ठीक-ठाक
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अमेजन प्राइम की दफैमली मैन ,  इस सीरीज की थीम को परिवार के जरिये आसानी से समझा जा सकता है। एक इंडियन इंटेलीजेन्स ऑफिसर सीमा पार से घुसपैठ करने वालों से देश को बचा रहा है। देश को बचाते हुए जिसका घर बिगड़ रहा है।

निर्देशक: राज निदिमोरु और कृष्णा डी.के

लेखक:  राज, डी.के, सुमित अरोरा, सुमन कुमार

कलाकार: मनोज बाजपेयी, शारिब हाशमी, गुल पनाग, दलीप ताहिल,नीरज माधव

कहानी एक इंटेलीजेन्स ऑफिसर श्रीकांत की है। जो अपने डिपार्टमेंट में बड़े-बड़े कामों को करने के लिए जाना जाता है। लेकिन घर में अपनी पत्नी और बच्चों के सामने लूज़र बना रहता है।

श्रीकांत (मनोज बाजपेयी) को ख़ुफिया जानकारी मिलती है कि आतंकी ग्रुप कुछ बड़ा करने वाले हैं। श्रीकांत अपने साथी जे.के (शारिब हाशमी) के साथ मिलकर कुछ ग्रुप को ट्रेक करते हुए कुछ गलत लोगों को मार देता है। श्रीकांत इसका अफसोस करता है और सही लोगों की तलाश में जुट जाता है।

श्रीकांत की हालत ऐसी है कि देश बचाये तो घर जाता है, घर बचाये तो देश। श्रीकांत देश बचाने के लिए मिशन पर निकल जाता है। वह अपनी जान की परवाह ना करते हुए देश के दुश्मनों को उनके अंजाम तक पहुंचा देता है। लेकिन वह असली दुश्मन को पड़ने में नाकाम रहता है। जिसके हाथों उसके कई साथी भी मारे जा चुके और वही है जिसे कुछ बड़ा करने के लिए इंडिया भेजा जाता है। ठीक वैसा ही जैसा सीक्रेड गेम्स2 में होने वाला था।

अमेजन पर हिन्दी के कंटेंट में एक बात कॉमन लगती है। ज़्यादातर सिरीज में फैमली को सेंटर में रखा गया है। मेड इन हेवेन, मिर्जा पुर, ब्रीद इन सब में एक कहानी घर के अंदर चल रही है और एक घर के बाहर चल रही है। यह प्राइम का जैसे ट्रेंड ही बनता जा रहा है।

सिनेमा की नज़र से

इस तरह की कहानी हॉलीवुड़ से लेकर बॉलीवुड तक भरी पड़ी है। कहानी में कुछ भी नया सा नहीं है। हां लेखक निर्देशक की तारीफ करनी होगी कि उसने दोनों पहलूओं को छूने की कोशिश की है। एक तरफ लीचिंग को दिखाया है तो दूसरी तरफ धर्म के नाम पर बरगलाने वाले लोगों को दिखाया है। अच्छे-बुरे दोनों तरह के लोगों को दिखाया है।

यह सीरीज क्योंकि ख़बरों से प्रभावित होकर लिखी गई है। इसलिए पिछले दिनों सुर्ख़ियों में रहीं ख़बरें सीन के रूप में देखने को मिलती हैं। लेकिन सीरीज के अंत तक आते-आते कई बार सेक्रेड गेम्स 2 की याद आने लगती है।

एक्टिंग की बात करें तो मनोज वाजपई कहीं भी अपने किरदार से भटके हुए नज़र नहीं आते हैं। एक दो सीन में हालांकि जबरदस्ती का ड्रामा भी साफ नज़र आता है जो संज़ीदगी को कम कर देता है। मनोज वाजपई के साथ शारिब हाशमी ने कमाल की एक्टिंग की है। वासे पुर में असगर और सरदार ख़ान की जोड़ी के बाद श्रीकांत और जे.के की एक अच्छी जोड़ी देखने को मिली। मूसा के किरदार में नीरज माधव अपनी एक्टिंग का लोहा मनवाने में कामयाब रहे। इसके अलावा कुछ छोटे रोल में नज़र आये बबलु(इस्माइल खान) नर्स (मोनिषा मकवाना) जैसे किरदारों ने भी अच्छा काम किया है। हालांकि धृति के किरदार में महक ठाकुर काफी छोटी हैं। कहानी में ग़ुल पनाग के पास करने के लिए बहुत कुछ नहीं था।

सीरीज में संगीत सीन की थीम के अनुसार ही लिया गया है। हर सीन का संगीत किरदारों के मूवमेंट और थीम पर फिट बैठता है। निर्देशक ज़्यादातर सीन से भटकर कर अच्छी लोकेशन को दिखाने की गलतियां करते हैं, यह सीरीज देखते हुए आप ऐसा महसूस नहीं करेंगे। कैमरा बीच-बीच में आम लोगों पर भी जाता है जो डॉक्योमेंट्री जैसा फील देता है और सीन को और ज़्यादा रियल कर देता है।

जो बातें हज़म नहीं होतीं

श्रीकांत विदेश में बैठे ख़तरनाक़ आदमी को जिसे अमेरिका नहीं पकड़ पाया उसे दो दिन में बकरी के बच्चे की तरह जाकर पकड़ लेता है मगर उनकी कस्टड़ी से एक ख़तरनाक आदमी उसके कई आदमियों को मारकर आसानी से भाग जाता है और अंत तक पकड़ा नहीं जा रहा है?

श्रीकांत की 12 साल की बेटी के पास स्कूल में ड्रग्स मिलती है और वह उस बात को लाईटली लेता है।

जो हादसे को अंजाम देने वाला मेन आदमी है, उसका पता लगने के बाद भी श्रीकांत या उसकी टीम उसके पीछे क्यों नहीं पड़ी है?

हालांकि सीरीज अच्छी है लेकिन फिर भी आप देखते हुए एक बार सोचोगे ही के दस की जगह आठ एपीसोड में ख़त्म हो सकती थी?