बनारसी माहोल में वर्जिन भास्कर
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आल्ट बाला जी और जी5 पर पिछले साल एक सीरीज वर्जिन भास्कर आयी थी। यह सीरीज एक वर्जिन देसी बनारसी लड़के भास्कर पर आधारित है। इस सीरीज का दूसरा भाग भी आ चुका है। इस सीरीज के बारे में जानने के लिए पढ़ सकते हैं।

निर्देशक: सक्षत दलवी, संगीता राव
कलाकार: अनंत जोशी, धीरेंद्र तिवारी, हिमांशु अरोरा, दुर्गेश कुमार।
प्लेटफार्म: आल्ट बालाजी और जी5

कहानी बनारस के एक देसी लड़के भास्कर(अनंत जोशी) के जीवन पर आधारित है। भास्कर वर्जिन है। उसके खुराफाती दोस्त उसे वर्जिन ना रहने के अजब-गजब आईडिया बताते हैं। भास्कर अपनी आत्म शान्ति खोजते-खोजते सभी की शांति का दूत बन जाता है।

वर्जिन भास्कर के मन में जो ख़्याल आते हैं। वह उन्हें कागज पर लिखने लगता है। एक पब्लिशर्स जिसे किताब की शक्ल में छाप देता है। वह किताबें शहर भर में दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो जाती हैं। उस किताब की डिमांड मार्किट में इतनी बढ़ जाती है कि फ़िल्म वाले तक उस लेखक को खोजते हुए पहुंच जाते हैं।

भास्कर की पहचान गुप्त है। यह बात जब खुलती है तब भास्कर को एक लड़की से प्रेम हो जाता है। उस लड़की के प्रेम में भास्कर दिवाना हो जाता है। एक दिन भास्कर उस लड़की के साथ अपने तजुर्बें को कहानी की शक्ल देकर छाप देता है। उस लड़की को मालूम होता है तो उसका दिल टूट जाता है।

इस बार कहानी कुछ अलग है। इस बार भास्कर सब कुछ छोड़कर यू.पी.एस.सी की तैयारी कर रहा है। भास्कर का टेस्ट नहीं निकाल पाता है। इधर भास्कर अपने जीवन में परेशान चल रहा है। उधर नई कहानी ना आने के कारण लोग परेशान हैं। ऐसे में एक हॉस्टल की लड़की भास्कर को कॉम्पटीशन देने के लिए मार्किट में आती है।

वह लड़की भी भास्कर की ही तरह सस्ता साहित्य लिखती है। उसकी किताब जब मार्कीट में आती है तो फिर से लोगों में शोर मच जाता है। भास्कर को जब पता चलता है कि कोइ और है जो उसके सहारे अपना काम चला रहा है। भास्कर उसको खोजता उस पहले ही वो लड़की भास्कर को खोज लेती है। दोनों के बीच दोस्ती होती है। दोस्ती साझेदारी में बदलती है और दोनों ही लेखक समाज की आत्म संतुष्टि के लिए रात दिन कहानी पर कहानी लिखने लगते हैं।

सिनेमा की नज़र से

इस समय जब सीरीज लोगों पर इतना हावी हो रही हैं कि वो मिर्जापुर जैसी सीरीज का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। सीरीज की कहानियों में नये-नये तरीके खोजे जा रहे हैं। उस समय पर ऐसी सीरीज कितना महत्व रखती हैं, नहीं पता।

एक जमाने में सस्ता साहित्य में लोगों की रूचि थी। उस जमाने में अपनी पहचान छिपाकर लोग लिखा करते थे। उस में बहुत सारी चीजो पर गोर किया जा सकता था। इस सीरीज में जिनका कोई मतलब ही नहीं बनता है। वर्जिन भास्कर के दूसरे सीजन को देखते हुए पहला थोड़ा फिर भी सही था। वर्जिन भास्कर से पहले एम.एक्स प्लेयर पर मस्तराम सीरीज भी कुछ ही दिन पहले आयी है। सब्जेक्ट दोनों का कुछ एक जैसा ही है।

बनारसी माहौल 

यह सीरीज क्योंकि बनारस पर आधारित है। सीरीज में बनारसी घाट आपको बीच-बीच में नज़र आते हैं। बनारस की गलियां नज़र आती हैं। बनारसी माहौल नज़र आता है। बनारसी बोली और बीच-बीच में स्टेंड अप कॉमेडी के जरिये बनारस का चित्रण जो सीरीज के सब्जेक्ट से अलग है और थोड़ा तो अलग सा लगता है।

इसी बनारसी माहौल में धीरेंद्र कुमार तिवारी की एक्टिंग फिट बैठती है। वह जब भी थोड़ी देर के लिए दिखाई देते हैं। उनके मुंह से बनारसी अंदाज में थोड़े बहुत संवाद और बनारसी कल्चर की गालियां सुनकर थोड़ा बहुत मजा आता है। उन्होंने अपना काम किया है लेकिन अच्छी सीरीज के लिए हर किसी को अपना काम करना पड़ता है।

कोई क्यों देखे

इस सीरीज में देखने के लिए सिर्फ बनारस है। बनारसी लोगों का रोजमर्रा की ज़िंदगी का मनोरंजन है। उस मनोरंजन के लिहाज से देखी जा सकती है। वह लोग देख सकते हैं जिन्हें मस्तराम पसंद आयी थी। सीरीज से अगर आज के जमाने में बन रही सीरीज जैसी उम्मीद रखकर देखने वालों को निराशा हो सकती है।