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दा वर्डिक्ट स्टेट वर्सेज नानावती 10 एपीसोड की सीरीज आल्ट बालाजी और जी5 पर आ चुकी है। यह 1959 में इंडियन नेवी के ऑफिसर कावास नानावती पर अदालत में चले मुक़दमे पर आधारित है। इस केस पर अब तक बहुत सारी किताबें और फ़िल्में बन चुकी हैं। इस केस पर सबसे लेटेस्ट फ़िल्म साल 2016 में अक्षय कुमार की रूस्तम आयी थी। अक्षय कुमार को जिसमें एक्टिंग के लिए नेशनल अवार्ड भी मिला था। फ़िल्म और सीरीज में कौन नानावती केस की सच्चाई के नज़दीक है?  जानने के लिए एक नज़र देखें।

निर्देशक: शशांत शाह

लेखक: पूजा तोलानी, राहुल पटेल

कलाकार: सुमित व्यास, सौरभ शुक्ला, मकरंद देशपांडे, मानव कौल, एली अवराम,अंगद बैदी, स्वानंद किरकिरे, कुबरा सैत।

कहानी एक नेवी कमांडर ऑफिसर कावास नानावती (मानव कौल) की है। कावास जब ड्यूटी पर होता है ब्रिटिश मूल की उसकी पत्नी सेल्विया (एली अवराम) को प्रेम आहुजा नाम के पुरूष से प्रेम हो जाता है। कावास को डयूटी से लोटने पर प्रेम आहुजा के बारे में पता चलता है। कावास अपनी सर्विस गन से प्रेम आहुजा को मार देता है।

कमांडर कावास नानावती को बचाने के लिए ‘ब्लिट्ज’ अख़बार के एड़ीटर रूसी करांजिया(सौरभ शुक्ला) नेवी ऑफिसर, सरकार, सामाजिक लोग ऐड़ी चोटी का जोर लगा देते हैं। मक़तूल प्रेम आहूजा की बहन, सराकारी वकील चंदू (मकरंद देशपांडे) राम जेठमलानी (सुमित व्यास) कावास को सजा दिलाने के लिए जान की बाज़ी लगा देते हैं।

इस केस को जीतने के लिए दोनों ही तरफ से धर्म, सच, झूंठ, पाखंड, ड्रामा, अख़ाबार, सरकार, तंत्र, लोकतंत्र सबकी ताक़त को आज़माया जाता है। दोनों ही वकीलों की तरफ से अदालत में पेश किये गये सबूतों के आधार पर कहानी आगे बढ़ती है।

कुछ साल पहले आयी फ़िल्म देखने के बाद सीरीज क्यों देंखें?

यह कोई इत्तिफ़ाक़ है या फिर कोई करार के इस से पहले आयी जी5 की सीरीज मोम पर भी अक्षय कुमार फ़िल्म मिशन मंगल आ चुकी है। ख़ैर। तक़नीकी तौर पर अगर देखें तो फ़िल्म रूस्तम और सीरीज ‘दा वर्डिक्ट स्टेट वर्सेस नानावती’  में ज़मीन आसमान का अंतर है। इस केस पर बनी फ़िल्म और सीरीज दोनों देखने के बाद अगर केस पर आधारित कोई किताब पढ़ें तो सीरीज के मुकाबले फ़िल्म केस की सच्चाई से कोसों दूर नज़र आयेगी।

नानावती केस पर बची काकरिया की लिखी किताब इन हॉट ब्लड: द नानवती केस दैट शुक इंडिया के तथ्यों के आधार पर अगर फ़िल्म रूस्तम और इस सीरीज का आंकलन करें तो सीरीज सच्चाई के ज़्यादा नज़दीक है।

कावास की पत्नी सेल्विया अपने प्रेमी की हत्या के बाद क्या सोचती है?क्या सेल्विया का प्रेम आहुजा के साथ वही रिश्ता था जो अख़बारों ने गढ़ा या फिर वो जो सिर्फ सेल्विया महसूस कर सकती थी। प्रेम आहुजा लड़कियों को फसाने वाला था या फिर एक प्रेमी था? कावास को हत्या करने पर गर्व था या पछतावा ? इस केस का समाज पर कितना गहरा असर पड़ा था? उस वक़्त की सरकार की इसमे क्या भूमिका थी? उस वक़्त की मीडिया ने तथ्यों को कैसे तोड़ा मरोड़ा था? इस केस के बाद क़ानून में क्या बदलाव हुए? वकीलों की क्या भूमिका रही। किस वकील ने प्रेम आहुजा की तरफ से केस लड़कर अपनी पहचान बनायी। यह इतिहास सिर्फ सीरीज में जानने को मिलेगा। फ़िल्म में जबकि ऐसा कुछ नहीं है।

फ़िल्म में इंसानी रिश्ते, जज़बात, गर्व, प्रायश्चित सब हीरोइज़्म में छिप जाते हैं। इस सीरीज में लेकिन सारे किरदारों के जज़बात, उनकी मजबूरी, उनके एहसास पानी की तरफ साफ नज़र आते हैं। सच में उस केस की बारीकियों को समझने के लिए, उस समय की मीडिया और समाज और राष्ट्रीय भावनाओं को जानने के लिए सीरीज देखना बेहतर होगा।

सिनेमा की नज़र से

एक अच्छी कहानी का हर किरदार मुक़म्मल होता है। हर एक किरदार के कई पहलू होते हैं। वह कहीं बुरा होता है तो कहीं अच्छा होता है। इसके लिए तारीफ करनी होगी द वर्डिक्ट स्टेट वर्सेस ऑफ नानावती की लेखक पूजा तोलानी और राहुल पटेल की जिन्होंने बहुत ही बारीकी और समझदारी से किरदारों को गढ़ा है। कावास नानावती ने जिस पत्नी के चलते उसके प्रेमी को मारा सजा के बाद सारी उम्र उसी के साथ गुजारी। प्रेम आहुजा की बहन ने जिस नानावती को सजा कराने के लिए अपना सब कुछ बेच दिया सजा होने के बाद नानावती के माफीनामे पर दस्तख़त कर दिये। जिस वकील राम जेठमलानी ने कावास को सजा करायी उसी ने उसके माफीनामे पर दस्तख़त कराये। काल खंडेलवाला जो कावास को बचाने के लिए लड़ा उसी ने उसके माफीनामे पर दस्तख़त नहीं किये। सीरीज के अंत में लगता है हर किरदार महाभारत की तरह सिर्फ अपना कर्म कर रहा था। सेल्विया का किरदार एक महिला के नजरिये से जिस इमानदारी से लिखा गया है। शायद उस वक़्त के अख़बार भी नहीं लिख पाये हों।

निर्देशक शशांत शाह ने कहानी के मूल अंश को दिखाने के लिए बहुत ज़्यादा समय नहीं लिया। वह कहानी के मूल अंश पर पहुंच जाते हैं। कुछ सीन को छोड़कर निर्देशक बिना मतलब के सीन दिखाने से बचा है।

कास्टिंग में देखें तो सौरभ शुक्ला ने जो ‘ब्लिट्ज’ के एड़ीटर की बारीकियों, समय,काल और मुहावरेदार ज़बान को मजबूती से पकड़ा है। उसे समझना भी हर दर्शक के लिए आसान नहीं है। उन्होंने ख़बरों को तोड़ मरोड़ कर कहानी में बदल देने की जिस प्रक्रिया को दिखाया है। हर किसी के लिए करना मुश्किल था। एक कलाकार को अंत तक कैसे अपने किरदार में बना रहना चाहिए वो कोई शुक्ला जी से सीखे।

चंदू वकील के किरदार में मकरंद देशपांडे को पहचान पाना मुश्किल है। एक मराठी वकील की भूमिका को उन्होंने हुबहू निभाया है। उनके सामने जबकि सारे कलाकार नये थे फिर भी सबके साथ उनका अच्छा तालमेल नज़र आता है। वकील काल खंडेलवाला की भूमिका में अंगद बेदी ने भी अच्छा साथ दिया है। जज़ मेहता की भूमिका में स्वानंद किरकिरे ना बहुत अच्छे ना बहुत खराब रहे। सुमित व्यास राम जेठमलानी के किरदार में भी सुमित ही नज़र आये। इसके अलावा मिमी का किरदार भी बहुत ही बनावटी सा लगता है।

इसके अलावा आर्ट डायरेक्टर की बात करें तो बहुत हद तक पुरानी मुम्बई दिखाने में कामयाब रहे हैं। संगीत बहुत ज़्यादा प्रभावित नहीं करता है। सिनेमाटोग्राफी भी एवरेज है। किसी भी सीन में बहुत ज़्यादा ध्यान कैमरे की तरफ नहीं जाता है।

जो बातें हज़म नहीं होतीं

इन हॉट ब्लड: द नानवती केस दैट शुक इंडिया की लेखिका बची करकरिया के मुताबिक राम उस समय इतने बड़े वकील नहीं थे लेकिन पूरी सीरीज में राम के किरदार में सुमित व्यास ने वही भूमिका निभाई है जो महाभारत में कृष्ण ने निभाई थी। यानी सब कुछ वही कर रहे हैं।