डिलीवरी ब्वॉय की करतूत
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राहुल देव का एक जमाना था। हिन्दी की लगभग हर दूसरी फ़िल्म में वो विलेन हुआ करते थे। उनकी पहली ही फ़िल्म चैम्पियन में उनका लुक आज भी लोगों को याद होगा। एक लम्बी चौड़ी कद काठी वाल विलेन जिसने अपनी पहली ही फ़िल्म में सनी देओल को पर्दे पर जोरदार टक्कर दी थी। जिसके उन्हें इंटरनेशनल इंडियन फ़िल्म एकेडमी की तरफ से बेस्ट डेब्यूट अवार्ड मिला था।

एक ज़माना आज है जब राहुल देव हिन्दी, तमिल, तेलगु, उडिया, पंजाबी में तमाम फ़िल्में करने के बाद वेब सीरीज कर रहे हैं। उनमें उन्हें क्या-क्या करना पड़ रहा है। यह सीरीज देखने के बाद आप खुद ही समझ जायेंगे।

निर्देशक: चिराग अरोरा

कलाकार: हर्ष बेनीवाल, राहुल देव, निखिल भाम्बारी

प्लेटफार्म: आल्ट बाला जी

कहानी सुनने में बहुत ही अटपटी है। आप जरा सोचकर देखिए! किसी जवान लड़के को ये पता ही नहीं हो कि उसकी मां कौन थी। चलो मान लेते हैं। लेखक ने कहानी लिखने के लिए लिबर्टी ले ली।

यह लड़का अचानक से रात में अपने पिता सोगी (हर्ष बेनीवाल) को जगाकर उनसे पूंछता है कि मेरी मां कौन थी? हालांकि यह बात आप सिर्फ मानकर चलना कि कहानी बता रहे हर्ष बेनीवाल एक जवान लड़के के बाप हैं। स्क्रीन पर वो अपने बेटे से भी छोटे लगेंगे।

हर्ष बेनीवाल अपने बेटे को अपने और अपने बाप (राहुल देव) की जवानी के किस्से सुनाते हैं। यह दिल्ली की बात है। सोगी सी.ड़ी प्लेयर की एक दुकान चलाता था। उसकी अपनी एक गर्ळफ्रेंड थी वो जिसके साथ खुश था। उसकी ग्राहकों में तीन ऐसी महिलाएं थीं जो पोर्न फ़िल्मों की चरसी थीं। अब सोगी की डिलीवरी लेड़ी को चोट लग जाती है और सोगी अपने पिता प्रेम सिंह बरनाला (राहुल देव) को डिलीवरी के लिए भेज देता है। वह तीनों महिलाएं राहुल देव को देखते ही अपने कामुक सपनों में खो जाती हैं।

बरनाला साहब जब डिलीवरी के लिए पहुंचते हैं तो महिला उनके शरीर को देखते ही उन पर फिदा हो जाती है। वह उनसे सी.ड़ी चलवाकर देखती है और उन्हें पीछे से आकर पकड़ लेती है। बेचारे बेचारे बरनाला साहब किसी तरह वहां से अपनी अस्मत बचाकर भागते हैं। और यह सब एक पुरूष के साथ इंडिया में हो रहा है।

बरनाला अपने बेटे सोगी की सी.ड़ी डिलीवरी करने से मना कर देते हैं। वह तीनों महिलाएं बरनाला को घर भिजवाने के लिए सोगी को साल भर की मुंह मांगी रकम दे देते हैं। राहुल देव मजबूरी में फिर से पोर्न सी.ड़ी डिलीवर करने जाते हैं और तीनों महिलाएं उनके साथ मजे करती हैं। महिलाएं भी खुश, सोगी भी खुश, बरनाला भी खुश।

अंत होते-होते सोगी के बेटे का सवाल भी बदल जाता है। अब तक उसे कंफयूजन था कि उसकी मां कौन थी? अब वह यह भी जानना चाहता है कि उसका बाप कौन था? यह बात अगले सीजन में ही पता चलेगा। इस सीजन की कहानी मां तक थी।

सिनेमा की नज़र से

निर्देशक का इस से पहले किसी बड़ी फीचर फ़िल्म का कोई ख़ास तजुर्बा नहीं है। उन्होंने कुछ शॉर्ट फ़िल्म बनायी हैं। सीरीज देखते हुए महसूस होता है। जबकि फ़िल्म बनाने वाले बडे-बड़े निर्देशक भी 8 एपीसोड बनाने में कहानी से पकड़ खो देते हैं। ऐसा पिछली कुछ हिन्दी सीरीज मे देखने को मिला है।

निर्देशक ने इसमें बहुत ज़्यादा दिमाग लगाने की कोशिश नहीं की है। किसी भी किरदार में जान नहीं है। कहानी रेत पर पानी की तरह जिधर रास्ता मिले बस बह रही है। ऐसा लगता है सिर्फ सीरीज को बनाने के लिए ही बनाया गया है जबकि अगर थोड़ी सी कागजी मेहनत कहानी पर कर लेते तो सीरीज अच्छी हो सकती थी। उन्हें सीन को दिखाने से ज़्यादा फ़िल्माने पर ध्यान देना चाहिए था। उनके पास अच्छे कलाकार भी थे। निर्देशक ने कुछ अच्छा करने का मौका हाथ से गंवा दिया।

राहुल देव की स्क्रीन पर लॉ एनर्जी देखकर ही लगता है। वह किस मन से काम कर रहे हैं। उनकी ब़ॉडी लेंग्वेज उनकी डॉयलॉग डिलीवरी उनके सीन देखकर ऐसा लगता है कि इस किरदार को जैसे वो मजबूरी में कर रहे हों। यह लेकिन अच्छी बात है कि राहुल देव का अलग अंदाज और उनकी सादगी जो फ़िल्मों मे देखने को नहीं मिली सीरीज में देखने को मिलेगी। इस सीरीज में है बस वो अपने किरदार का चुनाव नहीं कर पाये कि उन्हें करना चाहिए था कि नहीं।

राहुल की मां के किरदार मे पंजाबी कलाकार (निर्मल ऋषि) अच्छी एक्टर हैं। उन्होंने पंजाबी की फ़िल्मों में बहुत ही अच्छे किरदार किये हैं। इस सीरीज में लेकिन उनके पास करने को कुछ खास नहीं था। वह हर सीन में सिर्फ ऐसे हैं जैसे प्लेट में सलाद के साथ मूली।

लेखक ने इतने सारे किरदार को रखा है कि किसी एक पर ध्यान लगाना बहुत मुश्किल है। अपनी सुविधा के हिसाब से जिस किरदार की जहां जरूरत पड़ी इस्तेमाल कर लिया।

सीरीज के गाने सुनने में बस अच्छे लगते हैं। उनको सुना जा सकता है। इस से कुछ सीखकर निर्देशक और लेखक अगला सीजन बेहतर बना दें।