एकदम घटिया
35%Overall Score
Reader Rating 1 Vote
37%

अंग्रेजी के शब्द वर्जिन और हिन्दी के शब्द वर्जित सुनने में दोनों एक ही जैसे लगते हैं। प्रयोग मे लेकिन वर्जित हमेशा वर्जिन के ख़िलाफ ही इस्तेमाल होता है। जी5 पर आयी 11 ऐपीसोड की सीरीज वर्जिन भाष्कर की पटकथा इन्हीं दो शब्दों के आस-पास लिखी गई है। यह सीरीज बनारस की पृष्ठभूमि पर है जहां शब्दों का मतलब या तो कहने वाला समझता है या फिर सुनने वाला बाकी सब तो ऐमई हैं।

निर्देशक: साक्षत दलवी, संगीता राव

लेखक: अकांक्षा शुक्ला, अजयदीप सिंह, मनीष

कलाकार: अनंत जोशी, रूतपन्ना एश्वर्या, हिमांशु अरोरा, धीरेंद्र कुमार तिवारी, हिमांशु कोहली

प्लेटफार्म: Zee5

बनारस-इलाहबाद जहां बच्चा अगर बिना फेल हुए दसवीं-बारहवीं के बाद ग्रेजुऐश्न कर ले तो सीधा आई.ए.एस IAS बनने के ख़्वाब देखने लगता है। इस ख़्वाब को पूरा करने के लिए कुछ बच्चे प्यार और प्यार के बाद होने वाली क्रिया से अपने आपको दूर कर लेते हैं। इतना दूर की पास जाने पर ही उन्हें डर लगने लगता है।

कहानी एक ऐसे ही लड़के भाष्कर त्रिपाठी (अनंनत जोशी) की है, जो तीस के होने को आये हैं। प्रेम भी कई बार कर चुके  हैं लेकिन प्रेम के बाद होने वाली क्रिया से ड़रते हैं। भाष्कर को विधि पांडे (रूतपन्ना एश्वर्या) से प्रेम हो जाता है।

बनारस के बारे में जैसा कि बहुत लोगों का कहना है। वहां हर कोई किसी ना किसी को ज्ञान दे रहा होता है। भाष्कर के एक दोस्त मिश्रा जी हैं जो उसे लगातार प्रेम के बाद की क्रिया को पूर्ण करने पर ज्ञान दिये जा रहे हैं। भाष्कर भी उस क्रिया को पूरा करने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है लेकिन सफल नहीं हो पा रहा है।

भाष्कर जोकि एक पब्लिशर के लिए सस्ता साहित्य भी लिखता है। वह जो भी विधि के साथ नहीं कर पा रहा है उसके करने की कल्पना करके कहानी में लिख देता है। विधि एक दिन अपने भाई को उसी किताब को पढ़ते हुए पकड़ लेती है और जब पढ़कर देखती है तो भाष्कर पर उसे बहुत गुस्सा आता है। इसी बात पर विधी और भाष्कर के बीच ब्रेकअप हो जाता है। पांच एपीसोड तक तो यह होता है। इसके आगे के पांच एपीसोड लेखक ने भाष्कर और विधी को मिलाने के लिए लिख मारे हैं। जिसमें ना प्यार है, ना दर्द है, ना हसी है, बस जो है सो है।

सिनेमा की नज़र से

आप अगर कुछ अच्छा देखना चाहते हैं जिसे देखने के बाद आपको थोड़ा भी अच्छा फील हो तो यह सीरीज आपके लिए नहीं है। एक समय के बाद आप खुद ही कहानी में भटक जाओगे, कौन क्या, क्यों कर रहा है। कुछ पता ही नहीं चलेगा। सिनेमेटोग्राफर को भी समझना चाहिए आप बनारस के घाट दिखाकर दर्शकों को बहला नहीं सकते।

वर्जिन भाष्कर का निर्देशन देखकर ऐसा लगता है कि निर्देशक बहुत जल्दी में है। उसने कच्ची-पक्की कहानी को लेकर कुछ भी बना दिया है। वह भी 11 ऐपीसोड जो हर कोई नहीं झेल नहीं सकता।

कोई क्यों देखे?

सिनेमा देखने वाले में कुछ लोगों को कहानी बहुत प्रभावित करती है तो वो लोग कहानी के लिए देखते हैं। वर्जिन भाष्कर की कहानी में तो इतने जोड़-तोड़ हैं। कहानी ही समझ से बाहर हो जाती है।

कुछ लोग कॉमेड़ी की वज़ह से देखते हैं लेकिन वर्जिन भाष्कर उस से भी कोसो दूर है।

कुछ लोग एक्टिंग के कारण भी सिनेमा देखते हैं लेकिन एक्टिंग भी किसी की देखने लायक नहीं है।

कुछ लोग गुप्त वज़ह से भी सिनेमा देखना चाहते हैं तो वो देख सकते हैं उन्हें देखने पर अफसोस नहीं होगा।