आजाद हिन्द फौज का इतिहास
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‘तुम मुझे ख़ून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा’, यह नारा नेता जी सुभाष चंद्र बॉस ने दूसरे विश्व युद्द में दिया था। उनके इसी एक नारे पर लांखो हिन्दुस्तानी लोग अपने जान-माल से आजाद हिन्द फौज में शामिल हो गये थे। यह वही फौज थी जिन्होंने अंग्रेजों से बगावत करके अपने देश को आजाद कराने के लिए सिंगापुर से दिल्ली के लिए कूच किया था। यह फौज अपनी जान हथेली पर लेकर ‘दिल्ली चलो’ का नारा लगाती हुई सिंगापुर से बर्मा के रास्ते दिल्ली की तरफ बढ़ी थी।

आज भी हम जिस फौज के नारे गर्व से लगाते हैं। उस फौज के साथ क्या हुआ। वह देशभक्त कहलायी या देशद्रोही। दिल्ली उन्हें सम्मान के साथ लाया गया या हथकडियां पहनाकर। इन सब सवालों के जावब देती सीरीज दा फॉरगॉटन आर्मी पांच एपीसोड़ के साथ अमेजन प्राइम पर आ चुकी है।

निर्देशक: कबीर ख़ान

लेखक: कबीर ख़ान, हेराज मारफतिया, शुभ्रा मारफतिया

कलाकार: सनी कौशल, सरवरी वाघ, रोहित चोधरी, एम के रैना, श्रुती सेठ

प्लेटफार्म: अमेजन प्राइम

कहानी शाहरूख खान अपनी आवाज में बता रहे हैं। वही कहानी जो इतिहास के पन्नों में कहीं खो गई। कहानी उन शहीदों और योद्दाओं की है जिन्होंने दित्तीय विश्वयुद्द में ब्रिटिश फौज को उखाड फैंकने का संक्लप लिया।

यह 1942 की कहानी 1996 से शुरू होती है। आजाद हिन्द फौज का एक सिपाही कर्नल सोढ़ी( एम.के रैना) अपने भान्जें के पास सिंगापुर जाते हैं। वहां उनको पुराने दिन याद आने लगते हैं। वह अपने अतीत में चले जाते है। जहां वो जवान ब्रिटिश सिपाही मेजर सोढ़ी (सनी कौशल) हैं।

वह सिंगापुर ब्रिटिश आर्मी के साथ जापानियों को रोकने के लिए आये थे। ब्रिटिश कर्नल ने लेकिन जापानियों के आगे सरेंडर कर दिया। अंग्रेजों के साथ 60 हजार भारतीय सिपाहियों को जापान ने नेता जी सुभाष चंद्र बॉस को सोंप दिया। नेता जी ने जिनकों अपनी आजाद हिन्द फौज में शामिल कर अंग्रेजों को कमजोर करने के लिए इंडिया की तरफ रवाना किया।

इस फौज में कई रेजीमेंट थीं। उन्हीं में से एक रानी लक्ष्मीबाई रेजीमेंट भी थी। जिसमें महिलाएं शामिल थीं। यह पहली महिला फौज थी। इस फौज को जापान की मदद से ब्रिटिशों को कमजोर करने के लिए इंडिया भेजा गया। आजाद हिन्द फौज पर लेकिन रास्ते में ही हमले शुरू हो गये अपनी मंजिल तक पहुंचते-पहुंचते फौज आधी भी नहीं बची। इन्होंने इंडिया के नज़दीक ब्रिटिश आर्मी  की चौकियों पर कब्जा भी कर लिया लेकिन उसी समय जापानी फौज ने आजाद हिन्द फौज की मदद करने से मना कर दिया।

जापान की मदद के बिना आजाद हिन्द फौज अधर में लटक गई। उसी समय उपर से बरसात भी हो गई। जिसके कारण फौज को रसद भी नहीं मिल पायी। सिपाही बीमार होकर भूंख से मरने लगे। यह लोग किसी तरह से संभले तो इनका सामना बर्मा में ब्रिटिश आर्मी से हो गया। आजाद हिन्द फौज के बहुत से सिपाही मारे गये और बहुतों को बंधक बनाकर भारत की जैलों में भर दिया गया। इस तरह एक बडे सपने का अंत हुआ।

यह कहानी तो पास्ट में चल रही है। इसके अलावा प्रेजेंट में एक कहानी चल रही है। जिसमें कर्लन सोढ़ी का भान्जा म्यांमार में चल रहे प्रोटेस्ट की फोटोग्राफी के लिए जाता है। वहां की आर्मी उसे पीटती है तो बूढ़ा कर्नल सोढ़ी भान्जें को बचाने के लिए म्यांमार के फौजी को मार देता है। उसके बाद म्यांमार के फौजी उनके पीछे पड़ जाते हैं और यह लोग किसी तरह इंडिया के बॉर्डर तक पहुंचना चाहते हैं। अंत में कर्नल सोढ़ी बच्चों को बचाते हुए मारा जाता है।

सिनेमा की नज़र से

निर्देशक कबीर ख़ान 1996 में एक डॉक्योमेंट्री इसी सब्जेक्ट पर बना चुके हैं। यह सीरीज उस से बहुत ज़्यादा अलग नहीं है बल्कि कहीं-कहीं डॉक्योमेंट्री जैसी ही लगती है। कुछ लोगों ने तो यहां तक लिखा है कि सीरीज से बेहतर उनकी डॉक्योमेंट्री थी।

इस सीरीज में युद्द के तीन सीन हैं। जिसमें से एक में बंदूकों, गोले बारूद और एक में टेंक का इस्तेमाल किया गया है। दित्तीय विश्व युद्द चल रहा है। शहर में कहीं ऐसा नहीं लग रहा है। प्रोडक्शन कमजोर दिखता है जबकि बज़ट 150 करोड़ रूपये था।

आपसे इतने लोगों को उम्मीदें थीं। आपने डॉक्योमेंट्री जैसा दिखाने के चक्कर में ड्रामा कर दिया। आपने प्रेजेंट और पास्ट दोनों कहानियों को एक साथ दिखाने का लिए चुना। इसमें आपने कनेक्शन भी बनाये। आप इतने बड़े निर्देशक हैं आपको नहीं लगा कि हद से ज़्यादा कॉईंसीडेंन्स ड्रामा हो जाता है। आपके पास जब एक सीरियस और ऐतीहासिक कहानी थी तो आपको प्रेजेंट में इतने कमजोर और नाटकीय अंदाज में दिखाने की क्या जरूरत थी। दिखा भी रहे थे तो ओल्ड सोढ़ी और यंग सोढ़ी में कुछ तो समानता रख लेते।

आपने एक गाने का भी इस्तेमाल किया है। गाना चलो अच्छा है। फ़िल्माया भी सही गया है। लेकिन दित्तीय विश्वयुद्द पर आधारित फ़िल्म जिसमें आप लव स्टोरी का ट्राइएंगल डाल रहे हो लेकिन आप उस वक़्त की राजनेतिक और दुनिया को तबाह करने वाली नीतियों को नहीं छू रहे हो। आप आजाद हिन्द फौज बनाने वाले नेता जी सुभाषचंद्र बॉस के पहलूओं को नहीं छू रहे हैं।  उस वक़्त का थोड़े और इतिहास को दिखाने की जगह। आप एक लव स्टोरी दिखा रहे हैं। जो बॉलीवुड में बहुत बार देखी जा चुकी है।

आपके किरदार चाहे ओल्ड सोढ़ी हो या यंग सोढ़ी दिखता है कि एक्टिंग कर रहे हैं। ना तो ओल्ड सोढ़ी फील करा पाया कि आजाद हिन्द फौज का सिपाही और ना यंग सोढ़ी देशप्रेम का जज्बा पैदा कर पाया। आपकी हीरोइन का तो समझ ही नहीं आ रहा है। आप पहले कुछ एक्टरों की पर्सनल कहानी को दिखाते हैं, उनके बीच एक लव एंगल भी दिखाते हैं पर उनका कोई इस्तेमाल नहीं करते हैं। आप आजाद हिन्द फौज की कहानी बता रहे हैं लेकिन आपका कैमरा नायक और नायिका के ही इर्द गिर्द घूमता रहता है। बाकी के लोग सिपाही नहीं थे क्या?

कोई क्यों देखे?

आप आजाद हिन्द फौज के बारे में जानना चाहते हो तो देख सकते हो। दित्तीय विश्वयुद्द के बारे में जानना चाहते हो तो देख सकते हो। जापान और ब्रिटिश फौज की दित्तीय विश्व युद्द में क्या भूमिका रही जानने के लिए देख सकते हो। हालांकि आप देखने के बाद कितना संतुष्ट होंगे वो आपको देखने के बाद ही पता चलेगा।