कम्यूनिटी के लोगों को लेकर फ़िल्में बनायीं। उनकी फ़िल्मों की खास बात होती है कि वो अपने किरदारों की भाषा पर बहुत ध्यान देते हैं। उनकी फ़िल्म सरदारी बेगम इसका उदहारण है जिसे उर्दू भाषा के लिए नेशनल अवार्ड मिला था।

यह फ़िल्म एक संगीत प्रेमी महिला की कहानी है। फ़िल्म में सरदारी का किरदार पहले शबाना आजमी निभाने वाली थीं लेकिन बाद मे यह रोल किरन खेर के हिस्से में आया।

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‘वेलकम टू सज्जनपुर’ (2008)

हर कलाकार अपने समय का माहिर होता है। किसी भी कलाकार के लिए वक़्त के साथ-साथ नई चुनौतियां आती रहती हैं। श्याम बेनेगल को भी उन चुनौतियों का सामना करना पड़ा। श्याम बेनेगल लेकिन अपनी फ़िल्मों में गांव से कभी बाहर नहीं निकले। हिन्दी सिनेमा अब जब अमेरिका जैसे बड़े देशों में शूट हो रहा है। उस दौर में भी उन्होंने वेलकम टु सज्जनपुर , वैलडन अब्बा जैसी फ़िल्में बनाकर साबित किया है कि वो आज भी सबसे अलग हैं।

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