निर्देशक: सुजॉय घोष
किरदार: पालोमी घोष, पूरब कोहली, समीर कोच्चर
सीजन: 1 (2019)

गोवा में एक पुराना सा बंगला है, बंगले में एक पुराना सा टाइपराइटर है, जो अपने आप चलता रहता है,  जिसमें एक भूत फकीर की आत्मा है। फकीर की आत्मा एक किताब लिखती है। वह किताब छप भी जाती है।

एक छोटी सी बच्ची समीरा तो उसे इतना सीरियस होकर पढ़ती है कि उसे लगने लगता है कि उसकी मरी हुई मां भी उसे मिल सकती है। वह अपने दोस्तों के साथ उसी पुराने बंगले में भूत पकड़ने का प्लान बनाती है। यहां आपको हाल ही में आई स्ट्रेंजर थिंग्स के बच्चों की टीम याद आ सकती है।

इसी बंगले की मालकिन जेनी बहुत सालों बाद यहीं रहने के लिए आती है। उसकी एक हमशक्ल भूत है, जो लोगों को मार रही है। इसी मरे हुए भूत को दौबारा ज़िंदा करने के लिए एक मास्टर टाइपराइटर खोज रहा है। उसके रास्ते में जो आ रहा है वह उसे मार रहा है। एक पुलिस वाला उसकी तहकीकात कर रहा है। यहां सस्पेंस बनाये रखने की कोशिश की गई है, जिसमें बहुत हद तक निर्देशक सफल भी रहे हैं।

लेकिन कहानी में इतने सारे किरदार उनकी बैक स्टोरी यानी इतना कुछ एक साथ चलता है कि कभी-कभी सर के उपर से जाने लगता है।

सिनेमा की नज़र से

कहानी के इतने सारे छोर हैं। इतने सारे सबट्रेक हैं, कहां से पकड़ें कुछ समझ नहीं आ रहा है। किरदार पर किरदार आते जाते हैं। लेखक सबको आपस में कनेक्ट करता है, सबकी स्टोरी दिखाने के चक्कर में कहना क्या चाहता है, यही भूल जाता है।

अगर एक्टिंग की बात करें तो सारे एक्टर अच्छे हैं। उन्होंने अपने हिस्से की एक्टिंग में बहुत सही किया है। लेकिन निर्देशक कहानी में भटका हुआ नज़र आता है। कहानी में बहुत  सारे ट्रेक तो चला दिये लेकिन सही से उनकी कहानी को बताया नहीं गया। कहानी में किया गया जोड़-तोड़ साफ नज़र आता है।

सिनेमाटोग्राफी मीडियम कही जा सकती है। किसी भी सीन में ऐसा माहोल नज़र नहीं आता है, जिसे देखकर ड़र लगे, या भूतों जैसा कुछ महसूस किया जा सके।  कुछ सीन तो टी.वी पर आने वाले धारावाहिक जैसे लगते हैं। संगीत पर बहुत ज़्यादा ध्यान नहीं जाता है। भूत वाला माहोल, टेंशन नज़र नहीं आती है। यह इस सीरीज की ख़ास बात भी कही जा सकती है। निर्देशक ने नार्मल कहानी की तरह इस कहानी को कहने की कोशिश की है। भूतों के लिए टाइपकास्ट हो चुके म्यूजिक और कोस्टयूम से बिल्कुल अलग।

अच्छी शुरूवात के बाद भटकती है कहानी

यह सीरीज जहां से शुरू होती है। एक बच्ची अपने दादा को बुलाकर लाती है कि उसके कमरे में कोई रो रहा है। दादा जाकर देखता है एक ही शक्ल के दो बच्चे हैं। यहां से बहुत सारी संभवानायें नज़र आती हैं। इनमें से असली बच्ची कौन सी है, कैसे पता चलेगा। यहां से आगे देखने के मन करता है। इसके आगे लेकिन इतने सारे ट्रेक शुरू हो जाते हैं कि एक ही शक्ल की दो बच्चियों की कहानी से ध्यान हट जाता है।

सुजॉय घोष की फ़िल्में देखें तो उनमें एक नयापन होता है। इस सीरीज को जबकि उन्होंने लिखा भी है। उसके बाद उनकी जिम्मेदारी और ज़्यादा बढ़ जाती है। पांच एपीसोड में सीरीज ख़त्म हो जाती है। हर एपीसोड़ 50 मिनिट के आस पास है। हर एपीसोड की शुरूवात तो अच्छी होती है लेकिन ख़त्म होते-होते कहानी खिंचने लगती है।

इन सबके बावजूद कुछ नयी चीजें भी सीरीज में देखने को मिलेंगी। उसके लिए सीरीज को एक बार ज़रूर देखा जाना चाहिए। यह सीरीज मनोरंजन के लिए देखें तो 100 में से 60 लोगों को पसंद आ सकती है।