मनोरंजक और साहसी
80%Overall Score

इस सीरीज के टाइटल स्टेट ऑफ सीज: 26/11 से ही पता लग जाता है कि सीरीज मुम्बई के ताज हॉटल पर हुए आतंकी हमले पर आधारित है। इस घटना का सभी देशवासियों पर बहुत ही गहरा असर हुआ था। संदीप उन्नीथन ने जिस पर एक किताब ‘Black Tornado: The Three Sieges of Mumbai 26/11’  लिखी थी। उसी किताब को आधार बनाकर अमेरिकी निर्देशक, लेखक, जोशुआ कैलडवेल  ने आठ एपीसोड की पटकथा लिखी है। जो सीरीज देखने वालों के दिल को दिल दहला देती है।

निर्देशक: मैथ्यू ल्यूटवायलर
कलाकार: अर्जन बाजवा, अर्जुन बिजलानी, मुकुल देव, विवेक दहिया, अविनाश वाधवान, सोहेब कबीर, विपुल देशमुख, विक्रम गायकवाड
प्लेटफार्म: जी5

यह एक बहुत ही दर्दनाक घटना थी। जिसमें देश के कई बहादुर जवान शहीद हुए। देश विदेश के बहुत सारे लोग मारे गये। इस घटना को लेकर अखबार और टी.वी पर बहुत कुछ बताया जा ही चुका है। ऐसे वक़्त में लेखक के पास एक चुनोती होती है कि जिस घटना के बारे में लोग पहले से ही जानते है उसे किस तरह से रोचक बनाया जाये। इस लिहाज से लेखक के काम अगर देखें तो उन्होंने बहुत ही बेहतरीन काम किया है।

लेखक ने पटकथा की तकनीक का पूरा इस्तेमाल किया है। एक साथ कई सारी पैरलल स्टोरी चलती हैं। जिसकी शुरूवात पड़ोसी मुल्क से होती हैं जहां 26/11 की घटना को अंजाम देने का प्लान चल रहा है।

इंडिया में एन.एस.जी ऑफिसर कुणाल सहोटा (अर्जन बाजवा), निखिल मनी कृष्नन (अर्जुन बिजलानी) अपने कमांडों को ट्रेनिंग दे रहे हैं जिसके लिए सरकार उन्हें पर्याप्त बजट नहीं दे रही है। वह बजट की कमी से जूझ रहे हैं।

मुम्बई पुलिस को गैंगवार मे गोलियां चलने की खबर मिलती है। एक इंसपेक्टर दो कांस्टेबल लेकर वहां से निकलता है। उस वक़्त तक तबाही मच चुकी होती है। पुलिस वालों के होश तब उड़ते हैं जब उन्हें पता चलता है कि यह गैंगवार नहीं अटैक है। वह अपने हथियारों से किसी तरह उनके ऑटोमेटिक हथियारों का सामना करते हैं और मारे जाते हैं।

एक न्यूज एंकर इस सारी घटना को न्यूज रूम में लाइव दिखा रहा है। जिसकी वजह से हमलावर पुलिस की गतिविधियों का अंदाजा लगाकर और सतर्क हो रहे हैं।

हमलावरों में से दो लोग एक अस्पताल के अंदर जाते हैं। वह लोग वहां रास्ता भटक जाते हैं। उनमे से एक मारा जाता है और एक पुलिस के हाथों पकड़ा जाता है। उसकी इन्फोर्मेशन के मुताबिक एन.एस.जी कमांडों रेस्कयू करते हैं और उन हमलावरों पर काबू पा लेते हैं।

इस चौबीस घंटे के पूरे घटनाक्रम को लेखक ने आठ एपीसोड में लिखा है। जिसे देखने के बाद रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

सिनेमा की नज़र से

जब कहानी किसी किताब पर आधारित हो, कहानी को लोग पहले ही जानते हो, कहानी पर पहले ही एक फ़िल्म भी आ चुकी हो तब निर्देशक के पास बहुत कुछ कहने को और दिखाने को नहीं रह जाता है। निर्देशक की तारीफ करनी होगी कि उसने एक फ़िल्म आने के बाद भी आठ एपीसोड की सीरीज को इस तरह से फ़िल्माया है कि देखने वालों का दिल दहल जाता है।

निर्देशक ने ड्रामें से बचने की कोशिश की है। उसका सारा ध्यान हीरोइज़्म से बचते हुए सीन को रियल बनाने में दिखाई देता है। इसलिए मुम्बई पुलिस के रूप में लिए गये सारे के सारे किरदारों बहुत ही रियल और अच्छी एक्टिंग करते हैं जिन्हें स्क्रीन पर देखकर सब कुछ रियल सा लगता है। हालांकि जब एन.एस.जी कमांडो की बातें और उनकी एक्टिंग देखते हैं तो उसमें थोड़ा ड्रामा जरूर नज़र आता है।

एन.एस.सी जी कमांडों को ट्रेनिंग के लिए बजट नहीं मिल रहा है। वह लोग अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहे हैं। नेता और ब्यूरोक्रेटस उन्हें फंड नहीं दे रहे हैं। यह पिछले पांच सालों में फ़िल्मोंं में इतनी बार देखा गया है कि अब पुराना सा लगने लगा है। एन.एस.जी कमांडों अर्जन बाजवा और अर्जुन बिजलानी दोनों ही एक्टिंग में बहुत कुछ खास नहीं कर पाये। अर्जन तो फिर भी ठीक था लेकिन अर्जुन बिजलानी कमांडों का किरदार में पर्फेक्ट नहीं लगते हैं।

यह सीरीज क्योंकि सच्ची घटना पर आधारित है तो इसमें छोटे-बड़े बहुत सारे किरदारों का काम था। ज़्यादातर किरदारों ने सही से अपना किरदार निभाया है। संगीत ने भी सीन पर फिट बैठता है। इस घटना पर बनी अब तक की सबसे बेहतर सीरीज है।